अरे सुनो, ये बताओ ज़रा मैं इस कमरे में क्यों आयी थी... भूल गई मैं तो, कुछ काम था यहां पर अब याद नहीं आ रहा...!

दोस्तों अब आप सोच रहे होंगे कि हम क्या लिख रहे हैं... है न यही बात? चलो अब ज़्यादा मत सोचो हम बता देते हैं. पर उससे पहले ये बताओ क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप कुछ काम सोचकर एक कमरे से दूसरे कमरे में गए हों, और कमरे में घुसते ही भूल गए हों कि आप क्यों आये थे उस कमरे में?

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आज हम इसके बारे में ही बात करने जा रहे हैं. अकसर या यूं कह लो कि हर दिन ऐसा होता है कि हम किसी काम को करने के बारे में सोचते हैं और किसी दूसरे काम में लग जाते हैं और भूल जाते हैं. जैसे किसी चीज को कहीं रखकर भूल जाना और फिर ढूंढते रहना या जानते बूझते हुए भी किसी का नाम याद न आना. अधिकतर ऐसा तब होता है, जब हम एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हैं किसी काम को करने के लिए. तब हमको ये चिंता सताने लगती है कि हम भूलने की बीमारी अल्ज़ाइमर (Alzheimer) का शिकार तो नहीं हो रहे हैं.

मगर इसमें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि University of Notre Dame में हुई एक स्टडी के अनुसार, ये कोई असामान्य बात नहीं है, ये एक आम घटना है. ऐसी स्थिति में हमारा दिमाग़ अचानक से हुए दृश्यों के परिवर्तनों के साथ संघर्ष करता है. दिमाग़ के संघर्ष की इस स्थिति को 'Doorway Effect' कहा जाता है.

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इस स्टडी में University of Notre Dame के रिसर्चर्स का दावा है कि 'Doorway Effect' वाली स्थिति अकसर तब होती है जब हम एक कमरे से दूसरे कमरे में प्रवेश कर रहे होते हैं. रिसर्चर्स ने बताया कि जब हम अपने दृश्यों (कमरे) को बदलते हैं, तो हमारा दिमाग़ चीज़ों को भूल जाता है. इसके लिए रिसर्चर्स ने शोधकर्ताओं ने वास्तविक वातावरण और आभासी वातावरण (वीडियो गेम) में कई लोगों पर परीक्षण किया. जिसमें उन्होंने पाया कि जब लोग एक कमरे से दूसरे कमरे में जा रहे थे, तो वो अकसर बातों को भूल रहे थे. जबकि एक ही कमरे में आने-जाने से ऐसा कम ही हो रहा था.

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इसके बाद रिसर्चर्स ने निष्कर्ष निकाला कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पर्यावरण वर्चुअल है या वास्तविक, जब लोग कमरे बदलते थे, तो वो उन चीजों और बातों को भूलने के लिए प्रतिबद्ध थे, जो उनके साथ पहले थी और वो नए कमरे में क्यों आये थे. इसके अलावा एक निष्कर्ष और निकला कि जब हम किसी भी बाउंडरी को पार करते हैं, तो ये हमारी सोचने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है.

रिसर्च लीडर, Gabriel Radvansky के अनुसार, एक चैप्टर मार्कर की तरह, Doorway Effect पुराने एपिसोड को ख़त्म कर देता है और जहां तक आपका दिमाग़ चलता है उसके बाद एक नया एपिसोड शुरू करता है. इसके कारण पिछली बातों को याद करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि दिमाग़ पहले ही उनको दूर कर चुका होता है.

तो अब समझ आ गया न कि एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने या किसी भी बाउंडरी को पार करने से हमारे विचार खानों (कम्पार्टमेंट्स) में बंट जाते हैं, इसलिए उन्हें रिकाल करना कठिन हो जाता है. और यही हमारी सोच और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है. और हम सोचने लगते हैं कि हमारी स्मरण शक्ति कमज़ोर होती जा रही है.

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इसलिए कोई भी काम करने से पहले शांति से बैठकर सोच लेना चाहिए और उसके बाद ही कोई काम करना चाहिए. जल्दबाज़ी में अकसर ऐसा देखने को मिलता है.

अगली बार जब आप कमरे में जायें और भूल जाएं कि आप वहां क्यों हैं, तो खुद को भुलक्कड़ कहने की बजाये, इस डोर-वे इफ़ेक्ट के बारे में याद कर लेना अच्छा महसूस होगा. वहीं अब अगर कोई आपको भुलक्कड़ बोले तो उसे ये आर्टिकल पढ़ा देना, वो चुप हो जाएगा.

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