मध्य प्रदेश में एक 15 साल की लड़की का घर में घुस कर दो लड़कों द्वारा रेप किया जाता है और रेप के सबूत मिटाने के लिए मिट्टी का तेल छिड़क कर उसे ज़िन्दा जला दिया जाता है. वो एक हफ़्ते तक ज़िन्दगी के लिए लड़ती है और फिर अपने ज़ख्मों के आगे हार जाती है. उसकी सांसें उसका साथ छोड़ देती हैं और वो हमेशा के लिए बस एक ख़बर बन कर दुनिया से चली जाती है.

15 साल की लड़की की आंखों में कितने सपने होते हैं, क्या पता वो क्या बनना चाहती थी, क्या पता वो ज़िन्दगी में क्या कर दिखाती. संभावनाएं तो अनगिनत थीं, लेकिन उसकी नियति बनी महज़ एक ख़बर बन कर रह जाना. मिट्टी का तेल डाल कर उसे ही नहीं, उसके सपनों को और हजारों लड़कियों के हौंसलों को आग के हवाले कर दिया गया.

कई लोग इस ख़बर को खोल कर पढ़े बिना ही आगे बढ़ गए होंगे, 'विराट-अनुष्का की शादी में क्या बना था' जैसी चटपटी ख़बर पढ़ने के लिए या फिर ये पढ़ रहे होंगे कि भारत कैसे विश्व में एक महाशक्ति बन कर उभर रहा है.

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ये तो रही भारत की बात, दुनिया में ऐसे कई अन्य देश हैं जहां महिलाओं की ज़िन्दगी की कोई कीमत नहीं है. यूरोप के एक शरणार्थी शिविर में महिलाएं एडल्ट डायपर पहन के सो रही हैं. वो एडल्ट डायपर पहन कर रह रही हैं, ताकि उन्हें रात में शौच के लिए बाहर न जाना पड़े और वो यौन उत्पीड़न से बच सकें. इन हालातों में रहने की कल्पना करना भी किसी के शरीर में सिहरन पैदा कर सकता है.

सोचिये उस जगह हालात कितने भयानक होंगे जहां एक औरत उठ कर टॉयलेट तक नहीं जा सकती. उसके पास ये ही चारा बचता है कि वो अपने ही पेशाब में पड़े-पड़े रात बिताये. उनके पास दो विकल्प होते हैं, यौन उत्पीड़न और संक्रमण. वो संक्रमण का ख़तरा उठा कर अपनी आबरू बचाना चुनती हैं.

किसी लड़की को ज़िन्दा जला देने की, रेप कर देने की घटनाओं के आंकड़े इतने बड़े हैं कि आज एक आम पाठक इनसे ऊब चुका है. क्या आपको याद है ऐसा कोई दिन जब आपने अख़बार में एक भी रेप की ख़बर न देखी हो? मैं रोज़ अख़बार पढ़ती हूं फिर भी ऐसा कोई दिन याद नहीं आता. क्या इसके बावजूद ये मुमकिन है कि हम एक देश के तौर पर, एक समाज के तौर पर सफल बन जायें? पर हम तो फिर भी मस्त हैं चमकते भारत की झूठी कल्पना में.

हम कितनी भी तरक्की क्यों न कर लें, तकनीक के मामले में कितने ही आगे क्यों न बढ़ जायें, पर हम हार रहे हैं. ये घटनाएं सबूत हैं कि हम हर दिन एक इंसान के तौर पर हार रहे हैं, लगातार. जब-जब किसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न या हिंसा होती है, हमें खुद पर शर्म आनी चाहिए, क्योंकि ये समाज जहां महिलाएं इतनी असुरक्षित हैं, हमसे ही तो बना है.

समस्या ये है कि हम संवेदनशील तो हैं, लेकिन केवल अपनों के लिए. कितने मर्द होंगे जो अपनी मां, बहन, बेटी या पत्नी के साथ ऐसा कुछ होने पर दुनिया में आग लगा देने का दम भरते हैं. ये ख्याल भी उन्हें आक्रोश से भर देता होगा, लेकिन विडंबना ये है कि ये आक्रोश हमें केवल अपनों के साथ बुरा होने पर भी आता है.

आप सोचते होंगे कि आप तो कुछ ग़लत नहीं कर रहे, इस तरह की घटनाओं की निंदा भी करते होंगे, लेकिन क्या बस इतना काफ़ी है? आज किसी और लड़की के साथ बुरा होने की ख़बर पढ़ कर चुप रह जाने का मतलब है कि आप उसी दिन कुछ करेंगे जब पीड़िता आपकी कोई अपनी होगी.

हम हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों के लिए मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं, राम मंदिर/मस्जिद बनवाने के लिए दुनियाभर के मेसेज लोगों को फॉरवर्ड करते हैं, आपा खो देते हैं अगर कोई आपके धर्म के बारे में कुछ ग़लत बोल जाये. लेकिन ये गुस्सा हमें तब नहीं आता, जब किसी लड़की पर घटिया फ़ब्ती कसी जाती है, न ही हम लोगों को जागरुक करने के लिए इन मुद्दों से जुड़ा एक भी संदेश शेयर करते हैं.

मंदिर या मस्जिद बनवा लेंगे और महिलाएं यूं ही हिंसा का शिकार बनती रहेंगी, तब क्या आप गर्व कर पाएंगे खुद पर? ज़िन्दगी का एक मिनट निकाल कर सोचिये कि समय की मांग क्या है? और अगर अब भी लगे कि आपको कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, तो मान लीजियेगा कि आपके अंदर का इंसान भी मर चुका है.