लखटकिया का नाम तो सुना ही होगा. फिर भी बता देते हैं, ये निक नेम है टाटा की महत्वकांक्षी कार नैनो का. इसे रतन टाटा ने बड़ी हसरतों से देश के मध्यवर्गीय तबके को ध्यान में रखकर बनाया था, पर अब इसकी फ़ैक्ट्री पर ताला लगने की नौबत आ गई है.

कारण है इसकी सेल्स में आई गिरावट. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जून में नैनो की एक ही कार का प्रोडक्शन हुआ और 3 कार बेची गईं. जबकि पिछले साल इसी महीने में इसकी 275 इकाई बनी थीं.

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अब जब कोई ख़रीदेगा ही नहीं, तब इसके उत्पादन का क्या फ़ायदा? सवाल ये उठता है कि आख़िर 10 साल में ही मिडिल क्लास की कार के नाम पर आई नैनो का ये हश्र क्यों हुआ?

बात सीधी सी है, मिडिल क्लास भले कार से चलने के सपने देखती हो, लेकिन वो हर चीज़ को सस्ते और टिकाऊ के नज़रिये से देखते हैं. उन्हें कार तो चाहिए थी, मगर ऐसी नहीं उनकी मौत का वाहन बन जाए, क्योंकि कीमत कम करने के चक्कर में इस कार के सेफ़्टी फ़ीचर्स से समझौता किया गया.

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ये कार भारत में क्रैशिंग टेस्ट पास कर गई, लेकिन विदेशों में इसी टेस्ट में हो गई फ़ेल. ये भी नैनो पर सवालिया निशान उठाता है. कमाल की बात ये है कि जब नैनो को तकरीबन 10 वर्ष पहले लॉन्च किया गया था, तब काफ़ी हो हल्ला मचा था.

आ गई गरीब लोगों की कार, अब देश के हर नागरिक का कार वाला सपना पूरा हो जाएगा. नेताओं ने भी इसके साथ ख़ूब तस्वीरें खिंचवाई और अपना पीआर किया. गुजरात और पश्चिम बंगाल में भी काफ़ी खींचतान हुई इसके कारखाने को लेकर.

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मगर अब इसका सफ़र ख़त्म होने को है.चलिए जाते-जाते एक नज़र नैनो के अब तक के सफ़रनामे पर भी डाल लेते हैं:

-2008 में ऑटो एक्सपो में हुई लॉन्च.

-2009 में रोड़ पर आई, कीमत थी 1 लाख रुपये. प्री-बुकिंग के ऑडर आए 2 लाख.

- अक्टूबर 2009 में ही नैनो के धू-घू कर जलने के वीडियो आना शुरू हो गए.

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-सेल गिरी पर टाटा के हौसले नहीं. सेल बढ़ाने के लिए टू-व्हीलर से एक्सचेंज करने का ऑफ़र आया 2010 में.

-2011 में नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश पहुंची नैनो.

-2012 में आया नैनो का मॉडिफ़ाइड मॉडल नैनो-LX. इस साल सबसे ज़्यादा नैनो कार बिकीं, तकरीबन 74,520 यूनिट्स.

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-2015 में आई नैनो-जेनएक्स भी कुछ ख़ास कमाल न दिखा सकी. अब तक नैनो की कीमत पहुंच हो गई 2-3 लाख रुपये.

-जून में 2018 सिर्फ़ एक ही कार बनी.

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, अभी तक नैनो को बंद करने का कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. मगर जिस तेज़ी से इसकी सेल्स में गिरावट आई हैं, उसे देखते हुए यही समझ में आता है कि इसे बंद करना ही टाटा के लिए फ़ायदे का सौदा होगा.

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