हिन्दुस्तान, यानि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र. हमारा संविधान भी दुनिया के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है. जनता के अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में बताया गया है.

अभिव्यक्ति की आज़ादी... पिछले कुछ सालों में इस अधिकार पर बहुत ज़्यादा बात हो रही है. हम इस अधिकार की आड़ में कुछ भी कहने लगे हैं, कुछ भी लिखने लगे हैं, कुछ भी बोलने लगे हैं. कभी-कभी तो लगता है संविधान में एक कर्तव्य ये भी होना था, 'सोचने का कर्तव्य'.

इतना बड़ा गणतंत्र है, अनेक धर्म, जाति, सोच के लोग यहां रहते हैं, विचारों का न मिलना लाज़मी है. हम जब किसी भी बात या घटना से असंतुष्ट होते हैं, तो उसका विरोध करते हैं. मामला है विरोध के तरीके का. चाहे वो किसी विचारधारा से असंतोष हो, किसी क़ानून से असंतुष्टी हो, अपने मौलिक अधिकारों की लड़ाई हो. सभी बातों का विरोध करने का एक ही तरीका लोग अपनाने लगे हैं... हिंसात्मक तरीका.

कुछ संगठन 'पद्मावत' से ख़फ़ा हो गए. जो दिखा तोड़ डाला, जला डाला, फ़िल्म बनानेवालों के सिर पर ईनाम रख डाला.

राम रहीम पर बलात्कार का इल्ज़ाम सिद्ध हुआ, देश का उत्तरी हिस्सा सिर पर उठा लिया. मार-काट मचा दी.

आरक्षण लेने के लिए कभी जाट, कभी गुर्जर तो कभी कोई और जाति सड़कों पर उतर आई. दुकान, गाड़ियां जलाई सो जलाई. महिलाओं के साथ बलात्कार तक किया? ये विरोध का तरीका है?

स्कूल/कॉलेज/विश्वविद्यालय प्रशासन का कोई नियम पसंद नहीं आया. तोड़-फोड़ कर डाली, क्लासेस बंद करवा दी.

क्या एक बार भी सोचा है, कि जोश-ओ-ख़रोश से हिंसा के नशे में चूर होकर आप जो भी चीज़ों की आहुति देते हैं, उनकी क़ीमत क्या होती है?

ये है उन चीज़ों की क़ीमत-

देश में जब भी भीड़ पागल होकर उत्पात मचाने लगती है, तो इतना नुकसान होता है. अब इसी को आप दोगुना-तिगुना-चौगुना करके सोचिये. इतनी गणित हमसे ऊंगलियों पर नहीं हो पाएगी, कैल्क्युलेटर की आवश्यकता पड़ेगी. चंद पलों का खेल और सब स्वाहा! भीड़ का कोई मज़हब, कोई ईमान नहीं होता. भीड़ औरत-बच्चों तक में फ़र्क नहीं करती, बस सब बर्बाद करने पर आमादा रहती है.

कभी सोचा है कि इन सब की भरपाई कैसे होती है? ये जो प्राइवेट गाड़ियां, घर, दुकान या फिर बस, ट्रेन, पुल आदि तोड़ दिये जाते हैं, इससे होने वाले नुकसान को कौन भरता है. ट्रेन तो सरकारी हो गई, दो-पहिया, चार-पहिया वाहन, बसें, दुकानें इन सब की क़ीमत कौन चुकाता है? हिंसा करने वालों के घर जा-जाकर तो पैसे नहीं मांगे जाते? घंटों ऑफ़िस में मेहनत करके जो पैसे कमाते हैं और ईमानदारी से देश की उन्नति के लिए जो टैक्स भरते हैं, उसी से नुकसान को भरा जाता है.

हिंसात्मक प्रदर्शनों से न सिर्फ़ जान और माल का नुकसान है, बल्कि हर व्यक्ति का नुकसान है. उस मिडिल क्लास आदमी का नुकसान है, जो हिंसा के कारण ट्रैफ़िक जाम में फंसा रह गया और दफ़्तर नहीं पहुंच पाया. उस छात्र का नुकसान जो 144 के कारण स्कूल नहीं पहुंच सका. उस दिहाड़ी मज़दूर का नुकसान है, जो अपने काम पर न पहुंच सका.

अंत में इन सब से क्या हासिल होता है? फ़र्ज़ करिये कि अगर पब्लिक प्रॉपर्टी की इतनी बर्बादी नहीं होती, तो हमारे ही विकास के लिए क्या कुछ नहीं हो सकता था. बसों की संख्या से लेकर, अच्छी सड़कें, घर सब बन सकते थे. सोचिये, क्योंकि सोचना ज़रूरी है.

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