'हर सफ़ल पुरुष के पीछे किसी न किसी महिला का हाथ होता है'. ये कहावत सौ फ़ीसदी सच है.

मेरा मानना तो ये है कि सिर्फ़ पुरुषों के ही नहीं, बल्कि एक सफ़ल महिला के पीछे भी किसी न किसी महिला का हाथ होता है. वो महिला कोई भी हो सकती है आपकी मां, बहन, पत्नी, बेटी या फिर कोई दोस्त. क्योंकि इस धरती का सबसे मुश्किल काम भी (बच्चे को जन्म देना) एक महिला ही करती है.

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ज़िन्दगी अक्सर कई मौकों पर हमारा इम्तेहान लेती रहती है. जब हम दुःखी होते हैं तो मां सिर पर हाथ फ़ेरकर हमारे सारे दुख-दर्द पल भर में दूर कर देती हैं. तो एक बहन हमें हमेशा परिवार की अहमियत की सीख देती है, लेकिन जब हम ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर में होते हैं तो एक पत्नी हर सुख दुःख में हमारे साथ रहती हैं.

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'महिला दिवस' क़रीब है ऐसे में हमने भी अपनी कुछ साथियों से उनकी ज़िंदगी के उस मूमेंट के बारे में जानने की कोशिश की जब किसी महिला ने उनको कोई ऐसे सीख दी हो जिसे वो आज तक फ़ॉलो कर रहे हैं-

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मैं शायद उस वक़्त 5वीं कक्षा में पढता था. मैं शरारती था इसलिए क्लास की एक लड़की मुझे बार-बार परेशान कर रही थी. मुझे ग़ुस्सा आया और मैंने उसकी चोटी पकड़कर उसे ज़ोर से घुमाकर ज़मीन पर पटक दिया. जब ये बात मेरी दीदी को पता चली तो उन्होंने डांटने बजाय मुझसे प्यार से कहा अगर उस लड़की की जगह मैं होता और कोई लड़का मेरे साथ भी ऐसा ही करता तो तुम क्या करते? उस वक़्त मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था, लेकिन मैं आज भी दीदी की उस सीख को फ़ॉलो कर रहा हूं कि 'बात लड़के या लड़की की नहीं है, किसी भी परिस्थिति में अगले इंसान की जगह ख़ुद को रख कर देखिए और समझ आ जाएगा कि आप क्या कर रहे हैं'.

-माही पाल सिंह

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बनारस से दिल्ली MBA करने आया था. कॉलेज के सभी दोस्त जिम करते थे तो मेरा भी मन किया जिम करने का. मैं लक्ष्मी नगर रहता था, मालूम किया तो पता चला की घर के पास ही एक जिम है. कुछ एडवांस देकर मैंने जिम की मेम्बरशिप ली ले. अगले दिन सुबह 7 बजे जिम पहुंचा तो वहां देखा कि जिम ट्रेनर तो कोई महिला हैं. कुछ देर तक तो मैं पचासों लड़कों को ट्रेन करती ट्रेनर को ही देखता रह गया. मेरे अंदर एक अजीब सी झिझक थी, फिर वो मेरे पास आयीं और पूछा कि कहां से हो? मैंने कहा बनारस से मैडम. फिर उन्होंने एक बात कही जो मेरे दिल को छू गई, 'ये दिल्ली है यहां जो काम पुरुष करते हैं महिलाएं भी उस काम को कर लेती हैं'

-अनंत श्रीवास्तव

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3-

साल 2008 की बात है मैं दिल्ली में नया नया आया था. इस दौरान मुझे एक दिन राजीव चौक जाना था. कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पहुंचा ही था कि गेट के बाहर एक महिला कुछ पूछना चाह रही थीं, लेकिन कोई भी सुनने को राजी नहीं था. मैंने जल्दबाज़ी में समझा कि कोई ग़रीब है जो पैसे मांग रहा है, लेकिन जब मैं उनके पास गया तो वो भी राजीव चौक जाना चाह रही थी. फिर मैंने उनका टिकिट लेकर अपने साथ वाली सीट दिलवा दी. दरअसल, वो महिला कनॉट प्लेस पोस्ट ऑफ़िस की हेड थीं. इस दौरन उन्होंने एक बात कही जो मुझे आज भी याद है कि 'बेटा लोग किसी को कपड़ों से कैसे जज कर लेते हैं'?

-माही पाल सिंह

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4-

करीब 5 साल पुरानी बात है. मैं अपने दोस्तों के साथ पुराना क़िला घूमने गया हुआ था. इस दौरान मुझे करीब 70 साल की एक बुज़ुर्ग महिला तिरंगे कलर के गुब्बारे बेचती दिखीं. तभी मेरी नज़र उनके स्वेटर पर गई जो इंडियन एयर फ़ोर्स का था. इस पर मैंने उनसे पूछा कि ये स्वेटर कहा से मिला तो उनका कहना था कि उनके पति का था जो एयर फ़ोर्स में रहते देश के लिए शहीद हो गए थे. जब तिरंगे गुब्बारे बेचने का कारण पूछा तो बोलीं कि उनके पति को देश और तिरंगे से बेहद प्यार था, इसलिए वो उनके जज़्बे को उसी तरह कायम रखने की कोशिश कर रही हैं. 'उस दिन उस बुज़ुर्ग महिला ने मुझे न सिर्फ़ देशप्रेम बल्कि किसी अपने के जज़्बे और सपने की कद्र करना भी सिखाया'.

-जयंत पाठक

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साल 2015 की बात है मार्च का महीना था. मैं अपने बुज़ुर्ग माता-पिता के साथ जैसलमेर घूमने गया हुआ था. इस दौरान हम बिना किसी गाइड के घूमते-घूमते रेगिस्तान में काफी दूर निकल गए. शाम का वक़्त था तभी वहां तेज़ आंधी चलने लगी. मैं अकेला था इसलिए बुज़ुर्ग माता-पिता को संभाल पाना मुश्किल हो रहा था. तभी मैंने देखा कि एक बंजारा महिला हमारी तरफ़ दौड़ती हुई आ रही हैं. कुछ समझ पाते इतने में उसने मेरी माताजी को अपनी पीठ पर उठाया और सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया. फिर पिताजी और मुझे भी वहां से सुरक्षित निकलने में मदद की. इस दौरान मेरी आंखों में आंसूं थे और मेरे पास जितने भी पैसे थे सारे उस पहिला के हाथों में रख दिए, लेकिन उसने पैसे लेने से मना कर दिया. इस दौरान उन्होंने एक बात कही जिसने मेरा नज़रिया ही बदल दिया- 'साहब किसी को ज़िंदगी देना पैसों से बढ़कर नहीं हो सकता'.

-अनुज सिंह

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6-

मैं CNBC न्यूज़ चैनल में इंटर्नशिप कर रही थी और मुझे अपने बॉस से प्रोग्राम को लेकर कुछ कहना था. लेकिन उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी. जब मैंने ये बात अपनी एक सीनियर (महिला) के साथ शेयर की तो उन्होंने कहा कि अगर तुम आज अपनी बात नहीं रख पाई, तो मीडिया फ़ील्ड में टिक नहीं पाओगी. इसके बाद सीनियर की इस बात से प्रेरित होकर मैं बॉस के सामने अपनी बात रख पाई. वो दिन था और आज का दिन हैं मैं मेरे अंदर किसी भी बात को लेकर झिझक बिलकुल भी नहीं है. 'मेरे अंदर हौसला भरने के लिए शुक्रिया मैम'.

-आकांक्षा तिवारी

Source: wikipedia

'महिला दिवस' के मौके पर इन सभी महिलाओं को हमारा सलाम.