Film Darlings Best Moments: काफ़ी दिनों से एक्ट्रेस आलिया भट्ट (Alia Bhatt) और शेफ़ाली शाह (Shefali Shah) अपनी फ़िल्म ‘डार्लिंग्सका प्रमोशन ज़ोरों-शोरों से कर रही थीं. जिसके बाद ये फ़िल्म आख़िरकार 5 अगस्त को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हो गई. इसमें इन दोनों टैलेंटेड एक्ट्रेस के अलावा विजय वर्मा और रोशन मैथ्यू ने भी मुख्य भूमिका निभाई है. ये मूवी एक मां-बेटी की जोड़ी के बारे में हैं, जो सिर्फ एक-दूसरे की सबसे बड़ी चीयरलीडर ही नहीं होती, बल्कि एक-दूसरे के लिए क्रिटिक्स की भूमिका भी निभाती हैं. दोनों एक पुरुषों से जुड़े जटिल रिश्ते में फंस गई हैं, लेकिन फ़िल्म में उन्हें कभी कमज़ोर के रूप में पेश नहीं किया जाता है. आलिया भट्ट और शेफ़ाली शाह ने उत्साही महिलाओं की भूमिका निभाई है, जो ख़राब शादियों के बावजूद जीवन से हार मानने को तैयार नहीं हैं. फ़िल्म घरेलू हिंसा की एक वास्तविक तस्वीर पेश करती है. 

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आइए आपको बता देते हैं फ़िल्म ‘डार्लिंग्स’ के वो 12 मोमेंट्स (Film Darlings Best Moments), जो आपको समाज की बदसूरत सच्चाई की तस्वीर दिखाते हैं. 

Film Darlings Best Moments

1. जब हमज़ा के खाने में पत्थर मिलने पर बदरू ख़ुद ब ख़ुद डर के मारे अपना हाथ आगे कर देती है.  

बदरू (आलिया भट्ट) अपने पति हमज़ा (विजय वर्मा) को खाना परोस रही होती है. खाना खाते-खाते हमज़ा के मुंह में कंकड़ आ जाता है, जिसके बाद उसका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर होता है. डर के मारे बदरू अपना हाथ उसके मुंह के आगे कर देती है, ताकि वो उसके हाथ पर कंकड़ थूक सके. 

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2. जब बदरू की मां हमज़ा के गले पर निशान देखती है. 

मूवी में शेफ़ाली शाह ने बदरू की मां ‘शमसुनिस्सा‘ की भूमिका निभाई है. वो जानती है कि उनका दामाद उनकी बेटी के साथ कैसा बर्ताव करता है. वो अक्सर अपने बेटी को अपने पति को छोड़ने के लिए कहती है. जब वो बदरू के गले में निशान देखती है, तो वो उससे पूछती है कि उसने अब ऐसा क्या कर दिया. 

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3. जब बदरू किचन में रखी प्लेट तोड़ने लगती है.  

इस सीन में पहली बार घरेलू हिंसा के प्रति बदरू अपना ग़ुस्सा व्यक्त करते हुए देखी जाती है. वो हमज़ा को काम पर जाने से पहले बाय भी नहीं बोलती है. इस सीन में ऐसा लगता है कि वो हमज़ा की हैवानियत को सहन करते-करते अपने टिप पॉइंट पर पहुंच चुकी है. (Film Darlings Best Moments)

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4. जब हमज़ा बदरू पर इमोशनल कार्ड खेलने की कोशिश करता है. 

इस सीन में बदरू पर हमज़ा इमोशनल कार्ड खेलता है. वो उससे कहता है कि अगर वो उससे प्यार नहीं करता, तो उसे मारता क्यूं और अगर हमज़ा उससे प्यार नहीं करती, तो वो ये सब क्यूं सहती. (Film Darlings Best Moments)

5. जब शमसुनिस्सा और पुलिस जनता को समाज की सच्चाई से वाकिफ़ कराते हैं.  

इस सीन में बदरू और शमसुनिस्सा घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए हमज़ा के खिलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज करा रही होती हैं. इस सीन में पुलिस अफ़सर (विजय मौर्या) शमसुनिस्सा को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे औरतों के लिए ज़माना बदल गया है और वो अब आसानी से घरेलू हिंसा के खिलाफ़ अपना स्टैंड ले सकती हैं. लेकिन शमसु पुलिसवाले को बताती है कि कैसे रियलिटी इस चीज़ से कोसों दूर है. इसके बाद पेपर्स फ़ाइल करने के दौरान शमसु पुलिस अफ़सर से पूछती है कि शराब पीने के बाद पुरुष महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार क्यों करते हैं? जिस पर पुलिसवाला कहता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि महिलाएं उन्हें अनुमति देती हैं. (Film Darlings Best Moments)

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6. जब शमसु अपनी बेटी से कहती है कि कैसे कुछ मर्द कभी नहीं बदलते. 

इस सीन में पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने के बाद शमसु अपनी बेटी को एक मेंढक और एक बिच्छू की कहानी सुनाती है. वो बदरू को बताती है कि कुछ मर्द बिच्छू की तरह होते हैं और दूसरों को चोट पहुंचाना उनके कभी ना बदलने वाली प्रवृत्ति का एक हिस्सा है. इसमें ऑडियंस अच्छे से जानती है कि उसकी मां किसके बारे में बात कर रही है, लेकिन बदरू अभी भी अपने लिए गए फ़ैसले को लेकर श्योर नहीं है.  

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7. जब बदरू अपनी मां के ऊपर हमज़ा को चुनती है. 

हमज़ा के ग़ुस्से की कोई सीमा नहीं है. हद तो तब पार हो जाती है, जब वो शमसु को भी मारता है. इसके बाद शमसु अपनी बेटी को उसी दौरान हमज़ा को छोड़ने के लिए कहती है. लेकिन इस दौरान भी हमजा के बार-बार इमोशनल कार्ड खेलने के चलते बदरू अपने पति को ही चुनती है. ये बात शमसु को अंदर तक चोट पहुंचाती है, क्योंकि हमज़ा के बार-बार हाथ उठाने पर भी बदरू उसके ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलती. 

8. जब बदरू हॉस्पिटल छोड़ देती है. 

बदरू का गर्भपात हो जाता है, जिसके बाद वो इमोशनली टूट जाती है. हालांकि, ये सीन उसके द्वारा सहन की गई सभी हिंसा के प्रति आंखें खोल देता है. वो सिर्फ़ एक चीज़ दिमाग़ में लिए हुए हॉस्पिटल से बाहर निकलती है और वो है हमज़ा को सबक़ सिखाना. 

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9. जब बदरू को एहसास होता है कि वो अपनी इज़्ज़त दूसरों से मांग नहीं सकती. 

जब बदरू अपने पति को रेल की पटरियों पर उसकी क़िस्मत के भरोसे उसे छोड़ देती है, तब उसे एहसास होता है कि वो भी उसके जैसी ही बन गई है. उसने ये तरीक़ा अपनी हमज़ा की नज़रों में अपने प्रति इज्ज़त पाने के लिए किया था. लेकिन फिर उसे एहसास होता है कि उसकी इज़्ज़त उसकी है और वो ख़ुद से ही आ सकती है. 

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10. जब दैवीय शक्तियां हमज़ा का केस अपने हाथ में ले लेती हैं. 

जब बदरू हमज़ा को छोड़ देती है, तब वो उसे ताने मारता है कि ये काम उसके जैसा विनम्र व्यक्ति ख़ुद कैसे करेगा. लेकिन बदरू अपना मन बना चुकी होती है. वो उसे छोड़ देती है. जब मां-बेटी उसे पटरियों पर छोड़ कर चले जाते हैं, तो दैवीय शक्तियां अपना कमाल दिखा देती हैं. 

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11. जब मां-बेटी की जोड़ी को एहसास होता है कि अब वो हिंसा से आज़ाद हैं. 

मां और बेटी के इस सीन में ज़्यादा डायलॉग नहीं है. लेकिन जब वो दोनों शीशे में देखती हैं, तो उनकी आंखों में उम्मीद दिखती है कि चीज़ें बेहतर चीज़ों के लिए बदल चुकी हैं. 

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12. जब बदरू को अपनी मां की सच्चाई के बारे में पता चलता है. 

इस सीन में कोई डायलॉग नहीं हैं, और यही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है. इसमें बदरू को अपनी मां की सच्चाई के बारे में पता चलता है और फिर उन्हें एहसास होता है कि वो केवल एक-दूसरे की हैं.  

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इस मूवी को देखना तो बनता है बॉस.