एक बनारसी ‘बनारस’
दो बनारसी ‘मौज’
तीन बनारसी ‘कम्पनी’
चार बनारसी ‘फौज’

'बनारस' एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही मंदिर-मस्जिद, गंगा, घाट, पान, साड़ी आदि नामों का जेहन में आना आम बात है. शिव-शक्ति के दम-दम और बाबा के बम-बम से गूंजते इस शहर की महिमा, लोगों की उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है, तभी तो यहां का सांसद, देश का प्रधानमंत्री है. बात अगर बनारस घूमने की करें, तो यहां साल भर दुनिया के कोने-कोने से लोग आते रहते हैं. कुछ को तो ये शहर इतना रास आता है कि हमेशा के लिए इस शहर के ही हो जाते हैं.

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अल्हड़ बनारस अपनी बेफ़िक्री और फक्कड़पन के लिए दुनियाभर में मशहूर है. लोगों का ऐसा विश्वास है कि यहां मरने पर मोक्ष मिलता है. लेकिन गुरु बनारस मरना नहीं, जीना सिखाता है. इसीलिए अगर आप घूमने के शौकीन हैं और ज़िंदगी जीना चाहते है, तो बनारस ज़रूर आएं. हमारा य़कीन है कि यहां आने के बाद, आपका यहां से जाने का मन नहीं करेगा, क्योंकि लोग बनारस घूमते नहीं जीते हैं.

1. संस्कृति जाननी है तो बनारस आएं, क्योंकि ये देश की सांस्कृतिक राजधानी है.

अमरीकी लेखक Mark Twain कहते हैं-

'वाराणसी इतिहास से भी अधिक प्राचीन है. परम्परा की दृष्टि से भी अतिशय प्राचीन है. मिथकों से भी कहीं अधिक प्राचीन है. और यदि तीनों (इतिहास, परम्परा और मिथक) को एक साथ रखा जाए तो, यह उनसे दोगुनी प्राचीन है'.
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अब क्या बताए! जो शहर इतिहास से भी पुराना है, उसके बारे में बताना कहां से शुरु करें. चौसठ योगिनियों, बारह सूर्य, छप्पन विनायक, आठ भैरव, नौ दुर्गा, बयालीस शिवलिंग, नौ गौरी, महारुद्र और चौदह ज्योतिर्लिंगों वाला यह बनारस, देश की सांस्कृतिक राजधानी है.

2. गंगा नदी से पहचान है बनारस की, क्योंकि ये बनारस की मां है.

पवित्रता का पर्याय बना बनारस, गंगा मईयां की गोद में पलता है. गंगा नदी के किनारे बनारस को बसना था, या इस नदी को बनारस के किनारे बहना था, मालूम करना आसान नहीं है. बनारस ही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां ये नदी उल्टी दिशा में यानि दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है. गंगा सब धर्मों और कौमों की ‘मां’ है. इसकी हर बूंद में बनारस बसा है. मां गंगा की अहमियत बताते हुए, शायर नज़ीर बनारसी ने लिखा है-

हमनें तो नमाज़े भी पढ़ी है अक्सर,
गंगा के पानी में वजू कर- करके.

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गंगा नदी के अलावा वरुणा, गोमती आदि कई नदियां इस अर्ध्दचन्द्राकार बनारस में चार चांद लगाती हैं. नदियों की कल-कल, घंटे-घड़ियालों और अज़ान की आवाज सुनकर जागते इस शहर में हर कोई गुरु है, चेला कोई नहीं, हर कोई राजा है, प्रजा कोई नहीं.

3. घाट ज़रूर आएं, क्योंकि कहानियां शुरू और ख़त्म यहीं होती हैं.

बनारस के अलग अंदाज को देखना, समझना और जीना हो तो बनारस के घाटों पर जाए. भांग-बूटी की मस्ती में डूबे साधु-सन्यासी और बनारसी मस्ती की अद्भुत छवि यहीं देखने को मिलती है. शिव के इस दरबार में दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, मर्णिकणिका घाट, हरिश्चन्द्र घाट, केदार घाट, अहिल्याबाई घाट, आदिकेशव घाट, गाय घाट सहित चौरासी से ज़्यादा घाट हैं. कुछ नयी कहानियां अस्सी घाट से शुरु होती है, तो वहीं कुछ का अन्त मर्णिकणिका घाट पर हो जाता है.

घाटों पर होने वाली आरती देखना कभी न भूलें और खासकर दशाश्वमेध घाट की आरती. बड़े-बड़े सन्त-महात्मा ज्ञान पाने के लिए यहां आते हैं और फिर यहीं के होकर रह जाते हैं. घाटों में मुक्ति मिलती है और यह दुनिया को जीवन की सीख देता है.

4. मंदिर-मस्जिदों में नहीं गए, तो बनारस आना अधूरा है.

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'नम: पार्वती पतये हर हर महादेव' के सम्बोधन में रमे हुए, शिव के इस दरबार की कोतवाली बाबा कालभैरव करते है. बनारसियों के लिए हर मस्जिद मन्दिर है और हर मन्दिर मस्जिद है. यहां जितने शान से बाबा विश्वनाथ मन्दिर अडिग है, उतने ही आन से ज्ञानवापी मस्जिद भी. संकट मोचन मन्दिर, आलमगीर मस्जिद, तुलसी मानस मन्दिर, पार्श्वनाथ जैन मन्दिर, गोदौलिया का गिरजाघर, अढ़ाई कांगरा मस्जिद, गुरुबाग का गुरुद्वारा या कोई भी धर्मस्थल हो, सबकी महिमा अपरम्पार है. सभी धर्मों की प्रिय कबीर और तुलसी की इस कर्मभूमि के बारे में सही कहा गया है कि,

बनारस में बनारसी बाघ है,
बनारसी माघ है, बनारसी घाघ है,
बनारसी जगन्नाथ है. शैव है, वैष्णव है, सिद्ध है,
बौद्ध है, कबीरपन्थी नाथ है,
लेकिन यहां सबकी प्रवाह गंगा और न्यायाधीश विश्वनाथ हैं.

5. सारनाथः प्रकृति, धर्म और देश से जोड़ता है.

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बौद्ध धर्म के लिए बनारस का विशेष महत्व है, क्योंकि यहीं पर सारनाथ में गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था. सारनाथ में ही सम्राट अशोक ने कई स्तूप बनवाए थे. उन्होंने यहां प्रसिद्ध अशोक स्तंभ का भी निर्माण करवाया. इस स्तंभ पर बने चार शेर, भारत का राष्ट्रीय चिन्ह हैं और स्तंभ का चक्र हमारे तिरंगे का चक्र है. सारनाथ का डीयर पार्क भी बड़ी संख्या में सैलानियों का ध्यान अपनी ओर खींचता है. डीयर पार्क में स्थित धमेख स्तूप वो जगह है, जहां पर गौतम बुद्ध ने ‘आर्य अष्टांग मार्ग’ का संदेश दिया था.

6. यहां की गलियों में जाना न भूलें, क्योंकि यहां भारत बसता है.

बनारस जितना मंदिरों और घाटों में रहता है, उतना ही यहां की गलियों में भी बसता है. कभी बनारस की तंग गलियों में घुमते वक़्त किसी खिड़की से उड़ती हुई पान की फुहार सिर पर पड़ जाए, तो इससे किसी के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचती, क्योंकि इसके बाद बनारसी सम्मान के साथ बनारस के दिव्य और कलात्मक गालियों में होने वाला वार्तालाप, वहां मौजूद लोगों का ऑल इण्डिया रेडियो बन जाता है.

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कभी भटकते हुए किसी बंद गली में भोलेनाथ के मस्ताने वाहन से भेंट हो जाए, तो समझिए की बनारस दर्शन हो गया, क्योंकि इसके बाद जो होता है, उसका पूरा दारोमदार भोलेनाथ के वाहन का होता है. विश्वनाथ गली, कचौड़ी गली, खोया गली. इसी तरह के नामों वाली विशेषता वाले बनारस की गलियों के बारे में ठीक ही कहा गया है,

गलियों बीच काशी है, कि काशी बीच गलियां.
कि काशी ही गली है, कि गलियों की ही काशी है..

7. बनारस हिंदू विश्वविद्यालयः सर्व विद्या की राजधानी

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बनारस में घूमने को तो बहुत कुछ है, लेकिन बीएचयू घूमने का जो मज़ा है, वो सबसे अलग है. पेड़-पौधों से भरा हुआ ये कैंपस किसी शहर से कम नहीं. 100 साल पुराना ये कॉलेज एक विरासत है. यहां की इमारतें महल जैसी हैं. यहीं पर नया विश्वनाथ मंदिर भी है. दुनिया में भगवान शिव का सबसे बड़ा मंदिर यहीं है. बीएचयू में एक म्यूज़ियम भी है, जहां कोई भी आ सकता है. ये सिर्फ़ एक शिक्षण संस्थान नहीं है, बल्कि बनारस का अभिमान है.

बीएचयू के अलावा कई स्कूल-कॉलेज हैं बनारस में, जहां लोग घूमने के लिए जाते हैं. जैसे- उदय प्रताप इंटर कॉलेज, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय आदि.

8. रामनगरः काशी नरेश का किला और रामलीला

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मक्खन के रंग वाले चुनार के बालूपत्थर से बना रामनगर का किला शुरुआत से ही काशी नरेश का घर रहा है. यह दुर्ग और इसका संग्रहालय बनारस के इतिहास का खज़ाना है. यहां पर्यटक हमेशा आते रहते हैं. ये किला आम लोगों के लिए 10 से 5 बजे तक खुला रहता है. इसके अलावा रामनगर की रामलीला बहुत मशहूर है. यहां की रामलीला देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं.

9. खाने-पीने के हैं शौकीन, तो बनारस आपके लिए जन्नत है.

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खाने-पीने के मामले में बनारस से धनी कोई नहीं है. यहां फुटपाथ की दुकानों से लेकर बड़े-बड़े होटलों में आपको बनारसी स्वाद मिलेगा. बनारसी खाने के बहुत शौकीन होते है, इसलिए यहां तरह-तरह के पकवान आपको मिलेंगे. यहां की तो कई गलियां भी खानों के नाम पर ही हैं. बनारसी पान, पप्पू की चाय, मलइयों, चाची की कचौड़ी, रामनगर की लस्सी ऐसी ही खाने-पीने की कई चीज़े है, जो बनारस में ही नहीं दुनिया भर में फ़ेमस हैं.

10. भारत त्योहारों का देश है, लेकिन बनारस ख़ुद एक त्योहार है.

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भारत देश त्योहारों के लिए जाना जाता है, लेकिन बनारस एक पूरा त्योहार ही है. यहां हर सुबह होली और हर शाम दीवाली है. यहां जितने धूमधाम से रथयात्रा का मेला निकलता है, उतने ही उल्लास से ताज़िया का जुलूस भी निकलता है. यहां क्रिसमस भी उतने ही जोर-शोर से मनाया जाता है, जितना कि होली. यहां दीवाली और ईद की मिठाई सब मिल-बांट कर खाते है. अगर आपको त्योहार मनाने का अंदाज़ सीखना है, तो बनारस से बेहतर कुछ नहीं है.

11. और आख़िर में, बनारसी बोली और बनारसी लोग.

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राड़, साड़, सीढ़ी, घाट, सन्यासी वाली ये काशी, केवल यहीं नहीं बसती, यहां की बोली में भी बनारस बसता है. जब कभी बनारस के जाम में फंसी चारपहिया किसी के साइकिल को छू भी ले, तो आवाज़ आती है- 'का गुरु! ढेर जल्दी बा. उड़के जईबा, हेलिकाप्टर मंगवा देई'? इतनी मिठास है यहां की बोली और लोगों में, पता ही नहीं चलता कि सामने वाला गुस्से में गरिया रहा है, या मुहब्बत में. किसी ने बहुत ख़ूब कहा है,

ठगों से ठगड़ी में, संतो से सधुक्कड़ी में,
आग से पानी में, अंग्रेजों से अंग्रेजी में,
पंडितों से संस्कृत में, बौद्धों से पालि में,
पंडों से पंडई में, गुण्डों से गुण्डई में,
और निवासियों से बनारसी में बतियाता हुआ,
यह बहुभाषाभाषी बनारस है.

'गंगा-जमनी' तहज़ीब को संजोए हुए बनारस में प्रकाण्ड विद्वान और राजनैतिक जानकार, हर गली-मुहल्ले में किसी चाय या पान की दुकान पर मीटिंग करते हुए आसानी से मिल जाते हैं. जब मुंह में पान घोले कोई बनारसी ज्ञान देता है, तो लगता है कि साहित्य के नौ रस टपक रहे हैं, फिर चाहे कुछ समझ आए, न आए.

बनारस के काशीनाथ सिंह कहते हैं,

‘गुरु’ यहां की नागरिकता का सरनेम है, न कोई सिंह, न पांडे, न जादो, न राम. सब गुरु हैं यहां, जो पैदा भया, वह भी गुरु! जो मरा, वह भी गुरु ! वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतन्त्र है ‘बनारस’.
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एक बनारस जो घाटों के किनारे बसा है. एक छोटा कानपुर जो बनारस के चांदपुर में रहता है. एक दिल्ली का कनॉट प्लेस, जो बनारस की लंका में खरीदारी करता है. एक वो बनारस, जो रामनगर की रामलीला में खेलता है, जहां की लस्सी पूरे बनारस को मीठा करती है. ये वो बनारस है, जो भारतीय परम्परा का प्रमाण है. और इस बनारस के विश्वप्रसिद्ध होने का प्रमाण देने की कभी ज़रूरत महसूस नहीं हुई. ये प्राचीन वेदों में भी है और सबके दिलों में भी. जहां कण-कण में पारस है, वह शहर बनारस है और बनारस के बारे में कभी कुछ पूरा बताया ही नहीं जा सकता. इसीलिए आखिर में सबसे यही कहना चाहेंगे कि,

जो मज़ा बनारस में, वो न पेरिस में न फारस में.