एक भारतीय सिपाही, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन को बग़ावत का पहला झटका दिया के बलिदान ने ही पूरे देश में आज़ादी की लड़ाई का बिगुल बजाया था. ये वीर सिपाही कोई और नहीं, बल्कि पहले क्रांतिकारी मंगल पांडेय थे, उसकी बुलंद आवाज़ ही थी, जो धीरे-धीरे पूरे देश में आग की तरह फैल गई और आगाज़ हुआ 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का. इस महान क्रांतिकारी की आज जयंती है.

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उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव नगवां में जन्मा मंगल पांडेय, ऐसा शूरवीर जिसने अंग्रेजी हुकूमत के बेजा फ़रमानों के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की, अपनी जान दे दी लेकिन उनके सामने झुके नहीं. इतिहास के पन्नों में मंगल पांडेय का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है. मंगल पांडेय द्वारा ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ शुरू की गई लड़ाई का अंत 15 अगस्त, 1947 को देश को मिली आज़ादी के रूप में हुआ.

आइये अब सिलसिलेवार जानते हैं कि कब और कैसे शुरू हुई थी आज़ादी के लिए लड़ाई?

1. इस महान योद्धा का जन्म 19 जुलाई, 1827 में हुआ था और अप्रैल 8, 1857 को इनको फ़ांसी दी गई थी. इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और मां का नाम श्रीमती अभय रानी था.

2. 18 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार सिपाहियों की एक टुकड़ी को पैदल मार्च करते हुए देखा, जिसने उन्हें सेना में जाने का उत्साह भरा.

2. 1849 में मात्र 22 साल की उम्र में परिवार का पालन-पोषण और रोजी-रोटी के लिए उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज में एक सिपाही की नौकरी शुरू की.

4. मंगल पांडेय बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इंफ़ेंट्री की पैदल सेना में सिपाही थे. उस दौर में ब्रिटिश सेना में अधिकतर मुस्लिम और हिन्दू सिपाही ही थे.

5. अगस्त 1856 में, ग्रीज़्ड कारतूस बनाने का काम शुरू हुआ. इन कारतूसों का प्रोडक्शन ब्रिटिश कारतूस की डिज़ाइन के आधार पर हुआ.

6. पहली बार कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ. इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था.

7. जनवरी 1857 तक में भारतीय सैनिकों के बीच ये ख़बर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल किया जाता है.

8. इस ख़बर की आग तब और भड़क गई जब कारतूस खोलने के बाद एक छोटी जाति के सिपाही पर ऊंची जाति के सिपाही ने धर्म भ्रष्ट होने की टिप्पणी की और कहा कि इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी लगाई जाती है.

9. इसके साथ ही एक अफ़वाह और फैल रही थी उस टाइम में कि ब्रिटिश हुक़ूमत भारतीय लोगों के धर्म को ख़त्म करने की योजना बना रहे हैं.

10. जनवरी में ही ब्रिटिश सेना के मिल्ट्री सेक्रेट्री ने ये आदेश दिया कि सभी कारतूसों पर से ग्रीज़ हटा दी जाए और सभी सिपाही अपने कारतूसों को जैसे भी चाहें खुद ही ग्रीज़ करें.

11. 26 फरवरी, 1857 में 19वीं बंगाल नेटिव इंफ़ेंट्री (BNI) रेजिमेंट इस बात से चिंतित हो गई, कि जो नए कारतूस उनको दिए जा रहे हैं, वो जिस पेपर में लपेटे जाते हैं, उस पर गाय और सूअर की चर्बी लगाई जाती है. उसको भी मुंह से खोलना पड़ता था, इस प्रकार उनकी धार्मिक संवेदनशीलताओं को प्रभावित किया जा रहा था.

12. मंगल पांडेय ने सिपाहियों के उस समूह का गठन किया और उसका नेतृत्व किया जिसने इन कारतूसों का इस्तेमाल करने से इंकार किया था.

13. 29 मार्च, 1857 को 29 वर्षीय मंगल पांडेय, ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दिए गए इन कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया और उन्होंने घोषित किया कि वो कलकत्ता के बराकपुर परेड मैदान में अपने कमांडरों के ख़िलाफ़ विद्रोह करेंगे.

14. उन्होंने अपने विद्रोह की शुरुआत ब्रिटिश सर्जेंट Lieutenant Baugh पर हमला करके की. जिसके बाद उनके हथियार छीन लिये जाने और वर्दी उतार लेने का हुक्म हुआ.

15. 29 मार्च, 1857 को ही उनकी राइफल छीनने के लिये आगे बढ़े अंग्रेज अफ़सर पर हमला कर दिया. इस प्रकार गाय और सूअर की चर्बी चढ़े हुए संदिग्ध कारतूस का प्रयोग ईस्ट इंडिया कंपनी शासन के लिए घातक सिद्ध हुआ.

16. Lieutenant Baugh पर हमला करने के बाद मंगल पांडेय ने ख़ुद को भी गोली मारने की कोशिश की. लेकिन अंग्रेजी हुक़ूमत ने उनको बंदी बना लिया.

17. मंगल पांडेय पर कोर्ट मार्शल का मुक़दमा चलाकर 6 अप्रैल, 1857 को ब्रिटिश हुक़ूमत ने उनको फ़ांसी की सज़ा सुनाई. फ़ांसी के लिए 18 अप्रैल, 1857 का दिन मुक़र्रर किया गया, लेकिन सिपाहियों में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ बढ़ते आक्रोश को देखते हुए 10 दिन पहले ही यानि कि 8 अप्रैल को ही उनको फ़ांसी दे दी गई.

मगर अपनी जान कुर्बान करने वाली इस वीर सिपाही की कुर्बानी खाली नहीं गई, उसकी फ़ांसी के साथ ही ब्रिटिश हुक़ूमत के सिपाहियों में विद्रोह भड़क उठा और विद्रोह की आग ने 1857 की क्रान्ति को जन्म दिया.

हिंदुस्तान के इस वीर क्रांतिकारी के कारण ही आज हम आज़ाद हैं. मंगल पांडेय को ScoopWhoop हिंदी की ओर से शत-शत नमन!