महान संगीतकार तानसेन को हराया था बैजू बावरा ने. उनकी आवाज़ का जादू ऐसा था कि पत्थर भी पिघल जाते थे. उन पर फ़िल्म बनी थी ‘बैजू बावारा’, जिसमें भारत भूषण ने उनका किरदार निभाया था. लेकिन 1952 में आई इस सुपरहिट फ़िल्म के लिए डायरेक्टर विजय भट्ट की पहली पसंद वो नहीं, बल्कि दिलीप कुमार थे.

cinestaan

दरअसल, जब डायरेक्टर विजय भट्ट को इस फ़िल्म को बनाने का आइडिया आया तो वो पहले इसमें दिलीप कुमार और नरगिस की जोड़ी को कास्ट करना चाहते थे. विजय भट्ट साहब ने नरगिस से बात की और उन्हें 10 हज़ार रुपये साइनिंग अमाउंट देकर साइन कर लिया. उन्हें फ़िल्म बनने के बाद 50 हज़ार रुपये दिए जाने थे.

cinestaan

मगर फ़िल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले ही उनकी तबियत ख़राब हो गई और उन्होंने फ़िल्म छोड़ दी. इसके बाद ये फ़िल्म वेटरन एक्ट्रेस मीना कुमारी की झोली में आ गई. उधर एक्टर के रोल के लिए दिलीप कुमार से बातचीत जारी थी. विजय भट्ट उन्हें साइन करने के इरादे से उनके घर गए. यहां फ़िल्म की कहानी सुनने के बाद दिलीप कुमार ने 1.5 लाख रुपये मेहनताने के रूप में मांग लिए.

ये रक़म काफ़ी अधिक थी, जिसे सुनने के बाद विजय भट्ट का चेहरा पीला पड़ गया. दिलीप कुमार ने उनके मुरझाए चेहरे को देख अगली मीटिंग में फ़ीस तय करने की बात कही. लेकिन तब तक विजय भट्ट के मन से उन्हें कास्ट करने का ख़्याल जाता रहा. उन्होंने दूसरी मीटिंग करने की बजाए किसी नए एक्टर की तलाश करनी शुरू कर दी.

openthemagazine

ये बात उनके किसी दोस्त को पता चली तो उन्होंने एक्टर भारत भूषण को विजय भट्ट से मिलवा दिया. उन्हें भारत भूषण पसंद आ गए और लगे हाथ 6000 रुपये साइनिंग अमाउंट देकर उन्हें फ़िल्म के लिए साइन कर लिया.

blogspot

इस तरह दिलीप कुमार एक क्लासिक फ़िल्म का हिस्सा बनते-बनते रह गए. अगर वो अधिक पैसों की डिमांड न करते तो शायद आज हम ‘बैजू बावरा’ के लिए भारत भूषण को नहीं, उन्हें याद कर रहे होते. इस फ़िल्म से जुड़ा ये क़िस्सा आप यहां पढ़ सकते हैं.

Entertainment के और आर्टिकल पढ़ने के लिये ScoopWhoop Hindi पर क्लिक करें.