कहते हैं बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, जिस भी सांचे में ढालो, वैसा ही आकार ले लेते हैं. बच्चों को सही सूरत देने की ज़िम्मेदारी माता-पिता, शिक्षक और परिवार के अन्य लोगों की होती है.

इस काम को वो बख़ूबी अंजाम देते हैं. लेकिन जाने-अनजाने वो बच्चों को कुछ चीज़ें ऐसी भी सिखा देते हैं, जो उन्हें अपनी समझ से ठीक लगता है लेकिन बच्चों के लिहाज़ से ठीक नहीं होता. ऐसी बातें उनके दिमाग़ की गहराई में उतर जाती हैं, जो आगे चल कर शायद उनके स्वभाव में भी दिखने लगे. देखा जाए तो इसमें सिखाने वाले की भी ग़लती नहीं होती. लोग वही सिखाते हैं, जो उन्होंने अपने माता-पिता या ज़िंदगी के अनुभवों से सीखा है. लेकिन जो उन्होंने सीखा, ज़रूरी नहीं कि वो उनके बच्चों की ज़िंदगी के लिए भी सही साबित होगा.

ये बातें हमें बचपन में सिखाई गई थी, लेकिन आर इनका मतलब बदल गया है:

बड़ों से बहस मत करो

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बड़ों की इज़्ज़त करना और उनसे बहस न करना, दो अलग बात है. बच्चे को बहस करने से रोकने से उसके ऊपर नकारातम्क प्रभाव पड़ता है. वो अपनी बात खुल कर नहीं रख पाता. उसे ऐसा लगने लगता है जैसे उसकी बातों की कोई अहमियत नहीं है, जिससे ये भी हो सकता है कि वो घर वालों से कटा-कटा रहने लगे. बच्चों के ऊपर अपनी बातों को थोपने से बेहतर है उसे समझाया जाए. बेश्क एक बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से बहुत बड़े फ़ैसले न ले पाए, बचकानी बातें करे, फिर भी उसको बोलने से रोकना उसके मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं होगा.

हमेशा अपने काम से काम रखना चाहिए

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अगर माता-पिता अपने बच्चों को ये सिखाते हैं कि कभी दूसरों के मामले में टांग नहीं घुसानी चाहिए, तो इससे वो अपने बच्चे को स्वार्थी बनना सिखा रहे हैं. वो बच्चा बड़ा हो कर कभी दूसरों की मदद के लिए अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाएगा. ज़रूरतमंदों के लिए खड़ा होने के बारे में नहीं सोचेगा. यहां तक कि जो चीज़ उसे सही लगती है, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से उससे नहीं जुड़ी है, उसके लिए आवाज़ नहीं उठाएगा. कुल मिला कर वो एक गै़र ज़िम्मेदार नागरिक और मतलबी इंसान बनेगा.

खेल-कूद कम करो

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सभी माता-पिता अपने बच्चे के भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं. उन्हें लगता है कि बच्चों का भविष्य तभी अच्छा हो सकता है, जब वह पढ़ने में अच्छा हो. उनके लिए खेल-कूद वक़्त की बर्बादी है. पढ़ना बच्चों के लिए ज़रूरी है, इससे कोई इंकार नहीं करता. लेकिन पढ़ाई के बोझ तले उसकी अन्य प्रतिभाओं को दबा कर मार देना, सही नहीं हो सकता. अपने बच्चे के भीतर अन्य प्रतिभाओं को संवरने का मौका दीजिए. किसी महान इंसान ने कहा था कि एक मछली की प्रतिभा उसके पेड़ पर चढ़ने की क्षमता से नहीं आंकी जा सकती. मछली को बंदर बनाने की कोशिश में उसकी असल प्रतिभा की मौत हो जाएगी.

कम दोस्त बनाओ

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इंसान एक सामाजिक प्राणी है, वो समाज के बीच में समाज के साथ रहना चाहता है. बच्चों के लिए दोस्तों का ग्रुप ही उसका समाज होता है. मां-बाप का मानना होता है कि ज़्यादा दोस्त होने से बच्चे बिगड़ जाएंगे, उनका ध्यान पढ़ाई में कम लगेगा. अगर बच्चे को उसके हमउम्र बच्चों से काट दिया जाए, तो उसके मानसिक विकास पर असर पड़ेगा. बहुत सी ऐसी बातें हैं जो सिर्फ़ हम अपने दोस्तों से ही कर सकते हैं. मां-बाप अपने बच्चों के अच्छे दोस्त हो सकते हैं लेकिन वो उसके दोस्तों की जगह नहीं ले सकते. सही व्यक्तित्व के विकास के लिए भी बच्चों के दोस्त होने ज़रूरी हैं.

फ़ोन और टीवी से दूर रखना

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बहुत छोटे बच्चे को मन बहलाने के लिए फ़ोन देना भी ग़लत है और बड़े बच्चों को फ़ोन से बिल्कुल दूर रखना भी ग़लत है. अपने बच्चों को तकनीक से घुलने-मिलने न देना समझदारी नहीं कही जाएगी. तकनीक की लत बुरी चीज़ है, उस पर निर्भरता भी बच्चे की प्रतिभा को छंद कर देगी. लेकिन बच्चों को टीवी-फ़ोन से दूर रखना, आज के समय में अव्यवहारिक बात है. उनके ऊपर नज़र रखी जाने चाहिए. उन्हें बड़ों के दिशा-निर्देश की ज़रूरत है.

लिंगभेदी बातें सिखाना

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शुरू से बच्चों के दिमाग़ में लिंगभेदी बातें डालनी शुरू कर दी जाती हैं. लड़कियों को कैसे बैठना चाहिए, लड़कों को कैसे चलना चाहिए, लड़के रोते नहीं हैं, लड़कियां लड़कों वाले गेम नहीं खेलतीं इत्यादी. ये छोटी-छोटी बातें बच्चे को भीतर से Sexist बनाती है. ये लड़कों के लिए भी उतना ही ख़तरनाक हैं, जितना लड़कियों के लिए. इन बातों से बच्चों के मन के भीतर श्रेष्टता का भाव या आत्मविश्वास की कमी हो सकती है. ये आपके बच्चे के लिए ख़तरनाक तो है ही, समाज के लिए भी ख़तरनाक है.

सिर्फ़ बच्चों को सीखने की ज़रूरत नहीं है, माता-पिता की महानता को कटघरे में खड़े किए बिना भी हम सीखने की सलाह दे सकते हैं.