द्वितीय विश्व युद्ध को जर्मनी के सबसे बड़े क्रांतिकारी नेता एडोल्फ़ हिटलर के लिए भी जाना जाता है. जर्मनी का एक ऐसा तानाशाह जो अपने सनकी मिज़ाज़ के कारण दुनिया भर में बदनाम था. द्वितीय विश्व के दौरान एक ओर सोबियत पूरी दुनिया पर राज करना चाहता था, तो दूसरी ओर हिटलर भी इसमें पीछे नहीं था. नाज़ी पार्टी के प्रमुख हिटलर के पास एक विशाल नाज़ी सेना भी थी. पूरी दुनिया नाज़ियों के अत्यचार से वाक़िफ़ थी. उस समय लोगों में नाज़ियों का बेहद ख़ौफ़ हुआ करता था. गैस चैंबर में यहूदियों का कत्लेआम करना हो या फिर चोरी छिपे सोबियत पर हमला करना. हिटलर आज भी लोगों के बीच अपने इसी काम की वजह से जाना जाता है.

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने अपनी नाजी सेना के बल पर अपने आस-पास के कई देशों पर कब्ज़ा किया था. इस दौरान उसकी सेना लोगों पर अत्याचार किया करती थी. हिटलर की नाज़ी सेना में एक से बढ़कर एक लड़ाके हुआ करते थे. जो हिटलर के कहने पर उसके लिए अपनी जान तक कुर्बान करने को तैयार रहते थे. इन्हीं में से एक जांबाज़ पायलट हुआ करता था Hans-Ulrich Rudel. नाज़ी सेना का एक ऐसा पायलट जिसे लोग 'ईगल ऑफ़ द ईस्टर्न फ़्रंट' के नाम से भी जानते थे.

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान Rudel ने जान की परवाह किये बिना ही पूरी दुनिया में अपनी बहादुरी का परचम लहराया था. इस अदम्य साहस के लिए उसको कई पदकों से भी सम्मानित किया गया. कहा तो ये भी जाता है कि जब भी हिटलर किसी मुसीबत में होता था, तो Rudel ही उसे इस मुसीबत से बाहर निकालने का काम करता था. वो न सिर्फ़ एक पायलट बल्कि बेहद बुद्दिमान और चालाक भी था. इसीलिए हिटलर उसे बेहद पसंद किया करता था.

आख़िर कौन था ये Hans-Ulrich Rudel?

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Hans-Ulrich Rudel का जन्म German Silesia के Konradswaldau में हुआ था. उनके पिता किसी राजनितिक पार्टी से जुड़े थे. Rudel को बचपन से ही ख़तरों से खेलने का शौक़ था, इसी लिए वो पायलट बनना चाहते थे. लेकिन मैट्रिक करने के बाद Rudel के पिता उनको पायलट की महंगी शिक्षा दिलाने में सक्षम नहीं थे. कुछ समय बाद Rudel ने Luftwaffe के बारे में सुना. इसके बाद उसने निश्चय कर लिया कि वो पायलट बनकर ही रहेगा. दरअसल, Luftwaffe द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त जर्मन सेना की एक हवाई युद्ध शाखा थी. जो कि हिटलर की नाज़ी फ़ौज़ का अभिन्न अंग हुआ करता था.

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कुछ साल की कड़ी मेहनत के बाद Rudel ने Luftwaffe में शामिल होने के लिए होने वाली कठिन प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की. इसके बाद दिसंबर 1936 में उसने इंफ़ेंट्री ट्रेनिंग शुरू की. इस दौरान दुनिया के महान पायलट बनने के लिए उन्हें कई बार निराशा भी हाथ लगी.

Rudel को किसी भी चीज़ को समझने में थोड़ा वक़्त लगता था. इस बीच उसने बॉम्बर स्कूल में वालंटियर का काम भी किया. Rudel न तो शराब न ही सिगरेट पीने का शौकीन था. इस वजह से उसकी किसी भी कैडेट के साथ नहीं पटती थी. इसलिए वो अपना अधिकतर समय खेलने में लगा देता था. इस बीच 1940 तक Rudel ने कई तरह की ट्रेनिंग की. बस यहीं से Rudel दुनिया का बेस्ट बॉम्बर बनकर दुनिया के सामने आया.

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द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के दौरान उसने पोलैंड पर आक्रमण के लिए पहली बार उड़ान भरी. इस बीच मई, 1940 में Rudel को JU-87 स्टुका डाइव बमवर्षक विमान टीम में शामिल किया गया. तब तक Rudel अपने हर काम में निपुण हो चुका था.

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1941 को Rudel ने पहली बार अपनी असाधारण प्रतिभा का प्रदर्शन किया. उन्होंने Kronstadt बंदरगाह पर खड़े सोवियत युद्धपोत 'मारत' को ख़ाक में मिला दिया. इसके बाद इन्होंने क्रोनस्टेड बंदरगाह के चारों और भयानक बमबारी कर कई नौकाओं, जहाजों और क्रूजर को समुद्र में डुबो दिया. उनके इस कारनामे के बाद 18 जुलाई, 1941 को इन्हें युद्ध में आयरन क्रॉस प्रथम श्रेणी से सम्मानित किया गया.

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इन्होंने अकेले पूर्वी मोर्चे पर 2,530 सवारी उड़ान भरीं और 519 सोवियत टैंकों को नष्ट किया. युद्ध के अंत तक Rudel ने 2,530 मिशन पर काम किया. दुश्मन के खिलाफ़ उड़ान भरने के अपने पहले 90 दिनों के भीतर ही, इन्होंने अपनी 500वीं उड़ान पूरी कर ली थी.

साहसी नेतृत्व के चलते बने कर्नल

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Rudel की बहादुरी को देखते हुए हिटलर ने जनवरी 1945 को Hans-Ulrich Rudel को कर्नल के पद पर पदोन्नत किया. इस दौरान बर्लिन में बंकर के अंदर बने एक मुख्यालय में हिटलर ने रुडेल से कहा कि 'तुम जर्मन सेना के अब तक के सबसे महान और साहसी सैनिक हो.'

Rudel के जहाज को जब सोवियत संघ ने मार गिराया

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नाज़ी वायु सेना के प्रमुख Rudel के ज़हाज़ पर दुश्मनों ने करीब 30 से अधिक बार एंटी-एयरक्राफ़्ट गन से निशाना साधा. लेकिन वो अपनी बहादुरी और चालाकी की वजह से दुश्मन के हर वार से बच निकले. आख़िरकार 9 फ़रवरी, 1945 को सोवियत संघ ने उनके जहाज को मार गिराया जिसमें भी Rudel बच निकले. लेकिन इस दौरान वो बुरी तरह घायल हो गए, उनकी एक टांग काट दी गई. लेकिन अपने ज़ज्बे के कारण वो 6 हफ़्ते के बाद एक बार फिर सेना में लौट आए.

रिटायर के बाद बने सफ़ल व्यापारी

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इसके कुछ साल बाद वो सेना से रिटायर हो गए और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये अर्जेंटीना चले गए, जहां इन्होंने कई साल स्टेट एयरप्लेन वर्क्स में काम किया. इस दौरान उन्होंने कई क़िताबें भी लिखीं, जिसके ज़रिये उन्होंने अपने ख़ास दोस्त हिटलर का समर्थन किया. साथ ही अपने राजनीतिक इरादे भी जाहिर कर दिए थे. साल 1953 में Rudel जर्मनी लौट आए और 'जर्मन रीच पार्टी' में शामिल हो गए. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति के बाद Rudel जर्मनी में व्यवसाय करने लगे. जबकि 18 दिसंबर, 1982 को नाज़ी सेना के इस महान लड़ाके की मौत हो गई.

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