आये, ठहरे और रवाना हो गये, ज़िन्दगी क्या है, सफ़र की बात है.

हैदर अली ज़ाफ़री ने भी क्या ख़ूब कहा है ना? सफ़र तो आप भी रोज़ करते हैं. रोज़ाना न जाने आप कितना सफ़र करते हैं. घर से ऑफ़िस, ऑफ़िस से सब्ज़ी मंडी, सब्ज़ी मंडी से वापस घर, पर क्या वो सफ़र है? मेरी समझ से तो नहीं. न कहीं ठहरते हैं, न रुककर सोचते हैं. पता नहीं किस बात की जल्दी रहती है कि पास में खड़े इंसान अगर परेशान हो या रो भी रहा हो तो आपको दिखाई नहीं देता.

ज़िन्दगी है तो जिये जा रहे हैं, लीक से हटकर काम करने वाले बहुत कम ही लोग हैं इस दुनिया में. यहां तक की घूमने-फिरने के लिए भी एक ढर्रे पर ही लोग कुछ ख़ासम-ख़ास जगहों पर ही जाते हैं. जिसका नतीजा ये होता है कि उन स्थानों पर भीड़ के कारण उतने मज़े नहीं आते. अगर आप फ़ोटो खिंचने के लिए ही यात्रा करते हैं तो आपको ज़्यादा परेशानी नहीं होगी.

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मशीनी ज़िन्दगी में कुछ लम्हें ख़ुद के लिये निकालना तो कोई गुनाह नहीं है. चंद लम्हें यानी कि मामा-चाचा के घर चाय-बिस्कुट पर जाना बिल्कुल नहीं है. 1 हफ़्ते की छुट्टी लेकर शिमला, कुल्लू-मनाली तो बहुत से लोग जाते हैं, पर अगर सुकून चाहिये तो किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर जाने का कोई मतलब नहीं है.

क्यों न किसी ऐसी प्राकृतिक जगह पर जाया जाये, जहां इंसानों की चहल-कदमी कम हो और घूमने का मज़ा भी दोगुना मिले?

धारचूला, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में बसा एक बेहद ख़ूबसूरत शहर है. बड़े शहर के रहनेवाले इसे कभी शहर नहीं कहेंगे, क्योंकि न तो यहां बड़े-बड़े शॉपिंग सेंटर है और न ही शहर जैसी सुविधायें. हिमालय की गोद में बसा है धारचूला. स्थानीय निवासियों के अनुसार, किसी ज़माने में इस शहर से कई ट्रेड रूट्स गुज़रते थे. हिमालय की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरा ये एक ख़ूबसूरत सा कस्बा है.

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धारचूला के निवासी, पहाड़ों के उस पार बसे नेपाल के दारचूला के निवासीयों से काफ़ी मिलते-जुलते हैं. ये जगह पर्यटकों के बीच उतनी लोकप्रिय नहीं है, इसीलिये यहां भीड़ नहीं दिखती.

समुद्रतल से 915 मीटर की ऊंचाई पर बसा ये कस्बा ख़ुद में प्रकृति के कई ख़ज़ाने समेटे हुये है. धारचूला दो शब्दों से मिलकर बना है. धार यानि कि पहाड़ी और चूला यानि चूल्हा. ये घाटी चूल्हे जैसी दिखती है, इसीलिये इसका नाम धारचूला है.

धारचूला में है बहुत कुछ-

1) जौलजिबी

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ये गौरी और काली नदी का संगम स्थल है. हर साल नवंबर में यहां मेला लगता है. नेपाल और अन्य देशों से इस मेले में लोग शामिल होने के लिए आते हैं.

2) काली नदी

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इस नदी को महाकाली या शारदा नदी के नाम से भी जाना जाता है. ये नदी नेपाल और भारत का बॉर्डर भी है. तो देर किस बात की है, आप भी यहां जाएं और नदी में अपने सारे टेंशन डाल दें. यहां जाकर आप अपनी सारी चिंताएं भूल जाएंगे.

3) चिरकिला डैम

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धारचूला से 20 किमी की ही दूरी पर है ये डैम. ये डैम काली नदी पर ही बनाया गया है. प्राकृतिक सुंदरता के अलावा कुछ ही दिनों में यहां वॉटर स्पोर्ट्स की सुविधा भी शुरू हो जाएगी.

4) ओम पर्वत

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ओम पर्वत को आदि कैलाश, बाबा कैलाश, छोटा कैलाश आदि नामों से भी जाना जाता है. इस पर्वत पर बर्फ़ से ओम की आकृति बनी हुई है. ओम पर्वत के पास में ही पार्वती झील और जोन्गलिन्गकोन्ग झील. ये तिब्बत के कैलाश पर्वत से मिलता-जुलता है.

5) Askot Musk Deer Sanctuary

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प्रकृति प्रेमियों के लिए ये जगह स्वर्ग है. 5412 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस सेन्चुअरी में विवध तरह के पशू-पक्षी और फूल-पौधे पाये जाते हैं. धारचूला जाकर यहां जाना न भूलें.

6) नारायण आश्रम

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समुद्र तल से 2734 मीटर की ऊंचाई पर बना है ये आश्रम. इसे नारायण स्वामी ने बनवाया था. आस्था न भी हो, पर यहां की प्राकृतिक सुंदरता का लुत्फ़ उठाने के लिये ज़रूर जाएं.

कब जाएं?

वैसे तो कभी भी, पर बेस्ट टाइम है, मार्च से जून या सितंबर से दिसंबर के बीच. मौसम हमेशा सुहाना रहता है, गर्मियों में न तो ज़्यादा गर्मी पड़ती है और सर्दियों में बर्फ़बारी भी होती है.

कैसे पहुंचे?

Airways: नज़दीकी हवाईअड्डा पंतनगर है. पंतनगर से धारचूला टैक्सी से पहुंच सकते हैं.

Via Rail: टनकपुर नज़दीकी रेलवे स्टेशन है. पिथौरागढ़ से 150 किमी की दूरी पर है. स्टेशन से धारचूला के लिये बसें मिल जाएंगी.

Via Road: रेल मार्ग से अच्छे से लिंक न होने के बावजूद धारचूला तक सड़कें जाती हैं. तो 4 Wheeler बुक कीजिए और निकल पड़िए धारचूला.

यूं तो इंसानों ने हर जगह सरहदें बना दी हैं, पर धारचूला में आपको नेपाल के साथ दोस्ताना रिश्तों की अनोखी झलक दिखेगी. हमारी मानिये और इस बार धारचूला का प्रोग्राम बना लीजिए.

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