मैं अपनी बॉस से ऑफ़िस में ऐसे ही बात कर रही थी. इस दौरान उन्होंने मुझे अपने बचपन के कुछ बताये कि किस तरह से उन्होंने बचपन में साइकिल से स्कूल जाने की बात घर वालों के सामने रखी और उनकी इस बात को सुना जाना, उनके लिए कितना ख़ास था. ये उनकी पहली ऐसी ख़ूबसूरत याद थी जब उन्हें लगा कि हां उनकी आवाज़ सुनी जा रही है. उस वक़्त उन्हें लगा कि उनके फ़ैसले भी महत्पपूर्ण हैं और वो अपने हिसाब से चीजों का चुनाव कर सकती हैं.

इस बात से मुझे ख़्याल आया कि क्यों न मैं अपने आस-पास ऐसी और महिलाओं से पूछूं कि उनके जीवन में वो ऐसा पल कौन सा था जब उन्हें महसूस हुआ कि मैंने ये कर लिया तो सब कर सकती हूं?

1. मैं काफ़ी छोटी थी... शायद 10वीं क्लास में. हमारी कार का टायर ख़राब हो गया था. पापा घर के किसी काम में व्यस्त थे. इस दौरान मैंने कार के टायर को बदलने का सोचा और चुप-चाप नीचे चली गई. पड़ोस में रह रहे एक बच्चे की मदद से मैंने ख़ुद ही टायर बदला डाला. मेरे पिता कार के पास आए तो मैं उनके चेहरे के भाव से जानती थी कि वो हैरान हैं. उस समय मुझे ख़ुद पर गर्व हो रहा था, जिस काम को मैं आजतक असंभव समझती आ रही थी वो काम मैंने अकेले ही कर दिखाया. उस वक़्त पहली बार मुझे लगा कि हां मैं भी बहुत कुछ कर सकती हूं, कोई भी काम मेरे लिए मुश्किल नहीं है.

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2. मैं 9वीं कक्षा में थी. इस दौरान घर पर पानी नहीं आ रहा था. पापा के घुटने में तकलीफ़ थी और मां का माइग्रेन बढ़ा हुआ था. उस दिन मैंने पड़ोस के घर के चापाकल से कई बाल्टियां पानी ढोईं. उस दिन पहली दफ़ा ऐसा लगा कि मैं कुछ भी कर सकती हूं. चाहे वो घर का काम हो या फिर बाहर का.

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3. बारहवीं की परिक्षाएं हो चुकी थीं. मम्मी-पापा घर पर नहीं थे, वो मेरे लिए ऐडमिशन के फ़ॉर्म लेने गए हुए थे. मैंने उस दिन अपनी बहन और अपने लिए सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना बनाया. हैहालांकि, रोटियां थोड़ी जल गईं थीं पर उस दिन पहली बार लगा कि अगर मुझमें अपना खाना पकाने की हिम्मत है तो कुछ भी किया जा सकता है.

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4. बचपन में मुझे पानी (नदी, नहर, ट्यूबवेल) में जाने से डर लगता था. इसीलिए गंगा के किनारे बसे कानपुर में पैदा होने के बावजूद मैंने कभी गंगा में डुबकी नहीं लगाई थी. मगर जब मैं 'दैनिक जागरण' में इंटर्नशिप कर रही थी, उस वक़्त रिपोर्टिंग के लिए मुझे एक बाढ़ ग्रस्त इलाके में जाने के लिए बोला गया. डर तो लग रहा था, लेकिन काम करना था इसलिए मना नहीं कर पायी. इस दौरान जब मैं वहां लोगों से बात करने के लिए नाव में बैठी तो अंदर ही अंदर बहुत डर लग रहा था. पानी इतना ज़्यादा था कि पेड़ की सबसे ऊपर की पत्ती को हाथ से छू सकते थे. ख़ैर, किसी तरह रिपोर्टिंग कर वापस लौटी. उस दिन बॉस भी मेरी रिपोर्टिंग से ख़ुश हुए. तब मुझे अहसास हुआ कि मैंने अपने डर को हरा दिया है.

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5. साल 2010 में जब मैं दिल्ली आई तो एक बार घर के सभी लोग कानपुर गए थे. वो मुझे पैसे देकर गए थे क्योंकि मुझे एटीएम चलाना नहीं आता था. मगर मेरे पैसे ख़त्म हो गए. फिर मैं डर-डर कर एटीएम गई और फ़ोन पर अपने जीजा जी की हेल्प से एटीएम से पैसे निकाल रही थी तभी फ़ोन कट गया. थोड़ा सा प्रोसेस बाकी रह गया था फिर मैंने उसे पढ़कर डरते हुए ख़ुद किया और पैसे निकाल लिए. उस दिन मुझे अहसास हुआ कि हां अब मैं बड़ी हो गई हूं और अपने छोटे-मोटे काम ख़ुद कर सकती हूं.

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6. मैं जब पहली बार साइकिल चलाई थी तो गली से निकलते समय ऐसा महसूस हो रहा था मानो प्लेन चला रही हूं. क्योंकि मेरी गली में बहुत कम लड़कियां थीं जो साइकिल से जाती थीं उनमें से एक मैं भी थी.

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7. मैंने अपने घर पर कभी कोई काम नहीं किया था. जब दिल्ली जैसे महानगर आने की बात हो रही थी तब मुझे बस इसी बात का डर था कि मैं कैसे अपने दम पर सब काम कर पाउंगी? सिलिंडर भरवाने से लेकर कपड़े धोने तक, ये सब मेरे लिए पहला अनुभव था. मगर मैंने सब किया और मुझे एहसास हुआ कि हां, मैं सब कर सकती हूं कोई भी काम मेरे लिए नामुमकिन नहीं है.