जुनून और कुछ बनने की चाह ने 65 साल की दलीबर कौर को रुकने नहीं दिया, आज वो चला रहीं हैं एक ढाबा

Kratika Nigam

घर से सपनों को पूरा करने निकले लोग अगर कुछ याद करते हैं तो वो घर के खाने को क्योंकि घर के जैसा खाना बाहर मिलना मुश्किल है. इन लोगों की इसी मुश्किल का सॉल्यूशन हैं दिल्ली के करमपुरा की रहने वाली दलबीर कौर, जो 65 साल की हैं.

लोगों को प्यार से खाना खिलाने वाली दलबीर कौर को सब ‘आंटी जी’ कहकर बुलाते हैं. दलबीर जी के ढाबे पर कोई बोर्ड नहीं है. मगर उनकी मुस्कान लोगों को अपनी ओर खींचती है. वो चेहरे पर मुस्कान लिए अपने ढाबे में आए लोगों के लिए पराठे बनाती हैं. ख़ास बात ये है कि वो पराठे तवे पर नहीं, कड़ाही में बनाती हैं. इसके पीछे का कारण उन्होंने बताया, तवे पर पराठे बनाने से किनारे पर पराठे सख़्त हो जाते हैं, लेकिन कड़ाही में बनाने पर ऐसा नहीं होता है और मुलायम-मुलायम टेस्टी पराठे बनते हैं. साथ ही तवे पर बनाने से धुआं होता है और कड़ाही में बनाने से नहीं होता है.

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दलबीर कौर से सबकी आंटीजी बनने की पीछे की कहानी बताते हुए उन्होंने कहा,

मेरे दो बेटे हैं, दोनों Uber कैब ड्राइवर हैं और अपनी फ़ैमिली के लिए अच्छा कमाते हैं. एक दिन मैंने अपने दोनों बेटों से कहा कि मुझे घर में बैठे रहने के बजाय कुछ करना है तो उन लोगों ने मुझे सपोर्ट करते हुए इस ढाबे को खोलने में मेरी मदद की. शुरुआत में मैं पराठे, रोटी, कढ़ी और मिक्स वेज बनाती थी. धीरे-धीरे स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चे मेरे पास आने लग गए और मेरा ढाबा गली में फ़ेमस हो गया. वो सब मुझे आंटी जी कहकर बुलाते थे और धीरे-धीरे मैं लोगों की ‘आंटी जी’ बन गई. आज मेरे पास 2-3 हेल्पर हैं, जो रोज़ ढाबे के काम में मेरी मदद करते हैं. 

दलबीर कौर के ढाबे में दो टेबल हैं और बाकी लकड़ी की बेंच हैं, जहां लोग बैठकर खाना खाते हैं. ढाबे का सारा काम वो ख़ुद करती हैं, सब्ज़ी लाने से काटने तक और फिर उसे बनाती भी हैं. इसलिए उन्हें One Man Army कहना ग़लत नहीं होगा.

दलबीर अपने ढाबे का मेन्यू रोज़ बदलती हैं वो रोज़ अपने कस्टमर्स को अलग-अलग खाना खिलाती हैं. उनके कुछ कस्टमर्स ऐसे हैं जो बाहर से दिल्ली रहने आए हैं और उन्हें घर के खाने की कमी न खले इसलिए वो उनके लिए अलग-अलग तरह का खाना सर्व करती हैं. 

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खाना जीतना टेस्टी है उसका रेट उतना ही कम है और वैरायटी ज़्यादा है. उनकी एक थाली की क़ीमत 40 रुपये है, जिसमें वो 4 रोटी, दो तरह की सब्ज़ी और रायता देती हैं. इसे खाने से पेट भी भरता है और जेब के बारे में भी ज़्यादा सोचना नहीं पड़ता है.  

वो रोज़ सुबह 9 बजे ढाबा खोलती हैं, खोलते ही साफ़-सफ़ाई करके सब्ज़ी काटने में लग जाती हैं. बिना रुके काम करती रहती हैं और 11:30 बजे तक पूरा खाना तैयार कर लेती है. इतनी मेहनत करने वाली दलबीर कौर के पहले कई ऑपरेशंस हो चुके हैं, यहां तक कि एक ऑपरेशन में तो उनके Galbladder (पित्ताशय की थैली) को भी निकाल दिया गया है.

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ये सब जानकर एक बात तो कहनी बनती है, जिस उम्र में लोग अपने बच्चों और दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं, उस उम्र में दलबीर कौर अपने हाथ-पैरों पर खड़े होकर अपने लिए कुछ कर रही हैं. वो अपनी ज़िंदगी के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं है. उन्होंने अपने पैशन को अपनी कमाई का ज़रिया बनाया है. उनका ये पैशन उन्हें ख़ुश रखता है. 

हम सभी को दलबीर कौर से प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने पैशन को फ़ॉलो कर आत्मनिर्भर बनना चाहिए. 

अगर आप भी दलीबर कौर के टेस्टी खाने का स्वाद चखना चाहते हैं तो पता ये रहा:

पता: मिलन सिनेमा रोड, नई मोती नगर, करमपुरा, दिल्ली 110015 

समय: सुबह 10:30 से रात 11:30 तक 
दो के लिए लागत: ₹ 80/- 

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