अकसर हमारे समाज में कुछ समुदायों के प्रति या कुछ राज्य के लोगों के प्रति एक पूर्वाग्रह तय कर लिया जाता है. अब सरदारों की बात ही ले लेते हैं. आपने गौर किया होगा कि हमारे देश में अधिकतर जोक्स सरदारों पर ही बनाए जाते हैं, पर ऐसा क्यों? क्या सरदार होना कम बुद्धि की निशानी है?

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हम सभी कभी न कभी सरदारों के चुटकुलों पर हंसे हैं, ख़ास तौर पर 12 बजे वाला जोक तो अकसर सुनाया जाता है. आपने शायद ही कभी किसी सरदार को इस बात पर भड़कते हुए देखा होगा, लेकिन एक सरदारनी है, जो अकेली इस नस्लवाद के खिलाफ़ लड़ रही है.

सुप्रीम कोर्ट में एक महिला ने इन जोक्स पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की है. इसमें उन्होंने ऐसी 5,000 वेबसाइट्स को बैन करने की बात कही है, जो सरदारों पर बने चुटकुले पेश करती हैं. ये याचिका हरविंदर कौर चौधरी ने दायर की है. इसमें कहा गया है कि सरदारों पर बने चुटकुले उन्हें बेवक़ूफ़ दिखाते हैं. ये एक तरह का नस्लवाद है.

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हरविंदर ने जो मुहीम छेड़ी है, उसमें आज कई लोग उनके साथ खड़े हो गए हैं. हरविंदर एक मज़बूत महिला हैं और हमेशा ग़लत की खिलाफ़त करती आई हैं. वो पेशे से वकील हैं. हरविंदर बताती हैं कि जब वो अपनी नन्हीं बेटी को लेकर कोर्ट जाती थीं, तब भी लोग यही कह कर उन पर फब्तियां कसते थे कि 'सरदारनी है, इसलिए ऐसा पागलपन कर रही है.'

कम उम्र में अपने पति को खो चुकीं हरविंदर को लोग अकसर 'मूर्ख सरदारनी' का तमगा दे दिया करते थे. तभी से उनके मन में इस चीज़ के लिए गुस्सा भरने लगा था. उनका कहना है कि ये उतना ही बुरा है, जितना किसी को 'चिंकी' जैसे शब्द बोलना. इस तरह की चीज़ों से समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं और द्वेष फैलता है.

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ये नकारात्मक रूढ़ीवादी सोच समाज में लोगों की मानसिकता पर ग़लत असर डालती हैं. इसलिए ऐसे मामलों में सख्ती बरतने की ज़रूरत है. सरदार वाले चुटकुलों को इग्नोर करने के बजाय इसके खिलाफ़ कदम उठा कर, हरविंदर पूरे सिख समुदाय के लिए अच्छा कर रही हैं. हम इस पहल की सराहना करते हैं.

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