जेएनयू के मुद्दे पर होने वाली बहसों के दौरान आपने न्यूज़ चैनल्स पर 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के बारे में सुना होगा. ये वही अधिकार है, जिसके बलबूते पर ही समाचार पत्र और न्यूज़ चैनल आप तक किसी ख़बर को पहुंचा पाते हैं. हालांकि ख़ुद के संदर्भ में मीडिया चैनल इस अधिकार को प्रेस की आज़ादी से जोड़ देते हैं. ख़बर पहुंचाने की जल्दी में ख़ुद कई बार मीडिया चैनल इस अधिकार की धज्जियां उड़ा देते हैं.

नोटबंदी के समय बड़े मीडिया संस्थानों द्वारा 2000 रुपये के नोट में चिप और सैटेलाइट की ख़बरों को कोई अभी तक भूला नहीं. ये एक कोरी अफ़वाह के सिवा कुछ नहीं थी. ख़बरों को तेज़ी से पहुंचाने के चक्कर में मीडिया चैनल ख़ुद इस बात को भूल जाते हैं कि जिन चीज़ों को वो कॉन्टेंट कहते हैं, दूसरे लोगों के लिए वही एक ख़बर होती है, जिस पर वो आंख बंद कर भरोसा करते हैं.

अगर आप सोचते हैं कि ऐसा करने में सिर्फ़ हिंदी मीडिया चैनल ही आगे हैं, तो आप ग़लत हैं क्योंकि अफ़वाहों को ख़बर बनाने के मामले में इंग्लिश के बड़े मीडिया हाउस भी कुछ कम नहीं. ताज़ा मामला दो बड़े वेब पोर्टल्स का है, जिनमें से एक हिंदी का जाना-माना अख़बार है. जबकि इसी ख़बर को इंग्लिश में छापने वाली वेबसाइट है, जो फ़ेसबुक के ज़रिये एक बड़े तबके तक ख़बरों को पहुंचाती है.

आंख बंद करके छाप दी झूठी ख़बर

हाल ही में इन दोनों मीडिया संस्थानों ने एक ख़बर प्रकाशित की, जिसमें बिहार के किशनगंज में लगने वाले खगड़ा मेले के बारे में बताया गया था. प्रकाशित ख़बर में बताया कहा गया कि खगड़ा मेला एक ऐसा मेला है, जहां पर महिलाओं की बोली लगाई जाती है. इस मेले में बड़ी संख्या में देह व्यापार करने वाली महिलाएं आती हैं और अपने जिस्म के लिए बोलियां लगवाती हैं.

हिंदी अख़बार ने अपनी इस ख़बर को शीर्षक दिया है:

'ऐसा मेला जहां सरेआम बिकती हैं महिलाएं, ज्यादा बोली लगाओ, मनचाही पाओ'

वहीं इंग्लिश वेबसाइट ने इसी ख़बर का अंग्रेज़ी अनुवाद किया है. हालांकि ज़िम्मेदारी से बचने के लिए वेबसाइट ने पहले ही ख़बर का क्रेडिट अख़बार को दे दिया. वेबसाइट ने इस ख़बर को शीर्षक दिया:

'Have You Ever Heard Of Bihar’s Khagra Fair Where People Openly Bid For Female Prostitutes?'

सच्चाई

असल में ये मेला सोनपुर के बाद एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला हुआ करता था, जहां दूर-दूर से व्यापारी पशुओं की खरीद-फ़रोख़्त के लिए आते थे. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अंग्रेज़ी हुकूमत के समय इस मेले की नींव तत्कालीन खगड़ा नवाब सैयद अता हुसैन ने रखी थी. इस मेले के बारे में इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 1950 में इसमें करीब 80 लाख रुपये के पशुओं की बिक्री हुई थी. 80 के दशक से इस मेले की रौनक कम होने लगी और आखिरकार ये बंद होने की कगार पर आ गया. साल 2000 में इस मेले को फिर से सजाने का प्रयास शुरु हुआ, जिसमें आम लोगों के साथ-साथ प्रशासन ने भी अपना सहयोग दिया.

ख़ैर, हाल ही में किशनगंज के DM पंकज दीक्षित ने ख़ुद इस मेले का शुभारम्भ किया, जिसके बाद मेले में रौनक सजने लगी है. हमने ख़ुद इस मामले को ले कर कुछ स्थानीय लोगों से बात की, जिन्होंने अमर उजाला में छपी ख़बर को अफ़वाह बताया है. इसके साथ ही हमने किशनगंज के DM पंकज दीक्षित को Mail भेजी और उनके जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं.

जैसे ही हमें उनकी तरफ़ से कोई सूचना मिलती है हम आपको तुरंत एक सच्ची ख़बर के रूप में आगे की जानकारी देंगे.

बाकि ख़बर देखते वक़्त ध्यान रखिये कि टेलीविज़न पर भी सब सच नहीं होता. क्योंकि ऐसे ही अफ़वाहों को ख़बर बना कर मीडिया आपके दिमाग़ के साथ खेल रहा है.