सर पर बोझ उठाये धूप में घूमने की वो इतनी आदी हो चुकी थी, कि उमस की रात में भी अपने बेटे को छाती से चिपकाये वो बड़े आराम से सो रही थी. हालांकि उसके शरीर का अधिकतर हिस्सा पसीने से तरब-तर हो रखा था, साड़ी भी कई जगह से बेपर्दा हो चुकी थी, जिसकी वजह से जांघ का एक बड़ा हिस्सा दिखाई दे रहा था. बीच-बीच में जब भी लड़का रोता, तो वो उसे एक छाती से हटा कर दूसरी तरफ कर लेती और सोते-सोते ही दूध पिलाने लगती.

धुएं से स्याह हो चुकी घर की दीवारें और उसी धुएं की बदौलत काले पड़ चुके पर्दे तो बोलते ही थे, लेकिन घर भी घर में रहने वालों की हालत के बारे में बिना किसी झिझक के सब कुछ बयां कर रहा था. इस घर में कुछ भी ऐसा नहीं था कि जिसे सन्दूक के ताले तले छिपा कर रखा जाये. ले दे कर एक बांस की टोकरी थी, जिस पर सुबह होते ही बुधिया चूड़ियां बेचने निकल जाया करती थी. धूप में घूमने की वजह से उसका रंग गोरे से सांवला और सांवले से काला पड़ने लगा था, पैरों के तलवों में भी गांठें उठने लगी थीं. चेहरे पर पड़ने वाली झाइयां उसे उम्र से पहले ही बूढ़ा करने लगी थी.

शायद हमेशा से ही ऐसा नहीं था क्योंकि जब भी वो साथ वाली चमरटोली की स्त्रियों के साथ पानी लेने जाती तो अपने पिता के ठाठ-बाठ के किस्से सुनाना न भूलती, जिसमें वो बताती कि कैसे एक बार उसके दादा ने राजपूतों को घुड़दौड़ में हराया था. जिसके चलते अंग्रेजों ने उसके दादा को 'सिंह' की उपाधि दी थी और उनके घर के पीछे जो पोखर है, उसमें कभी हाथी रहा करते थे. आस-पास की औरतें बुधिया की इस बात पर यकीन भी कर लिया करती थीं क्योंकि सब जानते थे कि जब वो इस गांव में ब्याह कर आई थी, तो सारे गांव के लड़के उसकी एक झलक के लिए कुएं के आस-पास लार टपकाए घूमा करते थे. बच्चे भी अपनी मां से ऐसी ही दुल्हन लाने की मांग किया करते थे. पर आज हालात दूसरे थे. एक हाथ में मिट्टी के काले हो चुके घड़े और दूसरे हाथ में छाती से बेटे को चिपकाये, फटी साड़ी में एक टांग उठाये सरकारी नल्के से पानी लेने जाया करती बुधिया. बड़ा होने के बावजूद उसका बेटा अपनी मां की छाती को छोड़ने को तैयार नहीं होता था. या यूं कहूं कि गरीबी में ये छाती ही उसका एकमात्र सहारा थी, जो उसका पेट भर सकती थी. इस बात को बुधिया भी अच्छे से जानती थी, जिसकी वजह से औरतों के कहने के बावजूद खुद बुधिया भी उसे मना नहीं करती थी.

शर्म और पर्दा करना तो बुधिया ने उसी दिन से छोड़ दिया था, जिस दिन रामखिलावन ने तारी और महुआ के नशे में चूर बुधिया पर हाथ उठाया था. मारते-मारते रामखिलावन को खुद इस बात का ख्याल नहीं रहा कि कब उसने बुधिया की साड़ी को खींच कर उसे आधा नंगा आंगन में बेहाल छोड़ दिया था. आस-पास के लोग छत्त पर चढ़ कर इस तमाशे को देख रहे थे, कुछ तो घर के भीतर भी आ गए थे, पर बुधिया को उठा कर पानी पिलाने की भी हिम्मत किसी के पास नहीं थी.

आस-पास के अलावा सारे गांव को पता था कि रामखिलावन के भाइयों ने धोखे से उसकी जमीन अपने नाम लिखवा ली है, जिसका गुस्सा वो बुधिया पर उतार कर गया है. उस दिन से रामखिलावन नशे का आदि हो गया था, दिन भर गांव में पागलों की तरह घूमता और शाम को घर आ कर दारू के लिए बुधिया से पैसे मांगता. जैसे ही अंधेरा रात को अपने आगोश में लेता, वैसे ही बुधिया के घर से रोने-धोने की आवाज़ें आना शुरू हो जाती. दिन बीते, महीने बीते, साल बीते पर हालात वही रहे. जेवरों के बाद बर्तन बिकने लगे. इस बीच गणेश पैदा हो गया, उसके पैदा होने पर लगा जैसे अब दिन बदलेंगे, पर ये बदलाव भी बस चंद दिनों का ही था.

घर के खाली बर्तन और बच्चे की जिम्मेदारी के बीच आख़िरकार बुधिया ने ही काम करने का फैसला लिया. बचे हुए कान के झुमकों को बेच कर उसने कुछ चूड़ियां खरीदी और एक टोकरी पर उसे बेचना शुरू किया.

पौ फटते ही बुधिया चूड़ी बेचने गांव-गांव निकल जाती और शाम पहर ही लौटती. पर लौटने के बाद जिस चीज़ से उसका सबसे पहले सामना होता, वो थी रामखिलावन की मार. जो दारू के पैसों के लिए दोपहर से ही उसका राह देख रही होती. देह की मार से ज़्यादा भूख की मार ज़्यादा दर्द करती, जिसकी वजह से हर रोज की तरह बुधिया की फटी हुई साड़ी के पल्लू में उतने ही पैसे रह जाते, जिससे सिर्फ एक वक़्त का आंटा ही सकता था.

नमक, पानी और रोटियाों के बीच हर दिन की तरह गणेश का जलेबी खाने का सपना बस सपना ही रह जाता. हर रोज की तरह वो जलेबी की जिद्द करता और बुधिया के दो तमाचों के बाद उसकी जिद्द ठंडे पानी में उबाल की तरह ठंडी हो जाती. बुधिया हर सुबह निकल जाती, हर शाम वही रामखिलावन की मार और गणेश की जलेबी की जिद्द होती.

हर साल की तरह इस साल भी गर्मियां अपने पिछले रिकॉर्ड को तोड़ रही थीं. गर्मियों की एक ऐसी ही सुबह, रात की मार पिछले दिन की थकान से बुधिया के पेट में दर्द हो रहा था. पिछली रात शायद किसी बात को लेकर बुधिया और रामखिलावन के बीच बहस बढ़ गई थी और रामखिलावन ने उसे ज़्यादा ही मार दिया था. पर पिछली रात से ज़्यादा बुधिया को आने वाली रात की चिंता थी. अगर आज वो नहीं गई तो कई रात की तरह गणेश को भूखा ही सोना पड़ेगा. सीता के घर से भी कोई सहारा नहीं था, क्योंकि एक रात दारू के नशे में रामखिलावन ने सीता को बहुत बुरा भला कहा था और सीता के पति के साथ रामखिलावन की हाथापाई की नौबत आ गई थी.

अपने शादी के दिनों को याद करती हुई दर्द से लड़ते हुए बुधिया उठी, मुश्किल से ही उस दिन बुधिया ने चूड़ियों वाली टोकरी उठाई और उस सड़क की तरफ़ निकल पड़ी, जो दूर तक फैली थी.

शाम हुई गणेश भी मां के इंतज़ार में सड़क पर नज़रें गड़ाए हुए चमरटोला के बच्चों के साथ खेल रहा था. घर पर रामखिलावन भी आज की दारु के लिए बुधिया का इंतज़ार कर रहा था.

अंधेरा धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा था, उधर रामखिलावन बुधिया का इंतज़ार कर-कर के पागल हुआ जा रहा था, असल में उसे बुधिया से ज़्यादा अपनी दारू के लेट होने की चिंता थी.

जैसे तैसे दर्द से कराहते हुए बुधिया घर पर पहुंची अभी उसने चूड़ियों की टोकरी रखी ही थी कि रामखिलावन का चिल्लाना और पीटना शुरू हो गया. गुस्से में उसने बुधिया को इतना मारा कि वो नीचे गिर पड़ी. रामखिलावन पैसे लेकर बाहर निकल आया. बुधिया दर्द से कराहती रही. दर्द में उसने गणेश को पुकारा. गणेश पानी लेकर मां के पास आया कि उसने देखा बुधिया की आंखों में आंसू है, जो आंसू न लग कर आज खून लग रहे हैं. रोते-रोते ही बुधिया ने अपने साड़ी का वही पल्लू खोला, जिसे रामखिलावन के जाने के बाद वो अकसर खोला करती थी. पर इस बार इस पल्लू में पैसे की जगह जलेबी थी, जिसे उसने गणेश को दिया. गणेश जलेबी को खा ही रहा था कि उसने देखा बुधिया बेसुध पड़ी है. उसकी फटी हुई साड़ी बिखर गई है और मुंह से लार होठों तक बेपरवाह बही जा रही है.

साड़ी के पल्लू आखिरी बार खोलने के साथ बुधिया ने गणेश की ख्वाहिश तो पूरी कर दी थी, पर इसके साथ ही वो एक गहरी नींद में सो गई. जिसके बाद उसने कभी अपनी आंखें नहीं खोली.

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Art by: puneet