वो दौर भी क्या दौर था जब किसी की चिठ्ठी आने पर हम बड़े एक्साइटेड हो जाया करते थे. जल्दी-जल्दी चिठ्ठी खोलकर पढ़ने लगते थे. पढ़ने के बाद दिल को बड़ा सुकून मिलता था. वो दौर सचमुच में बेहद शानदार था, जब लोग एक-दूसरे को याद करने के लिए भी चिठ्ठी-पत्रों का आदान-प्रदान किया करते थे. फिर समय बदला चिठ्ठी-पत्रों की जगह लैंडलाइन फ़ोन ने ले ली. अब दौर स्मार्टफ़ोन्स और सोशल मीडिया का है. आज हम इतने हाईटेक हो चुके हैं कि किसी को याद भी करना हो तो एक छोटा सा मेसेज भेज देते हैं और बात ख़त्म.

आज के दौर में भी कई लोग ऐसे हैं जो अब भी किसी को याद करने के लिए चिठ्ठी-पत्रों का ही सहारा लेते हैं. महाराष्ट्र के कोल्हापुर ज़िले के कबनूर क़स्बे में रहने वाले 66 वर्षीय अन्नप्पा चौगुले भी ऐसे ही शख़्स हैं, जो किसी को याद करने के लिए अब भी चिठ्ठी-पत्रों का ही सहारा लेते हैं. अन्नप्पा कबनूर स्थित एक चीनी मिल की नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद वर्तमान में इछलकरंजी क़स्बे की एक बिजली कंपनी में वॉचमैन का काम कर रहे हैं. इसके लिए उनको 5000 रुपये मिलते हैं. सिर्फ़ 9वीं कक्षा तक पढ़े अन्नप्पा को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक है. इसीलिए वो पिछले सात सालों से लोगों को ख़ुश करने का काम कर रहे हैं.

दरअसल, अन्नप्पा कोल्हापुर और सांगली ज़िले के उन तमाम लोगों को मराठी भाषा में चिठ्ठी भेजकर शुभकामनाएं देते हैं जिन्होंने खेल, कला, शिक्षा, संगीत और सामाजिक कार्यों में उल्लेखनीय काम किया है. वो अब तक कुल 900 लोगों को पोस्टकार्ड के ज़रिये शुभकामनाएं दे चुके हैं और मरते दम तक यही काम करने की इच्छा रखते हैं. लोगों को शुभकामना सन्देश भेजने के लिए उनके पास करीब 40 प्रकार की छोटी-छोटी डायरी भी हैं. इन डायरियों को ढूंढने में उनको करीब 30 मिनट्स का वक़्त लगता है. वो एक दिन में कम से कम 3 पोस्टकार्ड लिखते हैं. उनकी फ़ाइल का नाम होता 'पत्र व्यवहार' है, जिसमें अवॉर्ड्स, जन्मदिन और शादी की सालगिरह के लिए अलग-अलग पेज बने होते हैं.

अन्नप्पा चौगुले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव में जीत को लेकर बधाई संदेश भी भेज चुके हैं साथ ही पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी को अच्छे काम के लिए और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी उनके जन्मदिन पर पोस्टकार्ड भेज चुके हैं. अन्नप्पा इसके अलावा अपने क्षेत्र के संसद और विधायकों को भी जीत पर पोस्टकार्ड के ज़रिये शुभकामनायें भेजते रहते हैं.

स्क्रॉल इन से बात करते हुए अन्नप्पा चौगुले का कहना है कि 'मेरे दिन की शुरुआत मराठी न्यूज़ पेपर्स में छपी उपलब्धि और साहस वाली कहानियां ढूंढने से होती है. ऐसे लोगों के बारे में जानने के लिए मैं कोल्हापुर के तीन न्यूज़ पेपर्स से भी जुड़ा हुआ हूं, ताकि समय-समय पर मुझे ऐसे लोगों के बारे में पता चल सके. इसके बाद में उनकी जानकारियां नोट कर लेता हूं. मैं जिस शुगर फ़ैक्ट्री में काम करता था उसके मालिक अपने सभी कर्मचारियों को पोस्टकार्ड के ज़रिये उनके जन्मदिन की बधाई दिया करते थे. उन्हीं से प्रेरणा लेते हुए मैंने साल 2011 में ऐसे लोगों को पोस्टकार्ड भेजने के बारे में सोचा. मैंने अपना पहला पोस्टकार्ड साल 2011 में कोल्हापुर के शिरधोन गांव के एक स्कूल टीचर विजय पाटिल को भेजा था. अब तो कई लोग मुझे अपनी शादियों में भी बुलाने लगे हैं. इस दौरान मैं उनकी शादी की डेट वहीं नोट कर लेता हूं.'

अन्नप्पा चौगुले की सबसे अनोखी बात ये है कि वो जितने भी लोगों को पोस्टकार्ड भेजते हैं वो सभी पेन से नहीं, बल्कि रिफ़िल से लिखकर भेजते हैं. जो उनकी डायरी के किसी पन्ने के बीच में रखी होती है. वो लोगों को सिर्फ़ नॉर्मल सन्देश ही नहीं, बल्कि जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर भी बधाई देते हैं. जिन लोगों के घर 5 से 6 किमी तक के एरिया में होते हैं उनके घर वो ख़ुद पोस्टकार्ड देने जाते हैं.

अन्नप्पा चौगुले कहते हैं 'हाल ही मैंने वेटलिफ्टिंग में नेशनल रिकॉर्ड बनाने वाली इछलकरंजी कस्बे की तृप्ति माने के बारे में पढ़ा. इसके बाद मैंने तुरंत साइकिल पकड़ी तृप्ति के गांव पहुंचकर उन्हें बधाई दी. जबकि पिछले साल मैंने सजानी गांव के एक मज़दूर की दो जुड़वा बेटियों जिन्होंने दसवीं बोर्ड में 98 प्रतिशत अंक हासिल किये थे. उनकी इस कामयाबी के लिए भी मैं साइकिल चलाकर उन्हें बधाई देने गया था.'

अन्नप्पा की पत्नी सोनाबाई चौगुले का कहना है कि, इस उम्र में ये काम करना ठीक नहीं है. हम कितनी बार मना कर चुके हैं लेकिन वो मानते ही नहीं हैं. इसलिए हमने उनसे इस बारे में बोलना ही बंद कर दिया है.

अन्नप्पा पोस्टकार्ड ख़रीदने के लिए किसी से कोई मदद नहीं लेते हैं. वो अब तक अपनी सेविंग में से कुल 8000 रुपये ख़र्च कर चुके हैं. वो सिर्फ़ महाराष्ट्र के लोगों को ही नहीं, बल्कि कर्नाटक के कुछ ज़िले के लोगों को भी बधाई सन्देश भेजते हैं.

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