ये विडंबना ही है कि आबादी के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश में सेक्स आज भी एक टैबू बना हुआ है. हम 2017 में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन सेक्स को लेकर हम अब भी असहज बने हुए हैं. किसी साधारण बातचीत में किसी भी पल आप सेक्स शब्द का इस्तेमाल कर देते हैं, तो समाज की भौंहें आपकी तरफ तन जाती हैं.

संस्कारों और संस्कृति का हवाला देकर कई लोगों की भावनाओं की निर्मम हत्या कर दी जाती है. सेक्स के मामले में समाज का उदारवादी आचरण और प्रगतिशीलता कहीं धुंधली पड़ जाती है और लोकतंत्र का एक स्तंभ यानि न्यायपालिका भी भारतीय समाज से ही इत्तेफाक रखता है, यही कारण है कि धारा 377 के तहत समलैंगिक होने पर आपको क्रिमिनल करार दिया जा सकता है.

बाबा रामदेव जैसे प्रभावशाली लोग इसे बीमारी बताते हैं और समाज में इसे एक कलंक के तौर पर देखा जाता है लेकिन समाज में तमाम तरह की कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोग इस धंधे में शामिल होने के लिए आगे आ रहे हैं. एक उपभोक्तावादी और पूंजीवादी समाज में, युवाओं पर भी समय और समाज के साथ-साथ चलने का दबाव है. ज्यादातर लोगों को भले ही इस काम में जबरदस्ती लाया गया हो लेकिन कई युवक ऐसे भी हैं, जो थोड़ी पॉकेट मनी और जल्दी पैसा कमाने की चाहत में गे सेक्स वर्कर्स बन जाते हैं.

दो साल पहले एक दोस्त, जो सामाजिक कार्यों में काफी दिलचस्पी रखती थी, उसने कुछ गरीब बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया था. ये वो बच्चे थे जो सड़कों पर काम करते थे. वहां एक बात साफ थी कि कुछ बच्चे पढ़ने में काफी कम दिलचस्पी दिखा रहे थे. जब इनमें से एक 13 साल के बच्चे से बात हुई तो सच काफी चौंका देने वाला था.

Source: Akhil Singh Photography

"तुम क्यों कुछ नहीं सीखना चाहते ?"

"क्या फायदा है दीदी? रात को तो वही काम करना है, पैसे भी उस काम से मिलने हैं. पढ़ाई-लिखाई मेरे किस काम आएगी?"

उसे कोई अंदाजा नहीं था कि ये लड़का आखिर कौन से काम की बात कर रहा है, लेकिन आखिरकार बच्चे ने खुद ही बताया कि वह रात को एक सेक्स वर्कर के तौर पर काम करता है. उसका बचपन में बलात्कार हुआ था, लेकिन उसे जल्द ही एहसास हो गया कि इस काम से तो जीने लायक पैसा कमाया जा सकता है.

सिद्धार्थ 18 साल का है और प्रयोगों के लिए तैयार है. एक समलैंगिक पार्टनर की तलाश करना उसके लिए मुश्किल है इसलिए पैसे देकर सर्विस लेना उसकी नज़र में सही जान पड़ता है.

जाहिर है, सभी लोगों को इस काम में धकेला नहीं जाता है, बल्कि कई लोग जल्द पैसा कमाने की चाह में भी इसे अंजाम देते हैं. एक और युवक ने बताया कि

"देखो अगर आपको कुछ पॉकेट मनी बनानी है और आप ये करने के लिए तैयार हैं, तो मिल जाते हैं 500 से 1000 रुपये तक. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप क्या करने में कंफर्टेबल हैं. होटलों और फ्लाईओवरों के पार्किंग क्षेत्र में काफी जगह होती है. जिनको सर्विस चाहिए, उनको पता होता है कि कहां आना है. आपको बस उस जगह पर खड़ा होना होता है."

Source: Huffpost

लेकिन ऐसा भी जरूरी नहीं कि सौदेबाजी केवल गुमनामी और अंधेरे कोनों में ही होती हो. दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस का पार्क एंट्रेस ऐसी सौदेबाजी के लिए काफी मशहूर है. इस जगह पर पहुंचा गया तो पाया कि एक बूढ़ा आदमी और एक युवा जो कि लिपस्टिक और आईलाइनर लगाए हुए मौजूद था, आपस में काफी बातचीत में मशगूल थे. असल में ये लोग डील तय कर रहे थे.

रात आठ बजे के बाद कनॉट प्लेस में गे सेक्स वर्कर्स काफी आसानी से चहलकदमी करते देखे जा सकते हैं और चूंकि इन्हें पैसों की जरूरत होती है तो ये 300 या 400 रुपये में ग्राहकों को आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं

इन सब घटनाओं को देखते हुए ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि गे सेक्स वर्कर्स की लाइफ खतरों के बीच पल बढ़ रही है. समलैंगिक संबंध बनाना देश में अब भी अवैध और गैर कानूनी है और समाज में गे सेक्स वर्कर्स को लेकर तमाम तरह की धारणाएं आज भी मौजूद हैं.

Source: Dailymail

लेकिन जैसे अवैध होने के बावजूद गुजरात औऱ बिहार में शराब की बिक्री नहीं रुकती, वैसे ही इन सब समस्याओं के बावजूद समलैंगिक सेक्स वर्कर्स की डिमांड लगातार बनी हुई है. भारत जैसे देश में ये काफी आसान है कि ये लोग किसी भी समय अपराधी घोषित करार दिए जा सकते हैं और इस खतरे से ये वर्कर्स भी अंजान नहीं हैं. ऐसे ही एक शख्स से जब इस बारे में पूछा गया तो उसने कहा -

"मुझे ये लॉजिक कभी समझ नहीं आया, समलैंगिकता को बुरा कहते हैं, अवैध बोलते हैं, पर हमारे पास इतने ग्राहक भी तो आते हैं. हम यहां है क्योंकि डिमांड है. अगर डिमांड नहीं होती तो हम भी पैसे के लिए कुछ और काम नहीं करते?"

इस प्रोग्रेसिव मामले में हमारा न्यायिक सिस्टम और लोकतांत्रिक समाज समय के साथ-साथ चलने में नाकामयाब रहा है. एक लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपने हर नागरिक के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील हो न कि उनके अस्तित्व को दबाने और खत्म करने की कोशिशें की जाए. दुर्भाग्य से समाज का यही असुरक्षित हिस्सा अदालती प्रणाली और समाज की दुश्वारियों से सबसे ज्यादा पीड़ित है.

Feature Image Source: knd.io