प्राचीनकाल से ही महिलाएं समाज में किसी न किसी रूप में महत्वपूर्ण योगदान देती आ रही हैं. इतिहास में कई महिलाएं ऐसी हुई, जिन्होंने अन्याय के ख़िलाफ़ लंबी लड़ाई लड़ी. बचपन में हमने इतिहास के पन्नों में इन गौरवशाली महिलाओं की कहानियां भी पढ़ी हैं. ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी भोपाल की 'सुल्तान जहां बेगम' की भी है.

सुल्तान जहां बेगम
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सुल्तान जहां बेगम कौन थीं?  

9 जुलाई 1858 को जन्मी 'सुल्तान जहां बेगम' ने भोपाल पर कई सालों तक राज किया था. अपने 25 साल के शासनकाल में उन्होंने भोपाल के लिये कई महत्वपूर्ण काम किये. सबसे पहले उन्होंने महिला शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया. महिलाओं को शिक्षित करने के लिये उन्हें कई स्कूल खुलवाए. इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की स्थापना में अहम योगदान दिया.

Sultan Janha Begum
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सुल्तान बेग़म के इन्हीं कार्यों की वजह से उन्हें समाजसेवी और उन्नतिशील नवाब बेग़म के रूप में पहचाना जाता है.

भोपाल की सियासत

भोपालअपनी ऐतिहासिक संस्कृति और ख़ूबसूरती के लिये मशहूर है. इतिहासकाल में यहां पुरुष नवाबों और शासकों का बोलबाला रहा. हांलाकि, पुरुषवादी समाज के बीच महिलाओं ने इतिहास रचने की हिम्मत दिखाई. इसी बीच 'बेग़म' ने भी अपना भाग्य बदलने के लिये कई चीज़ों का खुलकर विरोध किया. साथ ही उसके लिये जंग भी लड़ी. 

Bhopal begum at dilli darbar
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अहम योगदान

बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि भोपाल की बेग़म ने अखिल भारतीय मुहम्मदन शैक्षिक सम्मेलन के लिये 50 हज़ार रुपये का दान दिया था. ये रक़म आज की तारीख़ में कई लोगों के लिये छोटी हो सकती है, लेकिन उस दौर में ये बढ़ी होती है. दरअसल, 1910 के आस-पास सुल्तान बेग़म कुछ टाइम के लिये अलीगढ़ में रहीं. इसी दौरान बेग़म ने अखिल भारतीय मुहम्मदन शैक्षिक सम्मेलन के लिये रुपयों का दान किया.

AMU
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कहते हैं कि शेख़ अब्दुल्ला ने अलीगढ़ में एक 'गर्ल्स स्कूल' भी शुरू किया था, जिसमें बेग़म हर महीने 100 रुपये दान करती थीं. शिक्षा के प्रति उनके योगदानों को देखते हुए उन्हें 1914 में भारतीय मुस्लिम महिला संघ की अध्यक्ष बना दिया गया था. 

Bhopal Begum
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भोपाल की बेग़म ने सिर्फ़ शिक्षा ही नहीं, बल्कि पुलिस, सेना, कृषि, स्वास्थ्य और स्वच्छता सुधार के लिये बहुत कार्य किया. उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान क़रीब 26 क़िताबें भी लिखीं थीं. 25 साल भोपाल पर राज करने वाली बेग़म ने 1926 में अपने पुत्र हमीदुल्ला ख़ान के लिये सिंहासन छोड़ा. इसके बाद 71 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.