कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां दिखने में कितनी अच्छी लगती है न. कोई सुहाग के लिए खरीदता है, तो कोई शौक के लिए. लेकिन इन कांच की चूड़ियों में एक रंग भरा होता है, वो भी बचपन का. न जाने उन चूड़ियों की खनक में किस मासूम की आवाज़ दबी रहती है. दरअसल, वो आवाज़ ऐसी होती है, जो सड़कों पर सुनाई देती है, जब कोई कहता है ‘चूड़ी ले लो.. चूड़ी.’

ठीक उसी तरह साड़ी, हीरे, गुल, बीड़ी जैसे उद्योगों में जाने कितने ही मासूमों का बचपन छिन जाता है. उनकी आंखें ख़राब हो जाती हैं और हमें लगता है कि दुनिया में सब कुछ अच्छा चल रहा है. आज हम ऐसे ही उद्योगों के बारे में चर्चा करेंगे, जो बाहरी दुनिया में अच्छे तो दिखते हैं, मगर हक़ीकत कुछ और है.

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महीन ज़री से अंधे होते हैं लोग

यूं तो हमें, विशेषकर महिलाओं को ज़री की चीज़ें काफ़ी पसंद आती हैं. साड़ी, सलवार और दुपट्टे में ज़री का काम देखकर हम काफ़ी ख़ुश हो जाते हैं. मगर, ज़रा ग़ौर कीजिएगा कि इन सब कामों में कारीगरों को कितनी मुश्किलातों का सामना करना पड़ता है. महीन सुई और धागों के बीच इनकी ज़िंदगी की डोर जुड़ी रहती है.

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चूड़ियों के कारीगरों की ज़िंदगी अंधकारमय रहती है

लाल-पीली-हरी और नीली चूड़ियां बनाने वाले कारीगरों की ज़िंदगी फैक्ट्री की गर्म हवाओं और कम रौशनी के बीच बंधी रहती है. उन्हें न सुबह का पता होता है और न ही शाम का. उनके लिए तो बस पीली बल्ब की रौशनी ही ज़िंदगी है.

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हीरे तब चमकते हैं, जब किसी की आंखों की रौशनी चली जाती है

हीरे का गुणधर्म ये है कि वो कठोर और चमकीला होता है. खदान से निकालते समय वो बिल्कुल बदसूरत होता है, लेकिन कारीगरों की मेहनत से वो नायाब और महंगा हो जाता है. उसे सुंदर बनाने के क्रम में कारीगर अपनी आंखें खो देते हैं. मगर, हमें क्या फ़र्क पड़ता है.

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ज़िंदगी कहती है कि आगे बढ़ना है, मेहनत करना है और पेट भरना है. मुसीबत तो इंसान की पहचान होती है. अब देखिए न! जो चीज़ सबसे ख़ूबसूरत होती है, उससे कई लोगों की ज़िंदगी प्रभावित होती है. हम कभी इस विषय में नहीं सोचते हैं, मगर इस बार सोचिएगा ज़रुर!