... इंसानियत की मौत का वीडियो बनाने लगे.

हमें पता था कि आप ये हेडलाइन पढ़ कर पूरी News पढ़ने और वीडियो देखने ज़रूर आयेंगे, लेकिन न तो यहां कोई वीडियो है और न ही कोई News. यहां है तो बस एक आइना.

टेक्नोलॉजी की रेस और मशीनों की भीड़ ने इस आधुनिक दुनिया में क्रांति का नया इतिहास लिख दिया है. पर ये तो आप मानेंगे कि हर इतिहास को रचने के लिए किसी न किसी चीज़ की क़ुरबानी देनी पड़ती है. लेकिन अब सवाल ये पैदा होता है कि इस क्रांति में किसकी बलि चढ़ी है? जहां एक तरफ टेक्नोलॉजी ने इस दुनिया को एक छोटा सा कुनबा बना दिया है, वहीं कुछ लोगों ने इस तकनीक को अपनाकर अपना ज़मीर खो दिया है. उन्होंने इंसानियत बेच कर नए दौर का ये सौदा खरीदा है. संवेदना हमारे अन्दर बस इतनी बची है कि हम सोशल मीडिया पर किसी के तड़प-तड़प कर मरने वाले वीडियो पर Sad Smiley बना देते हैं. अगर Matter गंभीर हो और ज़्यादा संवेदनशील हो, तो हम सरकार को गरिया देते हैं और वहां खड़ी भीड़ को नपुंसक बता देते हैं.

बात कुछ रोज़ पहले की है. अनवर अली नाम का एक लड़का सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया और सड़क के किनारे पड़ा तड़प रहा था. हर आते-जाते आदमी को देख कर उसकी आंखें मदद की भीख मांग रही थीं, पर कोई आगे नहीं आया. हां, कुछ लोग आगे ज़रूर आये थे, पर जेब से महंगा फ़ोन निकाल कर मौत का ये तमाशा अपने फ़ोन में रिकॉर्ड कर चले गये. उनके दिमाग के अंधेरे गलियारों में एक ही बात चल रही होगी, कि वीडियो पर सौ से ज़्यादा लाइक आ जाएं और एक-आध लोग शेयर भी कर दें. अनवर अली मर गया, वहीं रोड पर. हम किसी को ब्लेम नहीं कर रहे, क्योंकि हम अपने देश में चल रहे ब्लेम गेम का हिस्सा नहीं बनना चाहते. होता तो यही आया है हमेशा से, आप मुझे बोलेंगे, मैं उसको बोलूंगा और वो किसी और को. कोई सामने नहीं आएगा ऐसे. लेकिन सोचने की बात ये है कि अगर आपका बेटा या भाई या कोई अपना वहां पड़ा तड़प रहा होता, तो भी वीडियो की क्वालिटी इतनी ही अच्छी होती क्या? वीडियो तो आप तब भी बना रहे होते क्योंकि आपको आदत जो पड़ चुकी है इसकी.

एक लड़की भी थी, बहुत शांत और शरीफ़. रोज़ किसी स्कूल में पढ़ाने जाती थी. एक मनचला आशिक़, जो उम्र में उसके पिता के बराबर था, उसके प्यार में पड़ गया. हमेशा उसका पीछा करने लगा और शादी करने की ज़िद करने लगा. लड़की नहीं मानी, तो कैंची के एक टुकड़े से लड़की के शरीर पर वार कर कई छेद कर दिए. लोगों ने बिना कैमरा शेक किये इस दर्दनाक मंज़र का वीडियो बनाया और कर दिया वायरल. वीडियो में आवाज़ भी आ रही थी कि ये क्या कर रहा है, ऐसे लड़की मर जाएगी!, पर जिस फ़ोन से वो वीडियो बना रहे थे, उसी फ़ोन से पुलिस को सूचित करते नहीं बना. न ही उनमें इतनी हिम्मत हुई कि एक पतले से सनकी आदमी को, जो बीच सड़क पर लड़की को मार रहा है, रोक दें.

Source: Cheatsheet

किसी Newspaper के लास्ट पेज पर किसी दिन एक News छपी थी कि मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से इंसान नपुंसक हो सकता है. आज उस ख़बर की सार्थकता नज़र आ रही है. क्या वाकई दुनिया इतनी असंवेदनशील हो गई है कि दूसरे इंसान को मरते देख कर उसे कुछ महसूस नहीं होता! अभी हाल ही में गाज़ियाबाद में ऑटो और ऑडी की टक्कर हो गई थी, जिसमें मौका-ए-वारदात पर एक महिला की सांसें चल रही थीं. उसे अगर हॉस्पिटल ले जाया जाता तो शायद वो बच जाती. मगर भीड़ को वीडियो बना कर सबको दिखाना ज़्यादा इंसानियत वाला काम लगा.

हमारी सोच कुछ ऐसी हो गई कि "क्या सनसनीखेज़ वीडियो है BC, इसे Whatsapp ग्रुप पर शेयर करता हूं, बहुत वाहवाही मिलेगी". सच है न? हमारा ध्यान किसी की मदद से ज़्यादा इस बात पर होता है कि ये ख़बर वायरल हो गयी, तो मेरा नाम हो जायेगा. अगर यही भावना हम किसी को बचाने में दिखा देते, तो शायद अभी तक सोशल मीडिया पर किसी के तड़प-तड़प कर मरने की कोई वीडियो नहीं होती.

अभी कुछ दिन पहले की बात है, जब हमारे कुछ दोस्त मेट्रो में सफ़र कर रहे थे. अचानक ही गेट खुल कर बंद हो जाने से एक आदमी का हाथ दरवाजे़ में फंस गया और इसी हालत में मेट्रो चल पड़ी. डर के मारे उस आदमी की चीख निकल आई, तब सबको पता चला कि माजरा क्या है? इतने में ही कुछ लड़के आये और फ़ोन निकाल कर रिकॉर्डिंग का महान काम करना शुरू कर दिया. टोकने पर उनका जवाब था कि अपना काम करो न, मेरा फ़ोन है, जो मर्ज़ी वो करूंगा! उसे समझाने के बाद भी उसे अपनी गलती का एहसास नहीं था. क्या इसमें भी सरकार का ही दोष है या पड़ोसी मुल्क का हाथ है? कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि दूसरों की मदद करने के लिए कड़ा क़ानून लाने की ज़रुरत है. पर सोचने की बात ये है कि मदद करने के लिए भी क़ानून लाना इस बात का सूचक है कि हम किसी तरह से इंसानियत को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रहे हैं. जब आप बच्चे थे और सही से चल नहीं पाते थे, तो उस वक़्त आपके पिता जी या मां आपको संभालने के बजाए Selfie लेने लगते, तो आप यहां पहुंच ही नहीं पाते.

Source: Aljazeera

कोई दवाई नहीं है, तुम्हारी इस बीमारी की और ये बीमारी तुम्हें मारेगी नहीं, बल्कि कायर बना कर छोड़ देगी. तुम इतने कायर हो जाओगे कि बुरे वक़्त में तुम्हें किसी अपने की नहीं, बल्कि मोबाइल फ़ोन की याद आएगी. आज सड़क पर जिन्हें आप चलते-फिरते देखते हैं, वो इंसान नहीं होते, वो भीड़ होती है. वहां आपको ईमानदारी, अच्छाई, फीलिंग्स और संवेदना नाम की कोई चीज़ नहीं मिलेगी. भीड़ जब घर से निकलती है, तो इन मूल्यों को घर रख कर आती है. जैसा अभी हाल है, उस हिसाब से तो भविष्य की कल्पना रूह सिहरा देने वाली होती है.

अगर अभी भी आप कहीं बच्चे के ट्रक से कुचले जाने या लड़की के फांसी लगाये जाने की वीडियो Whatsapp ग्रुप में और फेसबुक पर शेयर करते हैं, तो एक बार अपने अंदर झांक कर किसी कोने में बीमार पड़ी संवेदना को झकझोर कर उठाइए और उससे पूछिए कि क्या ये सही है? अगर आपके अन्दर से भी कुछ एहसास नहीं होता, तो आप अपना काम करते रहिये, क्योंकि इसमें गलती आपकी नहीं है. टेक्नोलॉजी के दौर में हमने और आपने बहुत कुछ पाया है, मगर अफ़सोस ये है कि इंसानों को खो दिया है.

Feature Image: D.C.