आपने ज़्यादातर महिलाओं को हैंडबैग का इस्तेमाल करते देखा होगा, पर पुरुष तब तक इसको कैरी करते नहीं दिखते, जब तक सामान बहुत ज़्यादा न हो. महिलाओं की जिंदगी में हैंडबैग झंझट है या सुविधा, ये कहना मुश्किल है. लेकिन, इसके उनकी ज़िन्दगी में शामिल होने की एक बड़ी वजह यह है कि उनके पास जेब जैसी कोई चीज़ नहीं होती. ऐसा क्यों नहीं होता और इसके पीछे क्या वजह है, कभी सोचा है आपने?

जेब की कमी के कारण सामान रखने का अजीबोग़रीब जुगाड़ निकाला गया

महिलाओं की ज़्यादातर पोशाकों में जेब नहीं होती. अगर होती भी है, तो कुछ छुट्टे पैसों के अलावा शायद ही कोई सामान उसमें रखने की जगह होती है. यह नाममात्र की या सिर्फ़ दिखाई देने वाली जेब भी पश्चिमी परिधानों में होती है, यानी कि पैंट्स और ट्राउजर्स में. भारतीय कपड़ों की बात करें, तो इनमें न तो जेब होती है और न ही जेब बनाने की गुंजाइश.

शायद यही वजह है कि भारतीय महिलाओं ने मोबाइल, छोटा बटुआ या चाबी जैसी छोटी-मोटी चीज़ें संभालने के लिए उसे अपने ब्लाउज़ में फंसाकर रखने की एक तकनीक विकसित कर ली है. देखने-सुनने में यह मज़ाकिया लग सकता है, लेकिन असल में उन्हें ऐसा मजबूरन करना पड़ता है.

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मर्दाना चीज़ समझी जाती थी जेब

वैसे इस बात की शिकायत करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि पहले हमारे यहां महिलाओं ही नहीं, बल्कि पुरुषों के कपड़ों में भी जेब नहीं हुआ करती थी. भारत में जेब का चलन अंग्रेज़ों की देन है, साथ ही इसमें हुआ भेदभाव भी. भारतीय महिलाओं के कपड़ों तक यह चलन इसलिए नहीं आ पाया, क्योंकि पश्चिम में भी महिलाओं के कपड़ों में जेबें बनाने का रिवाज़ नहीं था.

विक्टोरियन युग यानी ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के शासनकाल (1837-1903) में जेब मर्दानी चीज़ समझी जाती थी. समय के साथ पुरुषों के परंपरागत भारतीय कपड़ों में तो जेबों को जगह मिल गई, लेकिन महिलाओं के मामले में ऐसा नहीं हुआ.

इसके पीछे भी है पुरुषवादी मानसिकता

दुनियाभर की महिलाओं के साथ हुए इस भेदभाव की एक वजह फ़ैशन भी है. फैशन डिज़ाइनर महिलाओं के लिए उनकी सुविधा के बजाय उनके शरीर को सुंदर दिखाने के हिसाब से पोशाक डिज़ाइन करते हैं. हालांकि, यह भी पुरुषवादी मानसिकता को दिखाता है, मानो महिलाएं सिर्फ़ सुंदर दिखें इससे ज़्यादा उनकी कोई उपयोगिता ही नहीं है.

1840 के बाद (अगर इस समय को आधुनिक फैशन की शुरुआत मान लें तो) फ़ैशन डिज़ाइनर महिलाओं के लिए बड़े गले, पतली कमर और नीचे से घेरदार स्कर्टनुमा ड्रेस डिज़ाइन करने लगे थे. यह चलन धीरे-धीरे महिलाओं की ड्रेसों से जुड़े फ़ैशन की बुनियाद बन गया. इसके अनुसार महिलाओं के कपड़े उनके ब्रेस्ट-वेस्ट-हिप्स को उभारकर दिखाने वाले होने चाहिए.

महिलाओं का काम था बस सुन्दर दिखना

एक नामचीन फ़ैशन फर्म की क्रिएटिव डॉयरेक्टर कैमिला ओल्सन इसे फैशन इंडस्ट्री का लिंगभेद बताती हैं. ओल्सन के मुताबिक, मध्य वर्ग का फ़ैशन पुरुष प्रधान कहा जा सकता है. यह इस बात से भी पता चलता है कि महिलाओं की पोशाक किस फ़ैब्रिक से तैयार होती हैं. अमूमन लेडीज ड्रेसेज़ में इस्तेमाल किया जाने वाला कपड़ा अपेक्षाकृत पतला और शरीर से चिपकने वाला होता है.

जेब की कमी ने चलाया पर्स का बाज़ार

जेब की अनुपस्थिति महिलाओं को हमेशा अपने साथ पर्स रखने को मजबूर करती है. और फिर पर्स होगा, तो उसका भी एक फ़ैशन, एक अलग उद्योग होगा. शायद इस फ़ायदे के चलते फ़ैशन जगत जेब के सवाल पर ध्यान नहीं देता. एक संभावना यह भी है कि बाद के फैशन डिज़ाइनर्स ने जेब बनाने पर सिर्फ़ इसलिए ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि उनके मुताबिक जब महिलाएं अपने साथ पर्स रखती हैं, तो फिर इसकी ज़रूरत ही क्या है.

‘गिव अस पॉकेट’ अभियान

बीते कुछ समय से कुछ यूरोपीय देशों में महिलाओं ने अपनी पोशाकों में जेब पाने के लिए ‘गिव अस पॉकेट’ अभियान चला रखा है. वहीं दुनियाभर में होने वाली Feminism की बहस में अब यह मुद्दा भी शामिल रहता है. यह और बात है कि फैशन जगत इस बात पर अब भी उतना ध्यान नहीं दे रहा कि कोई नज़र आने वाला बदलाव आ सके.

Source: Satyagrah