ग़रीब आदमी अपना पेट भरने के लिए और अमीर आदमी अपना पेट कम करने के लिए बोझ उठाता है. एक धूप में सड़क, इमारतों में तो दूसरा एसी वाले जिम के अंदर. मगर तब क्या हो, जब सड़कोंं पर मज़दूरी करने वाला कोई जिम के अंदर जाकर बोझ उठाने लगे? बता दें, उस वक़्त काली सी लगने वाली ज़िंदगी सुनहरी बन जाती है.

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आज की कहानी एक ऐसी ही ‘दिहाड़ी मज़दूर मां’ की है, जो कभी ईंटें-पत्थर ढोती  थी, रेत साफ़ करती थी, सीमेंट की बोरियां इमारतों की छतों तक पहुंचाती थी और आज वो बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीत चुकी हैं.

कभी दिहाड़ी मज़दूर थीं संगीता (S Sangeetha)

35 वर्षीय एस. संगीता (S Sangeetha) तमिलनाडु की रहने वाली हैं और दो बच्चों की मां हैं. एक समय वो अपने पति के साथ कंस्ट्रक्शन वर्कर के तौर पर काम करती थीं. बच्चे पढ़ाई कर रहे थे. दोनों मिलकर किसी तरह गुज़ारा कर लेते थे. मगर पति की एक बीमारी के चलते मौत हो गई. उसके बाद संगीता की मुश्किलें बढ़ गईं. 

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दुनिया की हर फ़ील्ड में जैसे महिलाओं के साथ भेदभाव होता है, वैसा ही मज़दूरी में भी था. जहां पुरुषों को 300 रुपये दिहाड़ी मिलती थी. वहीं, संगीता को महज़ 200 रुपये. जबकि, वो पुरुषों के बराबर ही काम करती थीं. हालांकि, संगीता धीरे-धीरे पुरुषों से भी ज़्यादा वज़न ढोने लगीं. उनकी इस क्षमता को देख कर बाकी लोग हैरान रह गए. ठेकेदार ने भी उनकी दिहाड़ी बढ़ा दी. लोग उन्हें मज़ाक में बॉडी बिल्डर कहने लगे. 

बच्चों की परवरिश के लिए दिहाड़ी मज़दूर से बनीं बॉडीबिल्डर

लोग उन्हें बॉडी बिल्डर कहते थे. ऐसे में संंगीता को समझ नहीं आता था कि ये क्या होता है. मगर उनके बच्चों को ये पता था. उन्होंने अपनी मां को YouTube पर इस बारे में दिखाया. बाद में संगीता ने उन बॉडी बिल्डर्स को कॉपी करना शुरू कर दिया. वो अब कंस्ट्रक्शन फ़ील्ड पर भी वज़न उठाते वक़्त अपने बॉडी पॉश्चर पर ध्यान देने लगीं.

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यहां तक कि उन्होंने घर पर ही लकड़ी और ईंटों की मदद से एक जिम बना लिया. काम के बाद वो यहां प्रैक्टिस करती थीं. दरअसल, उन्हें किसी ने बता दिया था कि इस काम से अच्छे पैसे कमाए जा सकते हैं. ऐसे में बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए उन्होंने सोचा कि अगर वज़न उठाना ही है, तो क्यों न सलीके से उठाएं.

आसान नहीं था ये सफ़र

एक बॉडी बिल्डर बनने के लिए सिर्फ़ जिम ही नहीं, डाइट की ज़रूरत भी पड़ती है. संगीता (S Sangeetha) की मेहनत देख कर उन्हें एक जिम में बिना पैसे के वर्कआउट करने को तो मिल गया, मगर ख़ुराक नहीं मिली. ट्रेनर ने जो डाइट बताई, उसे ले पाना संगीता के लिए आर्थिक तौर पर मुमकिन नहीं था. ऐसे में उन्होंने ख़ुद अपनी डाइट बनाई.

संगीता ने घर में ही सब्ज़ियां उगाना शुरू किया. पनीर बनाया और दालें खाईं. महज़ 500 रुपये में ही वो अपने महीने भर की ख़ुराक का इंतज़ाम करने लगीं. यही खाना वो अपने बच्चों की भी देती थीं. मगर इस पुरुष प्रधान समाज में हर चीज़ महिलाएं इतनी आसानी से हासिल कहां कर पाती हैं. 

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लोग उन्हें ताने देते थे. कहते थे कि पति के जाने के बाद मनमानी कर रही हैं. कुछ कहते थे कि वो आदमी बनने की कोशिश कर रही हैं. मगर किसी ने नहीं सोचा कि अगर वो ये न करें, तो उनके बच्चों की अच्छी परवरिश कैसे होगी. 

ख़ैर, संगीता ने किसी की नहीं सुनी. वो लगातार वर्कआउट करती रहीं. उसी का नतीजा रहा कि 11 जनवरी 2022 को इंडियन फ़िटनेस फ़ेडेरेशन द्वारा आयोजित की गई दक्षिण भारतीय बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप में संगीता (S Sangeetha) ने गोल्ड मैडल हासिल किया. आज लोग संगीता से कोचिंग लेना चाहते हैं.