सपने सभी देखते हैं, पर उन सपनों को सच करने की हिम्मत कम लोगों में ही होती है. ऐसे लोगों की संख्या और कम है, जो इतिहास को बदलने का जज़्बा रखते हैं.


इतिहास बदलने और आगे की पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाने वालों में से ही एक हैं प्रिया झिंगन

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कौन हैं प्रिया झिंगन?


1992 तक भारतीय सेना में महिला कैडेट्स की भर्ती नहीं होती थी. इस सूरत को बदला प्रिया झिंगन ने. प्रिया ने तब के Chief of Army Staff, General Sunith Francis Rodrigues को ख़त लिखा और उनसे महिलाओं के लिए सेना के दरवाज़े खोलने का निवेदन किया. जनरल सुनीथ ने भी उन्हें निराश नहीं किया और जवाब दिया कि वो अगले 2 साल के लिए महिलाओं को सेना में भर्ती करने की प्लांनिंग कर रहे हैं.

सेना से जुड़ने का सफ़र


एक इंटरव्यू में झिंगन ने बताया कि उन्होंने कक्षा 9वीं में ही सेना से जुड़ने का निर्णय ले लिया था, पर उन्हें इस मंज़िल के रास्ते का पता नहीं था. कॉलेज के दिनों में उन्हें अख़बार में 'युवाओं के सेना में भर्ती' का विज्ञान देखा. इस विज्ञापन को देखकर झिंगन के मन में सवाल उठा कि महिलाएं सेना में क्यों नहीं जा सकतीं?

इसके बाद झिंगन ने जनरल सुनीथ को ख़त लिखा और इस घटना के ठीक 4 साल बाद अख़बार में विज्ञापन आया, 'स्त्रियों, सेना आपको बुला रही है...'

JAG अफ़सरों की 2 वेकेंसी निकली थी. झिंगन ने भी उसी के लिए एप्लाई किया और उन्हें SSB के लिए इंटरव्यू लेटर मिला. झिंगन ने इंटरव्यू में झंडे गाड़ दिए. झिंगन को लेडी कैडेट नंबर 01 टैग मिला.

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आर्मी ट्रेनिंग के दिन


झिंगन ने एक इंटरव्यू में बताया कि 25 महिला कडैट्स को लगा था कि उन्हें महिलाएं होने की वजह से कुछ छूट मिलेगी. ग़ौरतलब है कि उन्हें पुरुष कडैट्स की तरह ही कड़ी ट्रेनिंग दी गई.

6 मार्च, 1993 को कड़ी ट्रेनिंग के बाद झिंगन ने सर्विस जॉइन की. झिंगन सेना की इनफ़ैन्ट्री डिविज़न में जाना चाहती थीं, लेकिन लॉ ग्रैजुएट होने की वजह से उन्हें बतौर जज एडवोकेट जरनल अपॉइंट किया गया. उस दौर में महिला अफ़सरों के लिए कोम्बेट पोज़िशन नहीं थीं.

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हर तरह की लड़ाई के प्रति थीं बेहद सजग


ट्रेनिंग के दिनों में झिंगन के कमरे में एक पुरुष जवान नशे में धुत्त होकर घुसा. झिंगन ने तुरंत उसकी शिकायत दर्ज की और जवान का कोर्ट-मार्शल कर दिया गया.

बतौर जज एडवोकेट जनरल प्रिया ने 10 साल काम किया और 2002 में मेजर प्रिया झिंगन बनकर रिटायर हुईं.