सोचिए, एक खिलाड़ी को देश के लिए खेलने पर कैसा महसूस होता होगा... गर्व से सिर ऊंचा किए जब वो मैदान/रिंग/कोर्ट में उतरता होगा, आंखों में सालों तक सिर्फ़ एक ख़्वाब लिए उसने बिना रुके, थके प्रैक्टिस की होगी.

फिर उसने पदक भी जीते, उसको नाम-शौहरत दोनों मिले. मगर किसी दुर्घटनावश उससे उसका खेल, नाम-शौहरत सब छिन गए, बाक़ी रह गए तो वो पदक जो उसकी मेहनत की गवाही देते हैं.

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ये कहानी है बॉक्सर दिनेश कुमार की, जिन्होंने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कई मुक़ाबलों में भारत के लिए पदक जीते. एक दुर्घटना में दिनेश को चोट लग गई. दिनेश के इलाज के लिए उनके पिता ने रुपए उधार लिए. दिनेश के पिता पर पहले से ही कर्ज़ था, जो उन्होंने दूसरे बेटे को अन्तर्राष्ट्रीय लेवल पर खेलने को भेजने के लिए लिया था.

दिनेश ने चोटिल होने से पहले 7 स्वर्ण, 1 रजत और 5 कांस्य पदक जीते थे.

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इलाज में लिए उधार को चुकाने के लिए दिनेश को कुल्फ़ी बेचना पड़ रहा है. उनके पिता को सरकार की ओर से कोई मदद भी नहीं मिल रही.

TOI से बातचीत में दिनेश ने कहा,

मैंने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई टूर्नामेंट्स में हिस्सा लिया है. इलाज के लिए पिता जी ने कर्ज़ लिया था, उसे चुकाने के लिए मैं कुल्फ़ी बेच रहा हूं. मेरी सरकार से गुज़ारिश है कि वो मेरी सहायता करे. मैं एक अच्छा खिलाड़ी हूं. मुझे एक सरकारी नौकरी चाहिए. अगर सरकार की मदद मिले तो मैं उभरते खिलाड़ियों को भी ट्रेनिंग दे सकता हूं.
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दिनेश के कोच विष्णु भगवान ने भी उनकी तारीफ़ की और कहा कि दिनेश को सरकारी मदद की आवश्यकता है.

दिनेश के अलावा भी कई पदक विजेताओं को मज़दूरी करके अपना पेट पालना पड़ता है. हम तो बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि अन्य खेलों के खिलाड़ियों को भी क्रिकेटर्स सा सम्मान और पहचान मिले.