शाबेग सिंह: वो बाग़ी जनरल जिसने चीन-पाकिस्तान के खिलाफ़ जंग लड़ी और फिर देश से ही गद्दारी कर दी

Nripendra

General Shabeg Singh Who Fought Against Its Own Country: भारतीय सेना अपनी वीरता के लिए जानी जाती है. भारतीय फौज़ ने विश्व युद्ध से लेकर पाकिस्तान व चीन के खिलाफ़ बड़े सैन्य अभियान चलाए हैं, जिसमें हमने अपने कई वीर सिपाहियों को भी खोया है. दिन-रात भारतीय फ़ौज़ विपरित मौसम और विभिन्न कठिनाइयों को झेलकर देश की सुरक्षा में तैनात रहती है. इसलिए, हमें अपनी भारतीय सेना पर गर्व है. 


लेकिन, क्या कभी आप सोच सकते हैं कि भारतीय फौज़ का कोई सिपाही अपनी ही फौज़ के खिलाफ़ लड़ सकता है, इस चीज़ की हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, लेकिन इस लेख में हम जिस भारतीय फौज़ के जनरल के बारे में बताने जा रहे हैं, उसकी कहानी कुछ ऐसी ही है. जानकर हैरानी होगी कि भारतीय सेना के इस जनरल को इंडियन आर्मी का विद्रोही कहा जाता है. आइये, जानते हैं इस भारतीय जनरल की पूरी कहानी.    

आइये, अब विस्तार से पढ़ते हैं (General Shabeg Singh Who Fought Against Its Own Country) आर्टिकल. 

जनरल शाबेग सिंह  

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General Shabeg Singh Who Fought Against Its Own Country: हम जिस भारतीय जनरल की बात कर रहे हैं उनका नाम था जनरल शाबेग सिंह. शाबेग सिंह का जन्म 1925 में पंजाब के खियाला गांव में हुआ, जो कि अमृतसर-चोगावन रोड से क़रीब 14 किमी की दूरी पर पड़ता है. उनके पिता का नाम भगवान सिंह था और माता का नाम प्रीतम कौर. उन्होंने अमृतसर के खालसा कॉलेज और लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की. इसके बाद साल 1942 में अंग्रेज़ी अफ़सरों ने उन्हें भारतीय सेना के लिए चुन लिया था.   

हमेशा से सेना में भर्ती होना चाहते थे  

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General Shabeg Singh Who Fought Against Its Own Country: जनरल शाबेग सिंह के बारे में कहा जाता है कि वो क़रीब 5 फ़ुट 8 इंच लंबे थे. इसके अलावा, वो एक अच्छे एथलीट थे और घुड़सवारी और तैराकी भी अच्छी तरह कर लिया करते थे. साथ ही वो हमेशा से भारतीय सेना में भर्ती होना चाहते थे.  

कई बड़ी लड़ाइयों में हुए शामिल  

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General Shabeg Singh Who Fought Against Its Own Country: जरनल शाबेग सिंह भारतीय सेना में रहकर कई बड़ी लड़ाइयों का हिस्सा बने थे. उन्होंने द्वितीय विश्व में अपनी सेवा दी थी. इसके अलावा, 1947 में पाकिस्तान और 1962 में चीन के खिलाफ़ भी वो लड़े थे. वहीं, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध का भी वो हिस्सा थे. उनके छोटे बेटे प्रबपाल सिंह के अनुसार, उनके पिता 1948 में कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ़ लड़े थे. 


वहीं, वो आगे बताते हैं कि वो 1962 की लड़ाई में वो तेजपुर में थे. वहीं, लड़ाई में घायक सैनिकों को वो अपने कंधे पर उठाकर तेजपुर अस्पताल ले गए थे. इसके अलावा, 1965 की लड़ाई में जब वो हाजीपीर मोर्चे पर थे, जब उन्हें लेफ़्टिनेंट कर्नल से सीधे ब्रिगेडियर बनाया गया था.  
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मुक्ति वाहिनी को ट्रेनिंग 

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General Shabeg Singh Who Fought Against Its Own Country: 1971 में बांग्लादेश के संघर्ष के दौरान उन्हें जनरल सैम मानेक शॉ ने मुक्ति वाहिनी को ट्रेनिंग देने की ज़िम्मेदारी सौपी थी. ये एक सीक्रेट मिशन था, क्योंकि भारत नहीं चाहता था कि दुनिया इस ट्रेनिंग के बारे में जाने. कहते हैं की मुक्ति वाहिनी को ट्रेनिंग देने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी.  


जनरल शाबेग सिंह ने पाक सेना को छोड़कर आए मेजर ज़िया उर रहमान और मोहम्मद मुश्ताक को भी ट्रेंड किया, जिन्होंने बाद में बाग्लादेश के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष का पद संभाला. उन्होंने मुक्ति वाहिनी को हथियार चलाने से लेकर छापामार युद्ध नीति तक सिखाई थी.   

ऑपरेशन ब्लू स्टार में भारतीय सेना के खिलाफ़ ही लड़ गए  

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जनरल शाबेग सिंह की ज़िंदगी का एक बड़ा फै़सला जिसके बाद वो भारतीय सेना के विद्रोही बन गए. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चलाए गए ऑपरेशन ब्लू स्टार में वो भारतीय सेना के खिलाफ़ लड़ गए थे. ये ऑपरेशन स्वर्ण मंदिर में खालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ़ चलाया गया था. इस ऑपरेशन में एक तरफ़ भारतीय सेना का नेतृत्व केएस बरार कर रहे थे, तो दूसरी तरफ़ से लड़ने वालों का नेतृत्व जनरल शाबेग सिंह कर रहे थे. 


जानकर हैरानी होगी कि जनरल शाबेग की घेराबंदी की वजह से भारतीय सेना को मंदिर में छिपे आतंकियों को निकालने के लिए 6 से ज़्यादा टैंकों का सहारा लेना पड़ा था. लेफ़्टिनेंट जनरल केएस बरार के अनुसार, “जनरल शाबेग सिंह ने अकाल तख़्त के पास कड़ी घेराबंदी की हुई थी. 

खिड़कियों के पीछे रेत की बोरियों से लेकर मशीनगन फ़ायर के इंतज़ाम किए हुए थे. इस घेराबंदी का मक़सद था भारतीय सेना को रोके रखना, ताकि सुबह पंजाब के लोग विरोध करने के लिए वहां हथियारों के साथ मौजूद हो जाएं. अगर ऐसा होता, तो हमारे लिए मुश्किल हो सकती थी.” 

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जब टैंक उतारने का फैसला लिया गया  

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लेफ़्टिनेंट जनरल केएस बरार बताते हैं कि, “जब हमारी पैराशूट रेजिमेंट की पहली बटालियन परिक्रमा पथ की ओर आगे बढ़ी और खिड़कियों पर फ़ायर करने लगी, तो ज़मीन पर लेटे आतंकियों ने मशीनगन से उनकी टांगों पर गोली मारी. इसके बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा. इसके बाद दूसरी टुकड़ी भेजी गई, जिन्हें भी नुकसान उठाना पड़ा. इसके बाद 7 गढ़वाल रायफ़ल की 2 कंपनियां और 15 कुमाऊं रेजिमेंट की 2 कंपनियां उतारी गईं. इससे हम मंदिर के अंदर जगह बनाने में कामयाब हो पाए थे.” 


इसके बाद हमने टैंक उतारने का फैसला लिया, लेकिन सामने से राकेट संचालित ग्रेनेड लांचर से हमला हुआ और हमारा टैंक तबाह हो गया. इसके बाद हमने 6 विजयंत टैंक उतारे, जिन्होंने घेरेबंदी को तबाह कर दिया था. वहीं, जब लड़ाई समाप्त हुई, तो शाबेग सिंह की लाश अकाल तख़्त के पास मिली थी.”    

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