एक बलात्कार जिसने कुछ हद तक हमें बलात्कार के बारे में सोचना सिखाया. हमें गुस्सा दिलाया. हमारा दिल दहला दिया. जैसे पूरा भारत, पूरा विश्व एक आवाज़ में बोल रहा था, कि क्यों हुआ ऐसा निर्भया के साथ! लेकिन फिर क्या हुआ? क्या बलात्कार के लिए कोई ऐसा क़ानून बना कि बलात्कारियों के दिल में ख़ौफ़ पैदा हुआ? नहीं! क्योंकि एक निर्भया के मरने के बाद हर दिन, हर साल कितनी ही निर्भयाएं बनती जा रही हैं, उन मर्दों की बदौलत जो अपनी काम इच्छा को बस में नहीं कर पाते. वो सोचते हैं कि ज़बरदस्ती करना कोई पकड़े जाने वाला, कड़ी सज़ा पाने वाला काम ही नहीं!

source: jansatta

मुम्बई में एक बच्ची के साथ उसका अध्यापक करता रहा ज़बरदस्ती. और उसके खिलाफ एक नहीं, बल्कि पूरी 18 कम्प्लेंट्स थीं! लेकिन जिस स्कूल में वो पढ़ा रहा था, उसके लिए ये शायद बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि न उसे निकाला गया, न उसे पुलिस के हवाले किया गया. मतलब, उसे शह मिली, और बलात्कार करने की.

एक बच्ची को उसके दोस्तों ने बर्थडे पार्टी में बुलाया, उसके कोल्ड ड्रिंक में नशे की दवा मिलाई और उसके साथ गैंग रेप किया.

एक लड़की जो घर जाने के लिए बस स्टॉप पर खड़ी थी, उसे एक ड्राइवर ने अपनी गाड़ी में लिफ्ट दी, लेकिन रेप करने के लिए.

क्या हो रहा है ये? ये तो बस पिछले कुछ दिनों के केसेस हैं. साल भर के तो अनगिनत होंगे! तो आखिर वो क्या है जो आदमियों को रेप के लिए उकसाता है? आइये जानें कुछ Psychologists से.

1. कमला नेहरु कॉलेज, दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और Sexual Crime Against Women in Delhi जैसे विषय पर पीएचडी कर चुके डॉ. तारा शंकर कहते हैं कि,

ये मेंटेलिटी ही ऐसी होती है. हमारा दिमाग पुरानी परम्पराओं और आदतों से घुला-मिला है. रेप से महिला और पुरुष दोनों प्रभावित होते हैं. लेकिन महिलाएं ज़्यादा इससे प्रभावित हैं. कुछ जनजातियों को छोड़ दें तो हर जगह महिलाओं को उपभोग करने का सामान ही समझा जाता है. दिमाग में औरत को प्रति ये जो नज़रिया है, वो ही गलत है. जहां तक रेप की बात है तो अगर मौका मिल जाए तो समाज का हर दूसरा या तीसरा व्यक्ति रेपिस्ट निकलेगा.

अगर सेक्सुअल डिज़ायर होने पर उसे मास्टरबेट आदि के द्वारा पूरा कर लिया जाए, तो रेप करने तक बात नहीं पहुंचेगी. पॉर्न, कपड़े या दूसरी वजहें तो सिर्फ़ माध्यम हैं. मौका मिलने के बाद अगर पकड़े जाने का डर न हो तो लोग रेप करने से संकोच ही नहीं करते. पोर्न में दिखने वाला हिंसक सेक्स भी लोगों के अंदर उसी श्रेष्ठता को सिद्ध करता है, जो हमारा समाज सिखाता है कि पुरुष ताकतवर होते हैं और वे महिलाओं से श्रेष्ठ होते हैं. वे कुछ भी कर सकते हैं. श्रेष्ठ होने का ये मिथक लोगों के भीतर स्थापित है और वे ऐसा करके संतुष्ट महसूस करते हैं, वो भूल जाते हैं कि सेक्स का आनंद तो तब ही ज़्यादा मिलता है, जब महिला की ख़ुशी हो. लेकिन वो उसे विज़ुअलाइस कर ही नहीं पाते कि बराबर में औरत के रहने पर कैसा अनुभव होगा.

2. मुम्बई की Clinical Psychiatrist सोनाली गुप्ता कहती हैं कि,

'पुरुषों द्वारा रेप करने की पहली वजह तो ये है कि हमारी सोसाइटी कितने ही लोगों के लिए पावर दिखाने का मीडियम बन जाती है. ऐसे लोग अपना हक़ जमाकर अपनी एक आइडेन्टिटी क्रिएट करना चाहते हैं. दूसरा कारण है कि अगर कोई लड़की उन्हें पसंद आ जाती है, वो उन्हें लगता है कि वो हर हाल में मिलनी चाहिए, चाहे वो हां कहे या ना. तीसरी अहम वजह है कि वे अपनी काम उत्तेजना को कंट्रोल नहीं कर पाते. न ही वे इसे कंट्रोल करना चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए रेप बदला लेने का माध्यम भी बन जाता है. कुछ ऐसे मनोरोगी भी होते हैं कि उन्हें दूसरों को नुकसान पहुंचाकर अच्छा लगता है. इन लोगों के लिए रेप या किसी को चोट देना मानसिक संतुष्टि जैसा होता है. इन्हें इलाज की ज़रुरत होती है. क्योंकि उनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं होता.

सोसाइटी में जो नजरिया है औरतों के प्रति, वो यही है कि अगर वो मॉडर्न है तो उसे लोग 'तैयार' मानते हैं. वो उसके साथ कुछ भी करने के लिए सोचते हैं. हमें सिखाया ही नहीं गया कि लड़कियां भी लड़कों जैसी ही होती हैं, उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ सेक्स नहीं करना चाहिए. इसके अलावा जो मीडिया हैं समाज में मेसेज देने वाले, उनमें अगर सेक्सुअल वॉयलेंस दिखाया जाएगा, उनका कोई फेवरिट हीरो लड़की के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करेगा, तो लोग उसे रोल मॉडल की तरह ही लेते हैं. हम अभी भी मीडिया के तौर पर उतने सेंसिटिव नहीं हुए. म्यूज़िक वीडियो, सॉन्ग या फिल्मों में औरत को 'वस्तु' की तरह पेश किया जाता है. जब तक पुरुष खुद को पॉवर पोजीशन में देखेंगे, रेप होते रहेंगे. हमें औरत के प्रति मानसिकता बदलनी ही होगी.'

3. अलीगढ़, उत्तर प्रदेश की Psychiatrist डॉ. अंतरा गुप्ता कहती हैं कि

'पुरुषों में एक श्रेष्ठता की भावना भरी होती है कि वे कुछ भी कर सकते हैं, जैसे सड़कों पर घूमना, कहीं भी आना-जाना आदि, लेकिन जब ये चीज़ें कोई लड़की करती है तो उन्हें लगता है कि एक लड़की ऐसा भला कैसे कर सकती है? ये भावना उन्हें उस लड़की के साथ ज़बरदस्ती करने को फ़ोर्स करती है. मर्दों को रेप करना अपनी ताक़त को दिखाने का ज़रिया नज़र आता है.

जिन लोगों की पेरेंटिंग अच्छी होती है, वे इस तरह की चीज़ों को समझते हैं. लेकिन हमारे देश में लोग शिक्षा और सही समय पर मिलने वाली सेक्स एजुकेशन, दोनों न मिलने के कारण ज्यादा हिंसक हो जाते हैं. वे सेक्स से संबन्धित ज़रूरी बातें हिंसक तरीके से सीखते हैं, जैसे पॉर्न आदि के द्वारा, इसलिए उन्हें लगता है कि ये ही सही तरीका है. जो बच्चे सड़कों पर पले-बढ़े हों, या मजदूरी करते हों, तो फिर वे अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होते, वे अपने बचपन में इस तरह की हिंसक घटनाओं की चपेट में आ सकते हैं, इसलिए उनके दिमाग में वो चीज़ें बनी रहती हैं., जिसे मौका मिलने पर वे भी हिंसक तरीके से ही करते हैं. इसलिए ज़रूरी है कि स्कूलों में सेक्स एजुकेशन दी जाए और माता-पिता भी इसके लिए अवेयर रहें कि उनके बच्चे क्या सीख रहे हैं. क्योंकि औरत की देवी के रूप में पूजा करने की ज़रूरत नहीं है, उसे इन्सान समझने की ज़रूरत हैं.'

हाल ही में एक ख़बर आई थी कि एक भाई ने अपनी बहन का रेप इसलिए कर दिया, क्योंकि उसने विज्ञ[पन में कुछ देखा लेकिन उसे समझ नहीं आया. उस चीज़ को आज़माने के लिए उसने ऐसा किया, फिर उसे पानी में फेंक दिया. बच्चों को जो चीज़ें नहीं पता होती हैं, उसके लिए उन्हें दूसरे माध्यम न तलाशने पड़ें, इसका ध्यान रखना होगा.

हमारे देश में महिलाओं को इन्सान समझने के लिए लोग कितना वक्त लगाएंगे ये तो नहीं पता, लेकिन हम बच्चों को अच्छी परवरिश तो दे ही सकते हैं, ताकि वे महिलाओं को वास्तु न समझें. उन्हें सही समय पर सेक्स एजुकेशन दें, ताकि वो इधर-उधर से गलत चीज़ें न सीखें. सबसे ज़रूरी है कि पेरेंट्स अपाने बच्चों को गुड और बैड टच का मतलब समझाएं और उन्हें आवाज़ उठाने को प्रेरित करें, चुप रहने को नहीं.

अगर कोई भी गलत तरीके से टच करे तो उसका विरोध करना ही चाहिए और पढ़े-लिखे समाज को समझना होगा कि लड़की की ना का मतलब ना ही होता है, बेवजह उसमें अपने लिए मौका न तलाशें. कानून का बनना ज़रूरी है, लेकिन उसे अमल में लाना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. सरकार को रेप जैसे अपराध के लिए कानून-व्यवस्था को और दुरुस्त करना होगा. खुलेआम शराब पीने और ड्रग्स की तेजी से होती उपलब्धता पर भी नज़र रखे जाने की ज़रूरत है. इन सबसे इतर एक औरत को अपने अधिकारों के बारे में जानना चाहिए. किसी को उस वक्त सिर्फ़ इसलिए बर्दाश्त नहीं करना चाहिए कि वो आपका बॉस या सीनियर है. वो गलत है या सही, इस पर ज़्यादा ध्यान दें और गलत को कभी न सहें. अब ज़रूरी है कि आवाज़ उठाओ, चुप न रहो और अपने हक़ के लिए लड़ जाओ, क्योंकि हमें खुद ही अपने बारे में सोचना होगा.

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