हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बॉलीवुड के कुछ बड़े निर्देशकों-निर्माताओं और अभिनेताओं के साथ बैठक हुई. इस बैठक का मुद्दा था एक इंडस्ट्री के तौर पर बॉलीवुड के प्रभुत्व और प्रभाव पर बात करना.

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बॉलीवुड, जिसे एक्टर, डायरेक्टर, तकनीशियन, निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर मिल कर एक इंडस्ट्री बनाते हैं, उसमें कई महत्वपूर्ण ओहदों पर कई महिलाएं भी हैं. हालांकि इस तस्वीर को देखने के बाद आपको ऐसा बिलकुल नहीं लगेगा.

PM मोदी के साथ हुई बॉलीवुड इंडस्ट्री की बैठक में एक भी महिला नहीं थी.

हमें ये लगता है कि बॉलीवुड में महिलाएं अब ज़रूरी पद संभाल रही हैं और ये इंडस्ट्री अब पुरुषप्रधान नहीं है लेकिन बॉलीवुड को ऐसा नहीं लगता.

उन्हें नहीं लगता कि एक अभिनेत्री एक फ़िल्म को अपने कन्धों पर चला सकती है.

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उन्हें नहीं मालूम कि कोई महिला डायरेक्टर एक बेहतरीन फ़िल्म बना सकती है.

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शायद वो भूल गए होंगे कि साई परांजपे नाम की एक औरत ने 'चश्मे बद्दूर' जैसी फ़िल्म बनाई थी या ज़ोया अख़्तर ने 'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा' जैसी फ़िल्म बनाई थी.

या जूही चतुर्वेदी, रीमा कागती, मेघना गुलज़ार जैसी बेहतरीन राइटर-डायरेक्टर भी इंडस्ट्री में हैं.

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ख़ुद इंडस्ट्री ये भूल गयी कि हॉलीवुड और विश्व में भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व प्रियंका चोपड़ा नाम की कोई एक्ट्रेस कर रही है.

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इस मीटिंग में भले ही कुछ अच्छी बातें और बॉलीवुड के भविष्य पर सोचनीय विचार रखे गए हों लेकिन इतने महत्वपूर्ण प्लैटफ़ॉर्म पर महिलाओं को Include (हिस्सा बनाना) न करना एक इंडस्ट्री के रूप में बॉलीवुड की विफ़लता को दर्शाता है.