कॉर्पोरेट कंपनियों का बड़ा मीठा हथियार होता है, CSR (Corporate Social Responsibility). इस हथियार की बदौलत बड़ी-बड़ी कंपनियां दुनिया के सामने अच्छा बच्चा बनने का गेम खेलती हैं और दुनिया मासूम मां-बाप की तरह मान भी जाती है कि बच्चा सच में अच्छा है. पूछेंगे कि CSR क्यों? यार तुम अंदर से कैसे भी हो, बाहर तो अच्छा बनना ही पड़ता है. बस इसी Human Emotion की उपज है CSR.

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McDonald's भी ख़ूब CSR करता है. अपने फ्रेंच फ्राइज़ के लिए आलू ग़रीब किसानों से ख़रीदता है, ताकि 'उनका' भला हो सके. ऐसे Marketing Campaigns करता रहता है, जिससे दुनिया की गुड बुक्स में उसका नाम रहे. उसके बर्गर के लिए दीवाने हम भारतीय वैसे ही हैं. इसलिए जहां भी McDonald's खुलता है, वहां हम Housefull कर देते हैं.

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लेकिन ग्वालियर के McDonald's में एक महिला के साथ जो हुआ, उसने दो चीज़ें साबित कर दीं. एक तो ये कि ग़रीबी किसी को नहीं पसंद और दूसरी, CSR शेक्सपियर के नाटक से बड़ा नाटक है.

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मनीषा कुलश्रेष्ठ अपने परिवार के साथ ग्वालियर के McDonald's में बैठी थी और बाहर से उन्हें एक गरीब बच्चे अंदर की तरफ़ नज़र गड़ाए दिखे. उनके हाथों में गुब्बारे थे, जिन्हें बेच कर वो अपना पेट भरते होंगे. मनीषा ने इन बच्चों को अंदर बुलाया और सबके लिए बर्गर ऑर्डर किये. इन बच्चों को देखते ही वहां के स्टाफ़ का मुंह बन गया था. ये गंदे बच्चे उनके कस्टमर्स नहीं थे. मनीषा ने इनके लिए जैसे ही ऑर्डर किया, बाहर इन बच्चों के गुब्बारों की रखवाली कर रहे एक बच्चे की चीखने की आवाज़ आई. एक सिक्योरिटी गार्ड ने उनके सारे गुब्बारे फोड़ दिए. अपनी सफ़ाई में उसने कहा कि ये बच्चे बुरे हैं और ये McDonald's में आने वाले लोगों पर पत्थर मारते हैं. ज़ाहिर था कि वो झूठ बोल रहा था, क्योंकि वहां Regularly आने वाले कुछ कॉलेज स्टूडेंट्स ने इस बात से इनकार किया.

इस घटना के बाद ही मनीषा ने McDonald's की बेरुखी और उन बच्चों के साथ किये दुर्व्यवहार को अपनी फ़ेसबुक पोस्ट के ज़रिये सामने रखा. उनकी इस पोस्ट के बाद ही कई मेनस्ट्रीम न्यूज़ चैनल्स और अख़बारों ने इसे कवर किया.

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