दुनिया ने हमेशा महिलाओं को कमतर ही आंका है. पुरुषों की इनसिक्योरिटी कहिए या कुछ और. पुरुष ख़ुद कितने भी आगे बढ़ जायें महिलाओं के प्रति उनकी सोच प्रगतिशील हो ये कतई ज़रूरी नहीं है.


इतिहास में कई महिलाओं ने समाज को चैलेंज किया और अपने सपने पूरे किये. ऐसी ही एक महिला थीं, विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला. कमला सोहोनी.

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कौन हैं कमला सोहोनी?


कमला का जन्म, 18 जून 1911 को मुंबई के एक बेहद शिक्षित परिवार में हुआ. उनके पिता और चाचा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंसेस (अब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस) से केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन करने वाले पहले छात्रों में से थे.

बचपन से ही कमला को विज्ञान में रुचि थी. जब कमला ने भी केमिस्ट्री पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर की तो उसके घरवालों को अचंभित नहीं लगा. कमला ने स्कूल में अपने क्लास में टॉप करने के बाद अपने पिता और चाचा के नक्शे कदम पर चल पड़ी और बोम्बे प्रेसिडेंसी कॉलेज में फ़िज़िक्स और केमिस्ट्री कोर्स में प्रवेश लिया.

कमला को ग्रेजुशन में अपने बैच में सबसे ज़्यादा अंक मिले. कमला ने मास्टर्स के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस में एप्लाई किया. ये न केवल उसके परिवार का 'रिवाज़' था बल्कि उनके वैज्ञानिक बनने के सपने को पूरा करने के लिए भी बेहद ज़रूरी था. उस वक़्त सी.वी.रमन इसके हेड थे और इसे साइंस की पढ़ाई के लिए सबसे उत्तम संस्थान माना जाता था.

सी.वी.रमने ने नहीं दिया प्रवेश


ग्रेजुएशन में अच्छे अंक होने के बावजूद कमला को यहां प्रवेश देने से मना कर दिया गया. सी.वी.रमन उन्हें प्रवेश सिर्फ़ इसलिये नहीं देना चाहते थे क्योंकि वो एक महिला थीं. कमला के पिता और चाचा के बार-बार निवेदन पर भी सी.वी.रमन का यही कहना था कि वो किसी महिला को अपने इंस्टीट्यूट में प्रवेश नहीं देंगे.

कमला के इरादे मज़बूत थे. वे रमन से मिलीं और उनसे प्रवेश न देने की वजह पूछी. इसके साथ ही कमला ने उन्हें चैलेंज भी दिया कि वो डिस्टिंक्शन से पास करेंगी. रमन के पास जब कोई चारा नहीं बचा तो उन्होंने कमला को निम्न शर्तों पर प्रवेश दिया-
- कमला को बतौर रेग्युलर कैंडिडेट अनुमति नहीं दी जायेगी.
- कमला को अपने गाइड के निर्देशों पर देर रात काम करना होगा.
- कमला लैब का माहौल नहीं बिगाड़ेंगी.

22 वर्षीय कमला ने शिक्षा के लिए सारी शर्तें मान लीं पर इस वाक्ये से उन्हें गहरी ठेस पहुंची थी.

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मास्टर्स में डिस्टिंक्शन हासिल किया


इंस्टीट्यूट में पढ़ाई के दौरान कमला ने अपना सबकुछ पढ़ाई में झोंक दिया. कमला को एक सख़्त पर समर्थन करने वाले शिक्षक, एम. श्रीनिवासैया भी मिला. उनके अंडर में कमला ने दूध, दाल और लेग्युम प्रोटीन्स पर शोध किया.

कमला काम के प्रति इतनी समर्पित थी कि रमन की भी सोच बदल गई और उन्हें एहसास हो गया कि महिलाएं साइंटिफ़िक रिसर्च में काफ़ी आगे जा सकती हैं.

1936 में कमला ने अपना रिसर्च जमा किया और डिस्टिंकशन के साथ मास्टर्स की डिग्री हासिल की. यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में उन्हें रिसर्च स्कॉलरशिप मिल गया.

इसके अगले ही साल रमन ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस के दरवाज़े महिलाओं के लिए खोल दिये.

यूके का जीवन


1937 में कमला यूके पहुंची और कैम्ब्रिज के बायोकेमिकल एंड फ़िज़ियोलॉजिकल लैब में न्युरोकेमिस्ट्स Derek Richter के ग्रुप को जॉइन किया. Richter के नौकरी छोड़ने के बाद कमला ने Robin Hill का रिसर्च लैब जॉइन किया.

वैज्ञानिक उनके काम से इतने इम्प्रेस हुए कि उन्हें नोबेल विजेता, Fredrick G Hopkins के लैब को जॉइन करने की सलाह दी. Hopkins ने डायट में विटामिन्स की आवश्यकता के बारे में खोज करके क्रांति ला दी थी. Hopkins ने भी कमला का उत्साहवर्धन किया और उन्होंने 16 महीने से कम समय में अपनी थीसिस जमा कर दी.

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भारत लौटने का निर्णय


कमला को अमेरिका के फ़ार्मा कंपनियों से कई ऑफ़र मिल रहे थे पर उन्होंने 1939 में भारत लौटने का फैसला किया. महात्मा गांधी के विचारधारा को मानने वाली कमला आज़ादी की लड़ाई में सहयोग करना चाहती थीं.

दिल्ली के Hardinge Medical College में थोड़े दिन काम करने के बाद कमला ने कुन्नूर के Nutrition Research Lab में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर पद संभाला. यहां उन्होंने न्यूट्रिशन में विटामिन के रोल पर शोध किया.

महाराष्ट्र सरकार ने बोम्बे इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस में बायोकेमिस्ट्री डिपार्टमेंट खोला था और बायोकेमिस्ट्री के प्रोफ़ेसर के पद के लिए कमला को चुना गया. इंस्टीट्यूट में रहने के दौरान उन्होंने 'नीरा' (ताड़ के पेड़ के रस, चावल के आटे और लेग्युम्स से बनने वाला पेय पदार्थ ) पर काम किया.

कमला को शोध में पता चला कि इस पेय को गुड़ से बनाये जाने पर भी नीरा में जो विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं वो बरक़रार रहेंगे. यहीं से गुड़ को कुपोषित बच्चों और गर्भवती महिलाओं के डायट में जोड़ने की पहल शुरू हो गई.

कमला 1969 में काम से रिटायर हुईं और 1998 में दिल्ली में उनका देहांत हो गया. कमला ने जो रास्ता तैयार किया उस पर चलकर आज हज़ारों महिलाएं वैज्ञानिक बनने के सपने को पूरा कर पाई हैं.