रोमांटिक फ़िल्मों के जादूगर थे यश चोपड़ा. वो समाज कि नब्ज़ पकड़कर प्रेम कहानियों को गढ़ने की कला में माहिर थे. 'डर' में उन्होंने एक सिरफिरे आशिक की कहानी दिखाई, तो 'वीर ज़ारा' में सब्र और इंतज़ार वाली प्रेम कहानी. 'लम्हे' और 'सिलसिला' तो अपने ज़माने से कहीं आगे की लव स्टोरीज़ लेकर आई थीं.

उन्होंने अपनी फ़िल्मों के ज़रिये कई कलाकारों को भी फ़ेमस कर दिया, जिसमें शाहरुख़ ख़ान का नाम भी शामिल हैं. उन्हें किंग ऑफ़ रोमांस का ख़िताब भी यश राज बैनर्स के तले बनीं फ़िल्मों की वजह से ही मिला है. उनकी फ़िल्मों को देखकर अकसर लोग यश चोपड़ा स्टाइल रोमांस करने की बातें किया करते थे.

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जिस बैनर के तले ये सभी फ़िल्में बनी उसका नाम है यश राज फ़िल्म्स(YRF). इसकी स्थापना 1971 में यश चोपड़ा ने की थी. इन दिनों इसकी कमान उनके बेटे आदित्य चोपड़ा के हाथ में है. मगर इस बैनर की शुरूआत यश चोपड़ा ने कैसे की थी और अपनी पहली फ़िल्म के लिए फ़ाइनेंस उन्हें कहां से मिला था, इसकी भी एक इंटरेस्टिंग स्टोरी है. आज हम आपको इसके बारे में ही बताने जा रहे हैं.

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बात उन दिनों की है जब यश चोपड़ा ने अपनी ख़ुद की पहचान बनाने के बारे में सोचा. ये वो दौर था जब उनकी शादी हो चुकी थी और पत्नी की ज़िम्मेदारी भी थी. उन्हें अपने परिवार का ख़र्च उठाने के लिए बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा की कंपनी से मिलने वाली सैलरी पर डिपेंड रहना पड़ता था.

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तब उन्होंने ख़ुद को इंडिपेंडेंट बनाने के बारे में सोचा और स्वयं का एक बैनर का सपना बुना. इस बारे में उन्होंने अपने बड़े भाई से बात की. आज तक वो अपने भाई की कंपनी के लिए ही काम कर रहे थे. उन्हें फ़ाइनेंस और प्रोडक्शन का कोई अनुभव या ज्ञान नहीं था. मगर वो मन में ठान चुके थे कि अपने ख़ुद के बैनर यश राज फ़िल्म की स्थापना करेंगे.

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उनके पास दोस्त गुलशन नंदा की लिखी एक कहानी थी 'दाग'. इस फ़िल्म को ही अपने बैनर की पहली फ़िल्म बनाने की ठानी. फिर बड़े भाई से मिले और उन्हें भी अपने फ़ैसले से अवगत कराया. उन्होंने यश का हौसला बढ़ाया और एक बात भी कही. बी.आर. चोपड़ा ने कहा- 'यश अब अगर अपने बलबूते पर खड़ा होना चाहते हो तो सभी काम अपने दम पर ही करना. फ़िल्म के लिए पैसे जुटाना, स्टार्स की कास्टिंग, डायरेक्शन और भी सभी चीज़ें तुम्हें मेरे नाम और मेरे सपोर्ट के बिना करनी होंगी.'

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यश चोपड़ा मान गए. अब फ़िल्म के लिए पैसे जुटाने की समस्या खड़ी हुई. उस कठिन घड़ी में कुछ स्टार्स ने भी उनकी मदद की. इनमें राखी, शर्मिला टैगोर, राजेश खन्ना का नाम शामिल है. इनसे उन्होंने कहा कि वो ख़ुद एक फ़िल्म बनाने जा रहे हैं और इसके लिए उन्हें कास्ट करना चहाते हैं. उन्होंने बिना कुछ सोचे समझे हां कह दी. राखी ने तो कुछ पैसे देकर उनसे कहा कि 'इन्हें रख लो तुम्हारे काम आएंगे. जब हों तब लौटा देना.'

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ये बात यश चोपड़ा के दोस्त गुलशन नंदा को पता चली. तब उन्होंने ख़ुशी जाहिर करते हुए यश की फ़िल्म को फ़ाइनेंस करने का ऑफ़र दिया. तब यश जी ने कहा कि 'मुझे तो मार्केट से पैसे उठाने का कोई आइडिया नहीं है. क्या टर्म और कंडिशन होंगी मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं है.' तब गुलशन जी ने कहा 'मैं तो तुम्हें किसी भी टर्म और कंडिशन्स पर पैसे देने को तैयार हूं.'

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उसी वक़्त उन्होंने चेकबुक निकाली और उनके नाम 2 लाख का चेक लिख दिया. फिर वो उन्हें गाड़ी में बी.आर. चोपड़ा के घर ले गए. यहां जाकर गुलशन ने बी.आर. चोपड़ा से कहा कि 'भाई साहब यश अपनी फ़िल्म बनाने जा रहा है, ये दो लाख का चेक आप अपने हाथ ये यश को आशीर्वाद के रूप में दे दें.'

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यश जी ने एक इंटरव्यू में इस भावुक पल को याद करते हुए कहा था कि गुलशन जी का ये भाव देखकर और बड़े भाई से चेक लेते हुए उनकी आंखें भर आई थीं. उस दिन के से दोनों लोगों के लिए यश जी के दिल में इज़्ज़त और भी बढ़ गई थी. दाग फ़िल्म बनी और हिट भी रही. पहले इस फ़िल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे 9 सिनेमाघरों में ही रिलीज़ करने का फ़ैसला किया था, लेकिन फ़िल्म हिट होने के बाद इसकी संख्या दोगुना कर दी गई थी.

इस तरह यश चोपड़ा ने यश राज फ़िल्म्स की स्थापना की और अपनी एक अलग पहचान बनाई. उनके जाने के बाद आदित्य चोपड़ा ने इस बैनर की कमान संभाल ली और आज भी इसके बैनर तले हर साल कई हिट फ़िल्मों का निर्माण किया जा रहा है.

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