हम में से ज़्यादातर लोग घर के छोटे-मोटे, लेकिन ज़रूरी रोज़ाना के कामों को करने के लिए सुपर मार्किट, बैंक्स, सब्ज़ी मंडी जैसे जगहों पर जाते हैं, इसी भाग दौड़ में हमारा पूरा दिन निकल जाता है. जो लोग ऑफ़िस जाते हैं, उनके लिए तो घर बाहर निकलना कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि उनको तो रोज़ ऑफ़िस जाना ही है. लेकिन कभी उनके बारे में सोचा है, जो किसी विक्षमता के कारण खुद से कोई काम करने या चलने फिरने में असमर्थ हैं, और दूसरों पर निर्भर हैं, वो अपना पूरा दिन घर में एक ही जगह पर कैसे बिताते होंगे. अधिकतर देखा गया है कि हमारे देश में परिवार के ऐसे सदस्यों की स्थिति बहुत दयनीय होती है. कभी उनकी दयनीय स्थिति का कारण उनके अपने ही होते हैं, तो कभी उनके अपने चाहकर भी उनको अपने साथ बाहर नहीं ले जा पाते हैं, क्योंकि हमारे देश में दिव्यांगों के लिए वो सुविधायें नहीं हैं, जो विदेशों में हैं.

शायद आपने गौर किया ही होगा कि मेट्रो के अलावा हमारे देश में परिवहन के साधनों में दिव्यांगों के लिए कुछ खास सुविधाएं नहीं हैं. लेकिन वो कहते हैं न कि अगर आपने मन में कुछ करने की ठान ली है, तो कोई रोड़ा, कोई रुकावट आपका रास्ता नहीं रोक सकती है.

दोस्तों, आज हम आपको एक ऐसी महिला से मिलवाने जा रहे हैं, जिसने इन दिव्यांगों के बारे सोचा और उनको घुमाने-फिराने का ज़िम्मा उठाया. किसी फ़रिश्ते की तरह ही हैं नेहा अरोड़ा, जिन्होंने इन लोगों के लिए कुछ करने की ठानी.

नेहा अपने बचपन में कभी भी छुट्टियों में कहीं घूमने नहीं गयीं, क्योंकि उनके माता-पिता दोनों ही दिव्यांग हैं. लेकिन जब वो बड़ी हुई तो उन्होंने घूमने-फिरने का प्लान बनाया. नेहा का बचपन ऐसी परिस्थितियों में गुज़रा है कि जब उनके साथ लोगों की बहुत ज़्यादा सहानुभूति थी, या बिलकुल भी नहीं थी, न ही उनका किसी से मिलना-जुलना था.

नेहा ने ScoopWhoop से बात करते हुए बताया, 'जब हम बड़े हुए और हम अपने पेरेंट्स को घुमाने के लिए बाहर ले जाने लगे, तो शुरआत में तो हमको बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. कुछ लोगों ने तो हमसे ये तक कहा कि आखिर हम ऐसी स्थिति में पेरेंट्स को लेकर बाहर जाने की परेशानी क्यों उठाते हैं.'

एक दशक पहले तक तो दिव्यांगों के लिए कहीं घूमने जाने सम्बंधित जानकारियां और डिटेल्स आसानी से उपलब्ध नहीं थीं और इस वजह से नेहा और उसके पेरेंट्स को कई समस्याएं हुईं. इसी वजह से उसके माता-पिता कहीं नहीं करना चाहते थे. वो सोचते थे कि इससे बहुत ज़्यादा परेशानी होती है.

ऐसी निराशा और असहायता की निरंतर भावना के कारण ही, नेहा ने अपनी जॉब छोड़ने का फैसला लिया और नवंबर 2015 में उसने एक Planet Abled नाम की संस्था की शुरुआत की. जनवरी 2016 में Planet Abled आधिकारिक तौर पर लॉन्च हुआ.

Planet Abled उन लोगों के लिए ट्रिप अरेंज करता है, जो शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं. ट्रिप अरेंज करते वक़्त ये उस व्यक्ति की उम्र, जेंडर और दिव्यांगता को बिलकुल अलग रखते हैं.

ये दो तरह से ट्रिप ऑर्गनाइज़ करते हैं, एक में वो ऐसे लोगों के ग्रुप ट्रिप अरेंज करते हैं, जो अगल-अलग तरह से दिव्यांग हैं.

दूसरा ऐसी ट्रिप जिसमें दिव्यांग व्यक्ति अपने परिवार, दोस्तों, पार्टनर के साथ या अकेले ट्रैवल करता है. ये एक कस्टमाइज़्ड ट्रिप होती है. ये ट्रिप की छोटी से छोटी बात का ध्यान नेहा और उनकी टीम रखती है, ताकि ट्रिप शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक उनको कोई दिक्कत न हो. अगर कोई व्यक्ति केवल एक ख़ास जगह जैसे म्यूज़ियम, मंदिर, या किसी ख़ास रेस्टोरेंट जाना चाहता है, तो उसका भी इंतज़ाम इस ट्रिप में किया जाता है.

जिस भी जगह की ट्रिप ये संस्था ऑर्गनाइज़ करती है, नेहा पर्सनली उस जगह का निरिक्षण करती हैं पहले, ताकि ट्रिप के दौरान किसी को कोई दिक्कत न हो और वो पूरी तरह ट्रिप का मज़ा ले सकें.

नेहा बताती हैं, 'शुरुआत में लोगों को समझाना मुश्लिक होता था क्योंकि कभी-कभी व्यक्ति के फ़ैमिली मेंबर्स बहुत ज़्यादा चिंतित रहते हैं. तो कभी अनजान लोगों के साथ यात्रा करने से ये लोग घबराते हैं.'

जनवरी 2016 में दिल्ली में लोकल ट्रिप करने के बाद नेहा को कई फैमिलीज़ ने सपोर्ट किया, ये ऐसी फैमिलीज़ थीं जिनके घर भी कोई शारीरिक रूप से अक्षम था. इसके बाद नवम्बर 2016 में नेहा ने पहली राफ़्टिंग ट्रिप ऑर्गनाइज़ की वो भी उन लोगों के लिए जो व्हीलचेयर पर थे.

इसके साथ ही आखिर में ज़ोर देते हुए वो कहती हैं कि हमारे देश के अलावा पूरी दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो ऐसी ट्रिप पर जाना चाहते हैं और इन लोगों को इसके लिए तैयार करने के लिए पहले उनका विश्वास जीतना ज़रूरी है, ताकि वो खुद को सुरक्षित महसूस करें.

Planet Abled, 6 लोगों की एक टीम है, जिनमें से एक नेहा भी हैं और ये सभी राजधानी दिल्ली में ही रहते हैं.