घटना कुछ दिन पहले की है, पुणे में काम करने वाली एक 22-वर्षीय युवती, अपने दो पुरुष दोस्तों के साथ घर लौट रही थी. उनकी कार एक ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी तो उनसे आगे खड़ी एक कार में सवार पांच लोग युवती को परेशान करने लगे और उसे गालियां देने लगे. उन लोगों ने खुली खिड़की में से हाथ डाल कर उसके बाल पकड़ लिए और उसे घसीट कर बाहर निकाल लिया. इसके बाद उन लोगों ने सड़क पर उसकी पिटाई भी की.

उन लोगों ने कहा, “हमारे परिवार की कोई भी लड़की छोटे कपड़े पहन कर सुबह के पांच बजे लड़कों के साथ नहीं घूमेंगी. जिससे हमारी शिकायत करनी हो कर लो, हमारे बड़े-बड़े संपर्क हैं, हमारा कुछ नहीं होगा”.

युवती ने बताया कि वो लोग नशे में थे. युवती पर हमला करने वाले पांच में से तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है. लड़की का कहना है कि एक सप्ताह तक पुलिस इस मामले में एफआईआर तक दर्ज करने से इनकार करती रही.

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कोई मां-बाप नहीं चाहेंगे कि ऐसी भयानक घटना उनकी बेटी के साथ हो, इसलिए वो उसके भले के लिए उसे सुरक्षा के उपाय सिखाएंगे और उन्हें आदर्श बेटी बनायेंगे. वो बेटी को समझाएंगे कि घर से निकलो तो पूरे कपड़े पहन कर ही निकलना, नज़र झुका कर चलना, कोई कुछ कमेंट करे तो जवाब मत देना, अंधेरा होने से पहले घर आ आना. हम यही तो सिखाते आये हैं न बेटियों को? फिर क्या वजह है कि बलात्कार कम होने की बजाए बढ़ ही रहे हैं? लड़कों को क्यों नहीं सिखाते कि औरतों की इज़्ज़त करते हैं. सिखाया होता काश उन्हें कि लड़की के कपड़ों से उसका चरित्र नहीं आंकते, आदर्श बेटे सुबह पांच बजे शराब पी कर सड़कों पर नहीं घूमते. अगर नियम लगाने ही हैं, धार्मिक बनाना ही है तो अपने बेटों को भी बना दीजिये. धर्म और संस्कृति को बचाने का ठेका महिलाओं ने ही ले रखा है क्या?

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हम खुद से ये सवाल ही नहीं करते, क्योंकि हमें ये बहुत स्वाभाविक और प्राकृतिक लगता है. पूरे कपड़े पहनना संस्कृति का हिस्सा लगता है. माना छोटे कपड़े पहनने से महिला सशक्तिकरण नहीं हो जाएगा, लेकिन ये आदर्श लड़की की परिभाषा के नाम पर लड़कियों को दबाते रहना महिला के सशक्तिकरण में रोड़ा ही है. महिलाओं को देवी का झांसा देकर सब बलिदान उन्हीं से करवा लिए जाते हैं. सुरक्षा की दुहाई भी वही झांसा है जो लड़कियों को आगे बढ़ने से रोकता है. बीते महीने चंडीगढ़ में लड़कियों के छोटे कपड़े पहन कर डिस्क जाने पर रोक लगा दी गयी. मध्य प्रदेश के मंत्री बाबूलाल गौर का कहना है कि चेन्नई में अपराध कम इसलिए होते हैं, क्योकि वहां की जनता धर्मप्रिय है और महिलाएं पूरे कपड़े पहनती हैं.

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संस्कृति के संरक्षक कहते हैं छोटे कपड़े पहनने से बलात्कार होता है, देर रात को बाहर घूमने से बलात्कार होता है, बदतमीज़ी का विरोध कर के बलात्कारियों को उकसाती हैं लड़कियां. छोटे व भड़काऊ कपड़े पहनने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार हो जाए तो क्या गलत है, शराब पीने वाली लड़कियां चरित्र से गिरी होती हैं, देर रात घर से बाहर रहने वाली लड़कियां बलात्कार को न्योता देती हैं, घर से बाहर अकेले घूमने वाली, लड़कों के साथ रहने वाली, ब्वॉयफ्रेंड रखने वाली, झगड़ालू व बेबाक बोलने वाली, वैश्यावृत्ति करने वाली लड़कियां बलात्कार डिज़र्व करती हैं, अथवा इनके साथ रेप हो जाए तो बहुत हद तक जस्टीफाइड है. लड़की की मर्ज़ी के बिना बलात्कार संभव नहीं इत्यादि. वो बलात्कार क्यों होता है जो पति अपनी पत्नियों के साथ करते हैं. खैर, कई लोग तो इसे बलात्कार ही नहीं मानते. पत्नी तो पति की प्रॉपर्टी होती है न? फिर कैसे जब चाहे, जैसे चाहे यूज़ नहीं होगी? अगर छोटे कपड़े पहनने से बलात्कार होता है तो उन देशों में ज़्यादा बलात्कार होने चाहिये जहां लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहनने की आज़ादी है. पर ज़्यादा यहीं क्यों होते हैं, जहां हम संस्कृति की दुहाई दे कर सारी महानता लड़कियों से करवाते रहते हैं?

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जब शिकायत करो या विरोध करो तो कहा जाता है कि फेमिनिज़म के नाम पर लड़कियां सिमपैथी पाना चाहती हैं, उनकी रक्षा के लिए बने कानूनों का मिस-यूज़ करती हैं. अब इस रोने की ज़रूरत नहीं है, महिलाएं सशक्त हो चुकी हैं. यहां हम समानता की और महिला सशक्तिकरण की बस बातें ही कर सकते हैं. यही है समानता के मायने यहां कि मर्द जो चाहें पहन सकते हैं, पर लड़कियां क्या पहनेंगी ये वो तय नहीं करेंगी. कभी धर्म के नाम पर, कभी संस्कृति के नाम पर, क्यों किसी न किसी तरह लड़कियों को कंट्रोल किया जाता है? एक आदर्श बेटी वो ही पहनती है जिसकी इजाज़त उसके पिता देते हैं और एक आदर्श बीवी भी सिर्फ वो ही पहनती है जिसकी इजाज़त उसका पति उसे देता है.

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मॉरल पुलिसिंग करने वाले बताएं कि धर्म-संस्कृति के नाम पर एक लड़की के साथ ऐसी बदसलूकी करना उन्हें कौन-सा धर्म और कौन-सी संस्कृति सिखाती है? मॉरल पुलिसिंग बोल-बोल कर संस्कृति की धज्जियां बहुत उड़ा लीं, अब वक़्त आ गया है कि अपने मॉरल सुधार लें.

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