उसने लिखा था:

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,

आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे

इन पंक्तियों को लिखने वाले थे महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद, जिन्होंने कसम खाई थी कि, जीते जी कभी अंग्रेज़ी हुकूमत उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर पाएगी. चंद्रशेखर आज़ाद का असली नाम चंद्रशेखर तिवारी था. उनकी मां जगरानी देवी उन्हे प्यार से चंदू बुलाती थीं. उनका सपना था कि चंद्रशेखर एक संस्कृत ज्ञानी बनें. आज़ाद ने संस्कृत कॉलेज में दाखिला भी लिया, पर उनका मन देश सेवा में रमने लगा था. सो वो देश आज़ाद के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े.

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उनके शहीद होने के बाद उनकी माता की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. कहते हैं कि आज़ाद के जाने के बाद उन्होंने कई दिन कादो खाकर गुज़ारे थे. उनकी याद में रो-रोकर उन्होंने अपनी आंखें तक ख़राब कर ली थीं. क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था कि आज़ाद एक दिन ज़रूर लौट आएंगे. इसके लिए उन्होंने अपनी दो उंगलियों पर धागे मन्नत स्वरूप बांध रखे थे.

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जगरानी की ऐसी दशा के बारे में जब पंडित जवाहर लाल नेहरू को पता चला था, तब उन्होंने 500 रुपये उनके लिए भिजवाए थे. बाद में आज़ाद के ही सबसे विश्वासपात्र सहयोगी सदाशिव मल्कारपुरकर ने उनकी पूरी ज़िम्मेदारी उठाई.

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सदाशिव उन्हें अपने साथ अपने घर झांसी ले आए. यहां उनकी खूब सेवा की और तीर्थ यात्राएं भी कराई. सदाशिव कि सेवा से जगरानी इतनी ख़ुश थीं कि वो उनसे कहतीं कि, अगर चंदू ज़िंदा भी होता तो तुमसे ज़्यादा सेवा कहां कर पाता.

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23 मार्च 1951 को आज़ाद की मां का निधन हुआ, जिसके बाद सदाशिव ने ही उनका अंतिम संस्कार किया था. बाद में उन्होंने झांसी के बड़ागांव शमशान घाट पर ही आज़ाद की मां की समाधि बनवाई थी.

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ख़ैर हम आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने वाले आज़ाद की मां की देखभाल अच्छे नहीं कर पाए. लेकिन क्या हम उनके सपनों का समाजवादी समाज बनाने की कोशिश नहीं कर सकते?

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