मैं एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी हूं. मेरी मां एक हॉउसवाइफ़ हैं. एक आम हॉउसवाइफ़. बचपन के उन दिनों की बात है, जब शाम को बिजली का जाना, लोगों के लिए घर से बाहर निकलकर आस-पास के लोगों से गपशप करने का बहाना होता था. सभी औरतें मिलतीं और फिर शुरू होता बातों का सिलसिला. बच्चे भी पास खेल रहे होते थे, तब आंटियों में ये बातें अकसर सुनी थीं:

एक औरत दूसरी औरत से कहती है...
"अरे आपकी तो दो-दो बेटियां हैं, आपको तो काम से आराम रहता होगा"
"इनके तो तीन बेटे हैं, सारा काम खुद करना पड़ता होगा"
"अरे तुम्हें पता है, शर्मा बहन जी की बेटी बड़ी निकम्मी है, घर के काम में बिलकुल दिलचस्पी नहीं है. बेटा तो अच्छा है, फस्ट आया था रेस में."

तब तो इतना ही समझ आता था कि अच्छी लड़की बनने के लिए सिर्फ़ पढ़ाई में अच्छा होना काफ़ी नहीं है. लड़की होने के नाते, घर के कामों में आपकी दिलचस्पी होना अनिवार्य हो जाता है. बेटों के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है. वो अच्छा खेल भर लें, काफ़ी है.

हाल ही में एक ख़बर सुनी थी, एक औरत को सोशल मीडिया पर सिर्फ़ इसलिए आलोचना सहनी पड़ी थी कि उसने अपने बेटे को भी घर के काम सिखाये.

महिला का कहना था कि हो सकता है कल को उनके बेटे को कभी अकेला भी रहना पड़े, ऐसे में उसे ही सुविधा होगी. घर के काम केवल औरत की ज़िम्मेदारी नहीं होते. स्कूल में बच्चों को ये सब नहीं सिखाया जाता, इसलिए मां-बाप को इन चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए. घर के कामों में हाथ बंटाने से किसी आदमी की मर्दानगी कम नहीं होती है, बल्कि इससे वो ज़्यादा ज़िम्मेदार इंसान होने का सबूत देता है. जिन लड़कों को बचपन में ये छोटी पर अहम बातें नहीं सिखाई जातीं, वो ही आगे चल कर ऐसे आदमी बन जाते हैं, जिन्हें घर के कामों की ज़िम्मेदारी बांटना अपनी शान के खिलाफ लगता है.

हम आज समाज में, Workplace पर औरतों को समान हक़ दिलाने के लिए लड़ रहे हैं, पर क्या हम सब घर में Gender Equality लाने पर ज़ोर देते हैं? Gender Sensitization की जब बात होती है, तब भी घर में इसकी ज़रुरत को उतना महत्व नहीं दिया जाता.

Source: Choice

लड़कियां लड़कों से 16 करोड़ घंटे ज़्यादा काम करती हैं

संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी की गयी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि घर के कामों में लड़कियां लड़कों से 16 करोड़ घंटे ज़्यादा बिताती हैं. यानी घर में वो लड़कों से 40 फीसदी ज़्यादा काम करती हैं. ये तो रही विश्व की बात, भारत में आंकड़ा कहीं ज़्यादा होगा. क्योंकि यहां घरेलू कामों को पूरी तरह औरत की ज़िम्मेदारी समझा जाता है.

इन आंकड़ों के पीछे कोई Biological कारण नहीं है. ज़िन्दगी के शुरूआती सालों में लड़के और लड़की में कोई ख़ास फ़र्क नहीं होता. उनका दिमागी विकास भी लगभग एक ही दर से होता है. जैसे-जैसे वो बड़े होने लगते हैं, ये Gender Differences भी बढ़ने लगते हैं. देखते-देखते उनके खिलौने अलग हो जाते हैं, फिर उनके कपड़े, फिर उनके रंगों की पसंद और इसके साथ ही अलग हो जाता है उन्हें देखने का हमारा नज़रिया. हम उनके लिए एक तौर-तरीका तय कर देते हैं. 'लड़कों का तौर अलग होता है और लड़कियों का अलग', ये हम ही भरते हैं उनके दिमाग में.

इस वीडियो में काम को लेकर लोगों की मानसिकता साफ़ दिखती है:

क्या दोगुना काम करना सशक्तिकरण है?

Unpaid कामों की बात करते हैं, यानी ऐसे रोज़मर्रा के काम, जिन्हें करने के लिए आपको पैसे नहीं मिलते. लोग कहते हैं कि औरतें अब Empowered हो गयी हैं, कंधे से कन्धा मिलाकर आदमियों के साथ दफ़्तर में काम करने लगी हैं. हां, बिलकुल सही है. पर कामकाजी औरतें दरअसल हर दिन दो शिफ्ट्स में काम करती हैं. पहली शिफ्ट होती है दफ्तर की और दूसरी शुरू होती है घर लौटने पर.

मैंने भी एक समय पर अपनी मां को सबसे पहले उठते और सबसे बाद में सोते हुए देखा है. वो सबसे पहले उठकर काम में लग जाती थीं. एक समय था जब काम करते-करते उन्हें पता ही नहीं चलता था कि दोपहर कब हो गयी. नाश्ता करने की फुर्सत मिलती थी बारह बजे. सब सो जाते थे, वो किचन की सफ़ाई करने के बाद सबसे बाद में सोने आती थीं. घर में इतना काम होता है कि शायद ही कभी उन्हें अपने लिए वक़्त मिलता हो, कुछ और करने का समय वो निकाल ही नहीं सकती थीं.

मेरे घर में लड़कियों के मामले में भी पढ़ाई को अधिक महत्व दिया जाता था तो हम पर कभी भी ज़्यादा काम करने का दबाव नहीं बनाया गया. पर मैंने कई बार ये बातें औरतों के मुंह से भी सुनी हैं:

"वो औरत ही क्या जो खाना बनाना न जानती हो!"
"अपने घर को ही ठीक से नहीं रखती है, ये किस काम की औरत."
Source: Theworld

औरत होने के मायने

औरत होने के मायने कुछ लोगों के लिए उसका अच्छा कुक होना और सफ़ाई पसंद होना होते हैं. एक औरत जिसे घर के कामों में लगे रहने का जूनून नहीं है, वो अच्छी औरत नहीं होती. उसकी बाकी सभी खूबियां इस कमी के सामने छोटी हो जाती हैं. ऐसी औरत न एक अच्छी मां समझी जाती है, न अच्छी बेटी, न अच्छी बहू और न ही अच्छी पत्नी.

सभी घरेलू काम, बच्चों की देखभाल सब कुछ उनकी ज़िम्मेदारी होती है. मर्द या औरत कोई भी घर के काम करने के लिए नेचुरल स्किल्स लेकर पैदा नहीं होता है. घर में लगभग एक ही उम्र के दो बहन-भाई होते हैं, तो पानी मांगने के लिए अकसर लड़की को आवाज़ लगायी जाती है. मां भी काम में मदद करने के लिए उसे ही बार-बार बुलाती है. ये सब बचपन से ही शुरू हो जाता है. लड़कों से ज़्यादा से ज़्यादा दुकान तक जा कर कोई सामान लाने को कह दिया जाता है. लड़की से कहा जाता है कि पापा और भाई को खाना परोस के दे दो, लड़के से नहीं कहा जाता कि मां और दीदी को खाना सर्व कर दो.

"लड़की को घर के कामों में दिलचस्पी लेनी चाहिए"

कोई लड़का अगर घर का कोई काम करता हो, तो उसे एक अलग महानता का दर्जा दे दिया जाता है. कहा जाता है "लड़का हो कर घर का काम करता है बताओ", वहीं घर की लड़कियों का काम करना बिलकुल आम बात है. "ये तो उनका काम ही है" ये कहा जाता है. हां अगर लड़की की काम में दिलचस्पी न हो, तो ये उसके लिए बहुत शर्म की बात समझी जाती है.

अपनी बहनों के प्रति ये बर्ताव देखकर लड़कों के दिमाग में साफ़ सन्देश जाता है, 'लड़कियां घरेलू काम करने के लिए ही बनी हैं'.

एक और सोच है इसके पीछे, हम इसे एक तरह का स्टीरियोटाइप भी कह सकते हैं. "लड़कियों को सफ़ाई पसंद होती है, या लड़कियों को सफ़ाई-पसंद होना चाहिए", आदमी तो कैसे भी रह लेते हैं, You Know...They Don't Care!"

Source: Alternet

हमारे विज्ञापन और मार्केटिंग मेसेजेज़ भी चीख-चीख कर हमें ये ही बता रहे होते हैं. सर्वे में पता चला कि केवल दो प्रतिशत विज्ञापनों में आदमियों को कुकिंग, सफ़ाई और बाकी के घरेलू काम करते दिखाया जाता है, ये भी पक्का है कि ये दो प्रतिशत विज्ञापन भारत में नहीं बने होंगे.

'औरतों को सफ़ाई पसंद होनी चाहिए'

'औरतों को सफ़ाई पसंद होती है', धीरे-धीरे 'औरतों को सफ़ाई पसंद होनी चाहिए' बन गया. उनसे सफ़ाई रखने की अपेक्षाएं बढ़ गयीं. औरतों ने भी कहीं न कहीं ये मान लिया कि घर को चमकाना उन्हें एक बेहतर औरत बनाएगा. इसलिए कई औरतें थकी होने के बावजूद अपने घर को चमकाने में लगी रहती हैं. धीरे-धीरे उनके लिए ये एक ओबसेशन बन जाता है. वो घर के कामों को ही अपनी ज़िन्दगी मान लेती हैं. उठती हैं तो काम की चिंता से, सोने जाती हैं तो ये सोचते हुए कि कल क्या बनाना है.

एक हॉउसवाइफ़ के ज़िम्मे आने वाले मोटे-मोटे कामों की लिस्ट पर ज़रा एक नज़र डालिए:
⦁ रोज़ की सफ़ाई (झाड़ू, पोछा, डस्टिंग आदि)
⦁ दिन में तीन से चार बार खाना बनाना
⦁ बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना उनकी यूनिफ़ॉर्म से लेकर जूतों तक को चकाचक रखना (कई तो उन्हें स्कूल तक ड्रॉप भी करती हैं)
⦁ साप्ताहिक सफ़ाई (फ्रिज आदि की एक्स्टेंसिव सफ़ाई)
⦁ सभी के कपड़े धोना
⦁ दिन में कई बार बर्तन धोना
⦁ परदे, चादर धोना
⦁ कपड़ों को इस्त्री करना
⦁ बजट बनाना
⦁ बच्चों की ज़रुरतों को पूरा करना
⦁ होमवर्क में उनकी मदद करना
⦁ राशन लाना
⦁ हर वक़्त ये ख़याल रखना कि घर की हर चीज़ जगह पर हो.

सेवा करने की मशीन औरत

औरत एक तरह से सेवा करने की मशीन सी बन जाती है, पति की सेवा, बच्चों का ख़याल, बुज़ुर्गों की सेवा, मेहमानों की सेवा. इस लिस्ट का कोई अंत नहीं है. ये बस मोटे-मोटे काम थे, और भी कई छोटे-बड़े काम होते हैं. ये बात थी हाउसवाइफ़ की, कामकाजी औरतें ऑफ़िस जाने के बावजूद इनमें से ज़्यादातर काम करती हैं. ये वो काम हैं जिन्हें करने में आम तौर पर घर का कोई मेल सदस्य मदद नहीं करता.

कई बार सुना है जब कोई लड़का मर्दों के घर के काम में हाथ बंटाने की पैरवी करता है, तो उससे इस तरह की बातें कही जाती हैं, "तू तो अपनी बीवी को सर पे चढ़ा लेगा, गुलाम बन जाएगा उसका".

समाज मर्द और औरतों को अलग-अलग Gender-Roles में बांध देता है. एक औरत के लिए दफ़्तर से छुट्टी का मतलब होता है ज़्यादा घर का काम. उस दिन वो ज़्यादा अच्छे से सफाई करती है.

ये Ad दिखाता है कि कामकाजी औरत भी हॉउसवाइफ होती है.

बस ये ही समझ नहीं आता कि घर का काम करने के लिए भला ऐसा क्या चाहिए होता है, जो भगवान ने मर्दों को नहीं दिया, इसलिए औरतों को ही करना पड़ता है.

किसी भी अच्छे काम की शुरुआत घर से करनी चाहिए. Gender Equality का सपना भी घर के मुद्दों को नज़रंदाज़ कर के नहीं सुलझाया जा सकता.