इस दुनिया में डॉक्टर्स को भगवान का दर्जा दिया जाता है, वो किसी मरते इंसान की जान बचाते हैं, तो एक नन्हीं सी जान को दुनिया में लाते हैं. दुनिया में ऐसे कई जटिल केसेज़ हैं जब डॉक्टर्स ने घंटों तक नामुमकिन ऑपरेशन करके मरीज़ की जान बचाई है. अगर ये कहा जाए कि जब एक इंसान दुनिया में जन्म लेता है और जब उसकी मौत होती है, तब तक कई बार ऐसे मौके आते हैं जब उसको डॉक्टर्स की मदद की ज़रूरत पड़ती है. और इसके लिए हमको डॉक्टर्स का आभारी होना चाहिए.

पर अगर ये कहा जाए कि सभी डॉक्टर्स इस सम्मान के पात्र नहीं हैं, तो गलत नहीं होगा क्योंकि कई बार ऐसे भी कैसेज़ हुए हैं, जब डॉक्टर्स के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैये और नज़रअंदाज़ी की वजह से कई मरीज़ों को अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ा है. कई डॉक्टर्स ने कभी मरीज़ के पेट में कैंची तो कभी टॉवल तक छोड़ दी. इतना ही नहीं कई बार बायीं साइड की जगह दायीं साइड के हाथ, पैर या किडनी का ऑपरेशन कर डाला.

पिछले कुछ सालों में इस निःस्वार्थ भावना वाले पेशे को बिज़नेस बना दिया गया है. अब हॉस्पिटल हो या प्राइवेट क्लिनिक चलाने वाला डॉक्टर्स मरीज़ से छोटी से छोटी बीमारी के लिए भी हज़ारों-लाखों रुपये ऐंठने की कोशिश करते हैं. हाल ही में कई ऐसे कैसेज़ भी सामने आये हैं, जब एक या दो दिन के इलाज के लिए मरीज़ को लाखों रुपये का बिल थमाया गया है. इतना ही नहीं गरीब और दिव्यांग मरीज़ों को बेड तो दूर की बात है व्हीलचेयर तक नहीं दी जाती है.

ऐसी ही एक आपबीती एक सोशल मीडिया यूज़र Parul Bhasin Verma ने शेयर की है. जिनकी मां को कई महीनों हॉस्पिटल के ICU में भर्ती रखा गया, उनको करोड़ रुपये का बिल भी थमाया गया, और दुर्भाग्य की बात ये हैं कि उनकी मां की जान भी चली गई. पारुल की इस पोस्ट ने को देश के लाखों लोगों ने पढ़ा और उनको बहुत बड़ा शौक़ भी लगा.

साल की शुरुआत में पारुल की मां को बीमारी होने के कारण हॉस्पिटल में भर्ती किया गया, जिसके बाद टेस्ट से पता चला कि उनको हुई लीवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) जो लीवर डिसीज़ का आखिरी चरण होता है और जिसके बाद लीवर काम करना बंद कर देता है, के बारे में बताया गया.

अपनी मां को बचाने के लिए पारुल और उसके परिवार ने 1.2 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन फिर भी वो अपनी मां को बचा नहीं पायी. और अब उनके ऊपर लाखों रुपये का कर्ज़ा हो गया है. 7 मई, 2018 को पारुल की मां का मल्टीपल ऑर्गन फ़ेलियर की वजह से देहांत हो गया. पारुल और उसके परिवार को बीते चार महीनों में एक हॉस्पिटल से दूसरे हॉस्पिटल, तो कभी डॉक्टर की भद्दी और खराब कमेंट्स तो कभी ख़राब सर्विस का सामना करना पड़ा. पर कहीं भी उनको संतोषजनक परिणाम नहीं मिला. मिला तो सिर्फ़ ये कि उसकी मां ने उसकी आंखों के सामने दम तोड़ दिया. वो भी 100 दिन एक से दूसरे हॉस्पिटल में ICU में गुज़ारने के बाद. और ये सब क्यों हुआ क्योंकि उनको जो भी डॉक्टर्स मिले सब उनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर केवल पैसा बना रहे थे.

यहां आप बिल की कॉपीज़ देख सकते हैं.

पारुल भसीन वर्मा ने अपनी पोस्ट में लिखा, मेरी मां को ICU में रखने और इलाज करने के एवज में हर दिन हमसे 1 लाख रुपये लिए गए. उन्होंने अपनी पोस्ट में सिलसिले वार हर दिन की बात को लिखा है कि का उनकी मां को हॉस्पिटल में भर्ती किया गया, कब किस डॉक्टर ने क्या कहा, कब एक हॉस्पिटल से दूसरे हॉस्पिटल में भर्ती किया गया. उन्होंने अपनी इस कहानी को 'medical kidnapping' कहा है.

पारुल की पूरी कहानी आप यहां पढ़ सकते हैं:

पारुल की फ़ैमिली के साथ जो हुआ वो बेहद दर्दनाक है और ये पहला मामला नहीं है जब डॉक्टर्स की लापरवाही और पिसा बनाने की नीयत के कारण एक इंसान की मौत हुई है. इससे पहले भी कई बार ऐसी ख़बरें आती रही हैं. पहले भी कई लोगों ने इस तरह के मामलों को लेकर अपने अनुभवों को शेयर किया है कि डॉक्टर्स और हॉस्पिटल्स ने उनका मानसिक और आर्थिक शोषण किया है.इतना ही नहीं कई लोगों ने तो ये तक शेयर किया कि केवल पैसा कमाने के लिए डॉक्टर्स ने मरीज़ को वेंटिलेटर पर रखा और मृत घोषित नहीं किया, जबकि मरीज़ पहले ही मर चुका था.

TimesNow ने पारुल की बात को दुनिया के सामने रखने के लिए एक वीडियो फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था, जिसमें पारुल ने अपनी आपबीती तो सुनाई, साथ ही प्रशासन पर भी सवालिया निशान लगाए हैं. आप ये पूरा वीडियो यहां देख सकते हैं.

इस पोस्ट को जब सोशल मीडिया ने हाथों-हाथ लिया, तब पारुल ने एक पोस्ट और शेयर की और लोगों का शुक्रियाअदा किया. इस वीडियो में पारुल ने सीधे-सीधे यशोदा हॉस्पिटल (सिकंदराबाद), बी.एल. कपूर हॉस्पिटल (दिल्ली) यहां तक कि एक डॉक्टर ज्योत्स्ना वर्मा का भी नाम लिया और अथॉरिटीज़ से अनुरोध किया है कि इन हॉस्पिटल्स और ऐसे डॉक्टर्स पर इंवेस्टिगेशन करना चाहिए.

यहां सवाल यही उठता है कि जिस मरीज़ का परिवार पहले से ही तनाव में हॉस्पिटल आता है और उम्मीद करता है कि उसके परिवार का सदस्य वहां से ठीक होकर जाएगा, पर उसे केवल धोखा ही मिलता है, आखिर क्यों? क्या किसी की जान से बढ़कर पैसा हो गया है आजकल डॉक्टर्स के लिए? क्या गवर्नमेंट को इसके लिए कोई गाइडलाइन्स नहीं बनानी चाहिए? क्यों कुछ डॉक्टर्स और बड़े-बड़े हॉस्पिटल्स ने इस सम्मानजनक पेशे को पैसा कमाने का एक ज़रिया बना लिया हैं, क्यों डॉक्टरी के पेशे को गोरखधंधा बना कर छोड़ दिया है, जहां हर कोई अपनी मनमानी कर रहा है?