मंदिर में मां दुर्गा की आरती चल रही है, जिसमें एक श्लोक बार-बार कानों में गूंज रहा है:

'या देवी सर्वभूतेषु शांति रूपेण संस्थिता,

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,

या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता,

नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमो नमः

थोड़ी देर में कानों में गूंज रही आवाज़ बंद हो जाती है, आरती पूरी हो गयी है. घंटी बजने की आवाज़ आती है, शायद लोग अपने घर जा रहे हैं.

Time-pass करने के लिए मैं अपनी फ़ेसबुक Scroll करने लगती हूं, एक लड़की की पोस्ट वायरल हो रही है. 'उसने शादी से मना कर दिया क्योंकि उसे Doubt था कि लड़का उसका साथ नहीं निभा पाएगा'. सब लड़की की पीठ थप-थपा रहे थे, लाइक का बटन दबा कर.'

फे़सबुक पर हिट हुई इस लड़की के घर का सीन इस वर्चुअल दुनिया से बिलकुल अलग था.

उसके मां-बाप सारी रात नहीं सो पाते, क्योंकि बेटी ने ऐसा फै़सला लेते हुए उनकी बिलकुल भी नहीं सुनी, रिश्तेदार आपस में बात कर रहे थे कि और चढ़ाओ लड़की को सिर पर. वो लड़की सोच रही है कि काश मैं इस सिचुएशन को हैंडल करने के लिए कुछ कर पाती, काश वो कुछ कर पाती!

शक्ति के रूप, दुर्गा की पूजा करते हैं हम और एक लड़की को इतना मजबूर बना देते हैं कि वो अपने सही फै़सले पर सारी ज़िन्दगी अफ़सोस करती रह जाती है.

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साल में दो बार हम 9 दिन 'जय माता दी' करते हैं, लेकिन बाकी के 365-9-9 दिन उसी दुर्गा को अपनी सोच पर इतना आश्रित बना देते हैं कि वो घर से दोस्त के यहां जाती है, तो भाई कहता है कि दो घंटे में वापस आ जाना. पति से पूछे बिना एक रुपया भी खर्च न करने वाली अगर कभी 10 रुपये एक्स्ट्रा खर्च कर लेती है, तो उसे हिसाब देना पड़ जाता है.

ये वो दुर्गा नहीं, जो निर्भीक हो कर शेर पर सवार रहती है. ये गलियों से सहम कर गुज़रती है, रात को अकेले चलने से डरती है, ग़लत के खिलाफ़ बोल नहीं पाती है. ऐसी दुर्गा बना रहे हैं हम.

दुर्गा बनने ही कहां देते हैं हम?

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घर के चमचमाते मंदिर में उसे जगह तो दे दी, लेकिन उस दूसरी दुर्गा को वहीं बांध दिया हमने. बांध दिया कि वो कुछ भी करने, कहने से पहले समाज, अपनी इज़्ज़त, परिवार-खानदान की इज़्ज़त के बारे में सोचे. बांध दिया उसे कि वो चरित्र का प्रमाण देती रहे, वरना Whore, Slut, Bitch, रंडी कहलाने के लिए तैयार रहे. वो कहलाएगी एक बिगड़ी हुई औलाद, अगर मां-बाप ने उसे बांधा नहीं. इसलिए हम उस ज्वाला को, उस जगतजननी को बांध देते हैं.

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कैसे बनेगी दुर्गा वो, जब Higher Studies की जगह उसकी शादी और बच्चों को तरजीह दी जाती है? कैसे कहेगी वो अपने मन की बात, जब शंख की जगह उसके हाथ में घर की चाबियां पकड़ा दी जाती हैं? कैसे बनेगी वो दुर्गा-काली, जब वो एक ही चरित्र में बांध दी जाती है?

अगर देवताओं ने भी उस दुर्गा पर Limitations लगाई होती, तो क्या वो बन पाती 'दुर्गा'? अगर उसे कहा जाता कि तुम दिन में तो राक्षसों को मार सकती हो, लेकिन रात में नहीं, क्योंकि तब 'सेफ़' नहीं होता. अगर उसे कहा गया होता कि दुनिया की सारी ज़िम्मेदारी तुम्हें ही निभानी है, तो क्या आज हम करते उसकी पूजा? अगर उसे इतने शस्त्र न देकर, बस एक ढाल दी जाती कि इसे खु़द को बचाने के लिए रखना, तो क्या हम सिर नवाते उसके दर पर?

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जिस रूप में हम देवी की आराधना करते हैं, वो इतना Liberal और स्वच्छन्द है कि अगर 'Modern सन्दर्भ' में उसकी परिकल्पना की जाए, तो बहुत लोगों को उस 'औरत' से आपत्ति हो सकती है. क्योंकि वो उनके तय मानकों में Fit नहीं बैठेगी.

हमें सोचने की ज़रूरत है कि हम इस समाज को कैसी दुर्गा दे कर जाएंगे?

वो, जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रह जाएगी, या वो जो समाज में अपनी भागीदारी निभाएगी. अगर नहीं सोच पाए, तो इस युग में दुर्गा पैदा होने से रही. हुई भी, तो Sex Determination में मारी जाएगी, या फिर किसी अहम के नीचे कुचल दी जाएगी.

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