हमारे देश को आज़ाद हुए आज लगभग 70 वर्ष बीतने वाले हैं, और लगभग इतने ही वर्षों पहले भारतीय उपमहाद्वीप भी दो हिस्सों में बंट गया था. हालांकि आज हम विभाजन के दौर से बहुत आगे आ चुके हैं, मगर फिर भी कई घाव ऐसे भी हैं, जिनके भरने के बावजूद उनका दर्द कहीं छिपा रह जाता है.

जब भारत के महत्वपूर्ण नेताओं ने जो आज़ादी की जंग का हिस्सा रहे थे ने देश की हुकूमत का फैसला उनके हांथों में लिया. इस पूरे दुष्चक्र में लाखों लोगों ने जानें गंवा दीं, तो वहीं लाखों लोग बेघर हो गए.

यह अत्यंत महत्वपूर्ण और ख़ौफ़नाक निर्णय 3 जून, 1947 को लिया गया था, जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी (AICC) ने माउंटबेटेन प्लान पर वोट किया, जिसका परिणाम हिन्द-पाक विभाजन और रक़्तपात के रूप में देखने को मिला.

इस सारी खलबली और कशाकशी के दौरान भारत की पहली फ़ोटो-जर्नलिस्ट होमी व्यारवाल्ला हर तरह के लिंगभेद से लड़ती रहीं. और उस ऐतिहासिक वोटिंग की दुर्लभ तस्वीरों को कैद करती रहीं, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी.

इस पूरे सांप्रदायिक कशाकशी के दो धड़े थे, जिसमें एक धड़ा पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस था, तो वहीं दूसरा धड़ा मोहम्मद अली जिन्ना की अगुआई में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग नामक संगठन था. लेकिन इस विभाजन और उस समय के नेतृत्व की अदूरदर्शिता का दंश लाखों लोगों को अपना सब-कुछ गंवा कर झेलना पड़ा.

दुर्भाग्यवश, न यह पहला मौका था और न आख़िरी जब राजनीति ने लोगों के दिलों में दर्द और ज़मीन पर विभाजन की लकीरें खींच दीं...