'मुझे लगता है हर फ़िल्म शुरू करने से पहले आपने जो भी सीखा है, उसे काफ़ी हद तक भूलना होता है और एक नई शुरुआत करनी होती है. मैंने सबसे पहले ऐसा 'दिल चाहता है' के दौरान महसूस किया था. स्क्रिप्ट पढ़ने के दौरान मैंने फ़रहान से कहा था कि यार तुमने जिस हिसाब से ये स्क्रिप्ट लिखी है, वो बेहद मॉर्डन है, बहुत अलग है. मैं पारपंरिक अंदाज़ में अगर इस फ़िल्म में एक्टिंग करूंगा, तो कैरेक्टर के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा. मुझे इस किरदार में फ़िट होने के लिए एक नए सिरे से शुरुआत करनी होगी.'

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आमिर खान का ये बयान फ़रहान अख़्तर की पहली फ़िल्म के बारे में काफ़ी कुछ कहता है. 'दिल चाहता है' अपने बनने के डेढ़ दशक बाद एक कल्ट क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी है. कई विशेषज्ञों द्वारा इसे पहली ऐसी फ़िल्म माना जाता है, जिसने सही मायनों में बॉलीवुड को 'कूल' बनाने की शुरुआत की थी.

कहानी कहने के अंदाज़ से लेकर, अल्ट्रा मॉर्डन संगीत और किरदारों पर की गई मेहनत 'दिल चाहता है' को अपने समय से कहीं आगे की फ़िल्म बनाती है.

फ़िल्म की प्रेरणा

इस फ़िल्म की प्रेरणा, फ़रहान को अपने बेपरवाही के दिनों के अनुभवों से मिली थी. लास वेगास और न्यूयॉर्क की ट्रिप के अनुभवों को उन्होंने अपनी डायरी में उकेरा था. 1996 में इस सिलसिले में उन्होंने अपने एक दोस्त की कहानी भी सुनी थी. डायरी के इन्हीं कुछ अनुभवों को उन्होंने स्क्रिप्ट की शक्ल दी. माना जाता है कि फ़िल्म में आमिर खान और प्रीति ज़िंटा के किरदार भी फ़रहान के दो दोस्तों से प्रेरित थे. फ़रहान पारंपरिक बॉलीवु़ड के बीच एक ऐसी कहानी कहना चाहते थे, जिससे देश का एक Upper Class रिलेट कर पाती. साउथ बॉम्बे की वो क्लास जिसे बिना लार्जर दैन लाइफ़ बनाए, एक रियलिस्टिक तरीके से दिखाया जा सकता है.

संगीत या किरदार?

इस फ़िल्म ने शंकर-एहसान-लॉय को बॉलीवुड के बड़े म्यूज़िक निर्देशकों की जमात में ला खड़ा किया था. फ़िल्म के लिए यूं तो ए.आर. रहमान को अप्रोच किया गया था लेकिन उनके उपलब्ध न होने के बाद इस तिकड़ी ने अपने एक्सपेरिमेंट्ल संगीत से लोगों के दिलों को छू लिया. 'दिल चाहता है' उन चंद फ़िल्मों में शामिल है, जहां संगीत किरदार की शक्ल में नज़र आता है. फ़िल्म में मेलोड्रेमेटिक साउंड्स के इस्तेमाल ने त्रासदी या दुख भरे सीन्स को जीवंत करने का काम किया. Subtle तरीके से फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर हर महत्वपूर्ण सीन पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहा, जिसका सबसे ख़ास उदाहरण फ़िल्म की शुरुआत में देखा गया था.

फ़िल्म की शुरुआत में आमिर, सैफ़ और अक्षय एक नाइट क्लब में होते हैं. 2000 के दशक के आसपास अक्सर डिस्कोथेक में 70 या 80 के दशक का पॉप म्यूज़िक सुनाई देता था. लेकिन ये शायद पहली बार था, जब फ़िल्म में क्लासिक टेक्नो म्यूज़िक का इस्तेमाल किया जा रहा था. टेक्नो उस समय जर्मनी के बर्लिन में खास तौर पर पॉपुलर था और आज भी बर्लिन टेक्नो पार्टी के लिए दुनिया भर में विख्यात है. ब्रिटेन और अमेरिका में भी ये जॉनर बेहद मशहूर हो रहा था.

गपशप के बीच अक्षय खन्ना, टिशू पेपर पर प्रीति जिंटा की तस्वीर बना देते हैं और आमिर इस तस्वीर को देख हैरान रह जाते हैं. आमिर जब अक्षय से इस लड़की के बारे में पूछते हैं तो बैकग्राउंड में टेक्नो म्यूज़िक में ड्रॉप शुरू होता है और सामने प्रीति ज़िंटा हंसते हुए नज़र आती हैं. स्लो मोशन शॉट में प्रीति की मुस्कुराहट और उस पर बैकग्राउंड स्कोर, इसे एक बेहतरीन सीन बना देता है. ये दिलचस्प है कि फ़रहान ने फ़िल्म में अपने सभी लीड अभिनेताओं की एंट्री साधारण ही रखी लेकिन फ़िल्म की लीड अदाकारा की एंट्री को अद्भुत तरीके से प्रस्तुत किया.

प्यार की तलाश में पूरी होती कहानी

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फ़िल्म के न केवल तीनों किरदार एक-दूसरे से बेहद अलग हैं बल्कि प्यार को लेकर राय भी इतर है. जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, प्यार को लेकर उनकी समझ भी विकसित होती है. आमिर अपनी रिलेशनशिप्स को गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन अंत में वो प्रीति ज़िंटा से बेइंतहा मोहब्बत करने लगता है. अक्षय खन्ना धीर और गंभीर है. वे इस बात को जानते हैं कि प्रेम को लेकर उनकी सोच भी पारंपरिक नहीं है और यही बात आमिर और अक्षय के बीच दरार का कारण भी बन जाती है. वहीं सैफ़ अली खान अपने कंफ़र्ट ज़ोन और कंफ़्यूज़न के बीच सहजता से ज़िंदगी में आने वाले प्यार को तहे दिल से स्वीकार लेते हैं.

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इस फ़िल्म से पहले तक फ़रहान अपने करियर के प्रति गंभीर नहीं थे - घूमना-फिरना, दोस्तों के साथ चिल करना. कह सकते हैं कि फ़िल्म के किरदारों की तरह ही उनकी लाइफ़ भी मौज में कट रही थी. एक शो के दौरान करण जौहर भी उनके करियर को लेकर चिंता ज़ाहिर कर चुके थे. लेकिन फ़िल्म के रिलीज़ के साथ ही फ़रहान की ज़िंदगी बदल गई. फ़रहान भी इस फ़िल्म को अपनी लाइफ़ का टर्निंग पॉइन्ट मानते हैं. उन्होंने एक पूरी जनरेशन की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को पर्दे पर उतारा. 'दिल चाहता है' ने बेस्ट फ़िल्म का नेशनल अवॉर्ड भी जीता लेकिन फ़रहान इस फ़िल्म के स्तर का जादू नहीं दोहरा पाए.