ब्रिटिश हुकूमत ने भारत पर राज ही नहीं किया, बल्कि यहां के लोगों की मानसिकता को अपने वश में करने की कोशिश की. आज भी कई मर्तबा ये देखा जाता है कि लोगों की सोच सिर्फ़ एक तरह की हो जाती है. ग़र आप ये सोचते हैं कि उस दौर में भारत की भूमि में सभी क्रांतिकारी ही पैदा होते थे, तो आप सरासर ग़लत समझ रहे हैं, क्योंकि उस समय भी अमूमन सब एक सी सोच रखने वाले थे लेकिन कुछ ऐसे थे जो सोच के अपने बूटों (पौधों) को पानी देते थे. चंद्रशेखर आज़ाद उसी सोच को सींचने वाले एक क्रातिकारी का नाम है.

घर छोड़कर जब भागे काशी

पंडित चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 के दिन मध्यप्रदेश के पास एक आदिवासी गांव भावरा में हुआ था. आज़ाद के पिता सीताराम तिवारी उत्तरप्रदेश के उन्नाव ज़िले के रहने वाले थे. गांव में अकाल पड़ने के कारण उन्हें अपना गांव छोड़ना पड़ा और भावरा जाकर अपने रिश्तेदारों के पास बसना पड़ा. यहां जन्म हुआ चंद्रशेखर का. वो एक दिन अपना घर छोड़कर कुछ सवालों को अपने ज़ेहन में ज़िंदा रखे हुए घर से भाग गये, और पहुंचे तो कहां... काशी नगरी.

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फूफा के पास पहुंचे चंद्रशेखर

घर से भागकर चंद्रशेखर बनारस पहुंचे, अपने फूफा के पास. अपने फूफा का सहारा लेकर उन्होंने संस्कृति विद्यापीठ में दाखिला लिया और संस्कृत भाषा का अध्ययन करने लगे. उन्हीं दिनों असहयोग आंदोलन जनता में ब्रितानी हुकूमत के प्रति आक्रोश के बीज बो रहा था. पंडित चंद्रशेखर उम्र के उस पड़ाव पर थे, जहां विचार आते हैं और रम जाते हैं.

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दर्द से आया 'आज़ाद'

1921 में महात्मा गांधी द्वारा चलाया गये असहयोग आंदोलन से पंडित चंद्रशेखर काफ़ी प्रभावित थे. इस आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई थी. एक दिन चंद्रशेखर धरना देते हुए पकड़े गये. उस समय धरना देना अथार्त अपने आक्रोश को जाहिर करना भी जुर्म था. चंद्रशेखर को पारसी मेजिस्ट्रेट ने अदालत पेश किया. गौर करें उस समय चंद्रशेखर मात्र 15 साल के थे. जब मेजिस्ट्रेट ने उनसे कुछ सवाल पूछे:

तेरा नाम क्या है?

मेरा नाम आज़ाद है

तेरे पिता का नाम क्या है?

मेरे पिताजी का नाम स्वाधीन है

तू रहता कहां है?

मैं जेल में रहता हूं

इन जवाबों से जब मेजिस्ट्रेट नाराज़ हो गया, तो उसने आज़ाद को 15 बेंतों की सज़ा सुनाई. जल्लाद अपने ज़ोर से बेंत मारता गया, पंडित जी के हौसले मजबूत होते गये. बेंत मारने के बाद जेलर ने चंद्रशेखर की हथेली पर तीन आने रख दिए. आज़ाद ने पैसे जेलर के चेहरे पर मारे और वहां से भाग गये. इसके बाद लोग उनके विचारों को समझने लगे और उन्हें 'आज़ाद' कहकर बुलाने लगे. अपने दिल में आज़ादी का जज़्बा लिए जी रहे थे. उस समय बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ कहा जाता था. यहां चंद्रशेखर आज़ाद मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश गुप्त के संपर्क में आये और 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ' नाम के क्रांतिकारी संगठन के साथ जुड़ गये.

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काकोरी कांड के 'क्विक सिल्वर'

काकोर कांड में क्रांतिकारी दल के शीर्ष नेता रामप्रसाद बिस्मिल थे. चंद्रशेखर की उम्र कम और स्वाभाव में अधिक गु्स्सा होने के कारण रामप्रसाद बिस्मिल उन्हें 'क्विक सिल्वर' कहकर बुलाते थे. 9 फरवरी 1925 को इन्होंने लखनऊ के पास काकोरी में सरकारी खज़ाना लूट लिया. बिस्मिल पकड़े गये, लेकिन आज़ाद पुलिस के हाथ नही आये. अब दल की सारी ज़िम्मेदारी आज़ाद के कंधों पर थी. वो रोज़ पुलिसवालों से गप्पें लड़ाते लेकिन कभी भी किसी पुलिस वाले को ये संदेह नहीं हुआ कि वो चंद्रशेखर आज़ाद हैं. उन्होंने कुछ समय के बाद दल का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एंड आर्मी' रखा गया. आज़ाद इसके कमांडर थे.

साइमन कमीशन के विरोध से लाला जी का बदला

काकोरी कांड के बाद कई क्रांतिकारियों को फांसी की सज़ा हो गई. आज़ाद इसके बाद गुप्त तरीके झांसी चले गये और यहां एक मोटर कंपनी में मकेनिक के तौर पर काम करने लगे. इसके बाद वो कुछ समय गंगा किनारे साधु बनकर भी गुप्त तरीके अपने अभियान को चलाये हुए थे. इसके बाद सतारा नदी के किनारे भी कई दिनों तक कुटिया बनाकर रहे. सगंठन में अब कई आज़ादी के दीवाने आ गये थे. इसके कारण संगठन मजबूत हो रहा था. अब पार्टी का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना' था. आज़ाद इसके कमांडर चीफ़ थे. सरदार भगत सिंह भी उनके साथ जुड़ गये थे. उसी दौरान सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग बनाया गया. इस साइमन कमीशन का लाला लाजपत राय और दल के लोगों ने विरोध किया. लाठीचार्ज के दौरान लालाजी बुरी तरह से घायल हो गये और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई. लालाजी की मृत्यु ने क्रांतिकारियों को झकझोर दिया था. क्रातिकारियों ने पुलिस अधीक्षक सान्डर्स को मारने की ठानी. मोर्चे को संभाला राजगुरू, आज़ाद और भगत सिंह ने. सान्डर्स को मारने के बाद लालाजी की मौत के प्रति फैला आक्रोश हुकूमत तक पहुंच गया.

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आज़ाद मरते नहीं, विचारों में ज़िंदा रहते हैं

बटुकेश्वर दत्त और सरदार भगत सिंह ने 8 अप्रैल 1929 के दिन किसी को नुकसान पहुंचाने की मंशा से असेंबली में बम फेंका और अपनी बात उनके माध्यमों से जनता तक पहुंचाने की कोशिश जेल से करनी चाही. आज़ाद बाहर दल की गतिविधियां संभाल रहे थे लेकिन वो दिन आ ही गया जिसे शाहदत का नाम दिया जाता है. 27 फरवरी 1931 के इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में किसी की मुखबिरी के चलते आज़ाद को पुलिस द्वारा घेर लिया गया. आज़ाद अपने मित्र सुखदेव राज से भगत सिंह और दल के मसले पर वार्ता कर रहे थे. कई देर तक गोलीबारी चली लेकिन आख़िर में आज़ाद ने अपनी पिस्तोल से ख़ुद को गोल मार ली और आज़ाद सच में आज़ाद ही साबित हो गये.

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क्रांतिकारियों के बलिदान हम भुला नहीं सकते. ये उनके बलिदान की ही देन है कि मैं लिख रहा हूं और आप पढ़ कर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. उनका ज़िक्र आज फ़िज़ा में भी है. क्योंकि वो भी आज आज़ाद है.