हर साल हम लोग मई के पहले रविवार को हम मातृ दिवस मनाते हैं. मां, मम्मी, अम्मा, आई नाम अनेक हैं लेकिन उम्मीद सबसे एक ही की जाती है.

आप में से बहुत लोग शायद ये आर्टिकल क्लिक करके मां के त्याग और बलिदान से जुड़ी बातें पढ़ने के लिए आए होंगे. पहले मुझे भी ऐसा ही लगता था कि 'मां' तो इंसान नहीं कोई अलग ही प्राणी है जिसके पास इस दुनिया की तमाम मुश्किलों का हल है और उसकी अपनी कोई तक़लीफ़ नहीं है. क्योंकि उसका तो सब कुछ उसके बच्चों में है या परिवार में. फ़िल्मों में भी ऐसा ही देखा है और पढ़ा भी कुछ ऐसा ही है. घर पर मम्मी ज़रा भी अपनी दिक़्क़त के बारे में बात करती थी तो मैं खीज सी जाती थी कि बताओ अपने बारे में कैसे सोच सकती हैं. उनके दिमाग़ में तो 24 घंटे 365 दिन मेरा और घर का ख़्याल होना चाहिए न.

ख़ैर, बड़ी हुई समाज को नज़दीक से देखा और समझा तो जाना मैं कितनी ज़्यादा ग़लत थी. और बाक़ी सब भी. कितना ग़लत है ये एक इंसान से इतना कुछ चाहना. इसलिए आज मैं अपनी ही नहीं हर मां से वो बातें कहना चाहती हूं जो मुझे बहुत पहले कहनी चाहिए थी. आप भी अपनी मां से ये ज़रूर बोलें: 

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