"फिर एक सीता ने दी अग्निपरीक्षा" टीवी पर इस ख़बर के लिए कुछ ऐसे ही शब्द सुनने को मिले. घटना है उत्तर प्रदेश के पीलीभीत की, जहां अपने पति द्वारा रोज़-रोज़ चरित्रहीन बोल कर पीटे जाने से तंग आकर 25 वर्षीय रेखा ने ऐसा कदम उठाया कि देखने वालों की रूह कांप गयी. पति उसके सुन्दर चेहरे के कारण उस पर शक करता था, तो उसने अपने चेहरे पर केरोसीन डाल कर आग लगा ली. अब उसका चेहरा झुलस चुका है, जो कभी ठीक नहीं किया जा सकता.

दरअसल, रेखा देखने में सुन्दर और स्वभाव से चंचल और हंसमुख थी. इतना काफी था उसके पति को 'इनसिक्योर' और उसे चरित्रहीन बनाने के लिए. सिर्फ उसका पति ही नहीं, उसके ससुर भी पूरा ख़याल रखते थे कि वो कहीं बहार न आये जाए, किसी से बात न करे. यहां तक कि अगर दो मिनट के काम से भी ससुर को कहीं बाहर जाना होता, तो रेखा को घर में बंद कर मेन-गेट पर ताला लगा दिया जाता था, ताकि कोई उससे मिल न सके या वो कहीं चली न जाये.

बच्चों के लिए बाहर कुछ लेने जाने पर भी होती थी बेरहमी से पिटाई

रेखा ने बताया कि शादी के पहले साल तक तो सब ठीक चल रहा था, लेकिन बाद में किसी से बात करने पर पति ने उसे मारना शुरू कर दिया. उसके तीन छोटे बच्चे हैं, वो जब उनके लिए बाहर कुछ लेने जाती थी, तो भी उसे पीटा जाता था.

पति अक्सर उससे कहता, "तुम बहुत खूबसूरत हो इसीलिए घर से बाहर मत निकला करो."

वो खुद को बेगुनाह बताती रही, पति को समझाया, हर मुमकिन कोशिश की कि उसका पति उस पर भरोसा करने लगे. पर कुछ नहीं हुआ, हालात बद से बद्दतर होते चले गए. शक बढ़ता चला गया. जब हर रोज़ की पिटाई और मानसिक प्रताड़ना से वो तंग आ गयी, तो ये कदम उठा बैठी.

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ज़रा सा हाथ गरम चीज़ पकड़ते हुए जल जाये, तो कैसे तड़प उठते हैं न हम? ज़रा सोचिये, कहां से वो औरत इतनी हिम्मत लायी होगी कि केरोसीन डाल कर अपने ही चेहरे को जला ले? ज़ाहिर सी बात है जो दर्द वो रोज़ सह रही थी, जलने की पीड़ा उसे उस दर्द से कम ही लगी होगी. तभी ये करने की सोची, हर कीमत पर बस वो अपनी शादी बचाना चाहती थी.

3 महीने पहले पति ने निकाल दिया था घर से

हमारे यहां वैसे भी औरतों को पति के लिए समर्पित रहने का और 'चरित्रवान' बने रहने का पाठ इस तरह पढ़ाया जाता है कि ज़्यादातर तो खुद ही कभी पति से बेवफ़ाई करने की नहीं सोचतीं. पति को देवता की तरह पूजने वाली इन औरतों पर अगर उनका पति ही 'बदचलन' होने का आरोप लगाने लगे, तो इससे ज़्यादा तोड़ने वाला उनके लिए कुछ नहीं होता. उन्हें लगने लगता है जैसे उनमें ही कोई कमी है, तभी उनकी शादी सही से नहीं चल पा रही. यहां औरतों को 'देवी' बनने की शिक्षा दी जाती है, विदाई के समय मां-बाप उनसे कहते हैं कि पति के घर औरत की डोली जाती है और लौटती अर्थी है. पर रेखा को तो उसके पति ने 'बदचलन' कह कर घर से ही निकाल दिया था. इसलिए उसे अपना घर बचाने के लिए कुछ करना ही था.

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अस्पताल में जब रेखा से बात की गई तो वो रोती हुई बस यही चिल्ला रही थी, "लो खत्म कर ली मैंने अपनी सुंदरता. अब तो खुश हो जाओ. मुझे लगा कि मेरा चेहरा ही सारे विवाद की जड़ है, तो मैंने तय किया कि इसे ही बदसूरत बना दूंगी. अब कोई मुझसे बात करना तो दूर, मेरे पास भी नहीं आएगा."

पति पर आज भी उसको भरोसा है, जबकि उसके मायके वाले तो मामले पर कार्रवाई का मन बना चुके थे, लेकिन रेखा अब भी अपने पति पर केस नहीं करना चाहती. चाहे भी तो कैसे? उसे डर है कि यदि पति पर कार्रवाई की गयी, तो उसके छोटे-छोटे बच्चों को कौन पालेगा.

खुद को जला कर वो 'सीता' का तमगा तो पा गयी, पति पर कोई केस न कर के उसने खुद को 'देवी' भी बनवा दिया. अब रेखा एक अच्छी गृहणी है, बिलकुल वैसी, जैसा बनना उसे हमेशा सिखाया गया. अपनी शादी बचाने के लिए किसी भी हद तक चली जाने वाली 'चरित्रवान' और इतना सब होने पर भी अपने पति को माफ़ कर देने वाली समर्पित पत्नी.

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खुद को आग लगा लेने वाली ये औरत उस घर से निकलकर कभी थाने जा कर उस पर हो रही घरेलु हिंसा की शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पायी. क्योंकि वो इतना ही जानती थी कि पति के बिना औरत का कोई अस्तित्व नहीं होता. काश के वो जानती कि उसके साथ जो उसका पति करता आ रहा है उससे वो देवता नहीं, बल्कि एक अपराधी है.

बेटियों को देवी जैसा बनने की शिक्षा दे कर हम उन्हें इसी तरफ धकेल रहे हैं, जहां आज रेखा है

बिलकुल सही किया रेखा ने. इसके सिवा और कर भी क्या सकती थी? न तो उसे इतना पढ़ाया- लिखाया गया होगा कि अपने पैरों पर खड़ी होकर अपने बच्चों को खुद पाल सके, न उसे कभी उसके मां-बाप ने भरोसा दिलाया होगा कि तुम्हें ससुराल में कोई अत्याचार चुप-चाप सहने की ज़रूरत नहीं है, कभी भी हमारे पास लौट सकती हो.

रही बात अग्निपरीक्षा की, तो उस समय सीता ने अग्निपरीक्षा दे कर भी उतना ही सही किया था, जितना आज रेखा ने खुद को जला कर किया है. बेटियों को देवी जैसा बनने की शिक्षा दे कर हम उन्हें इसी तरफ धकेल रहे हैं, जहां आज रेखा है. अगर देवी बनाना ही है तो सीता जैसा बनना ज़रूरी नहीं है, काली और दुर्गा भी देवी का ही रूप थीं.

Source: Timesofindia