हमारे देश में दूसरे देशों से भी लोग पढने आते हैं, कोई अमेरिका से आता है, तो कोई अफ्रीका से. लेकिन पिछले दिनों ग्रेटर नोएडा में इन अफ्रीकी स्टूडेंट्स पर हुए नस्लीय हमले ने एक बार फिर इस बात को हवा दी है कि इनके लिए भारतीयों के के मन में डर और नफ़रत अभी भी है. इसलिए शायद किसी भी आपराधिक घटना में इन अफ्रीकियों को शक़ के दायरे में खड़ा किया जाता है. इनको कई लोग 'हब्शी' भी बोलते हैं, लेकिन क्यों ये इनको भी पता नहीं है. कई बार हम अपने आस-पास के लोगों के मुंह से 'हब्शी' शब्द सुनते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि 'हब्शी' कौन होते हैं या इस शब्द का क्या मतलब होता है? तो आज हम आपको बताते हैं इस शब्द का इतिहास हमारे देश से जुड़ा हुआ है और ये इनके प्रति ये नफ़रत सदियों पुरानी है.

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पुरानी बात है कि 13वीं शताब्दी के तीसरे दशक में दिल्ली में एक अफ़वाह फैली थी, जिसका सीधा संबंध भारत की पहली महिला शासक रज़िया सुल्तान और उनके अफ्रीकी मूल के सिपहसालार जमालुद्दीन याकूत से था. हालांकि, इस बात की सच्चाई को कोई भी पूरी तरह नहीं जानता था कि सच में दोनों के बीच प्रेम संबंध हैं या नहीं. मगर इसी अफ़वाह के तहत एक तीर से दो निशाने लगाने की गहरी साजिश रची गई. एक तो महिला शासक के चरित्र पर सवाल उठाकर उसे सत्ता से बेदखल करना और दूसरा उनके ताकतवर सिपहसालार को एक धोखेबाज की तरह सबके सामने लाना ताकि ये साबित किया जा सके कि उसने शासक से साथ अनैतिक संबंध बनाए.

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रज़िया सुल्तान और जमालुद्दीन के कथित संबंधों ने तुर्की समाज में रज़िया के लिए लोगों के मन में ईष्या को जन्म दिया. लोग रज़िया के सिपहसालार जमालुद्दीन को इसलिए पसंद नहीं करते थे कि वह एक 'हब्शी' था.

मध्यकालीन युग में उत्तर पूर्व अफ्रीका का एक प्रायद्वीप था, जिसे हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका के बेहद ख़ास स्थान के रूप में जाना जाता था. गुलामों को खरीदने-बेचने वाले अरब और यूरोप के लोगों के लिए यह पसंदीदा जगह हुआ करती थी. हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका के इस ख़ास इलाके को अरब के लोग 'अल-हबश' कहा करते थे और वहां रहने वाले लोगों को 'हब्शी' या 'अबीसीनियन' कहा जाता था. इसलिये जब ये लोग गुलाम या खरीददार के रूप में भारत आए, तो उन्हें 'हब्शी' कहा गया. धीरे-धीरे वक़्त आगे बढ़ता गया और इस 'हब्शी' शब्द को भारत में काले रंग के लोगों से जोड़ा जाने लगा.

उस वक़्त भारत आने वाले इन अफ्रीकी गुलामों के लिए यह कहना गलत नहीं होगा कि यहां लाए गए कई अफ्रीकी गुलाम शायद बड़ी किस्मत लेकर आए थे. आगे चलकर दिल्ली की सत्ता पर गुलाम या ममलूक वंश का राज स्थापित हुआ, जो पहला मुस्लिम राजवंश था. आपको बता दें कि मध्ययुगीन इस्लाम में एक समतावादी व्यवस्था थी कि अगर गुलाम में भी काबिलियत है, तो वो भी तरक्की कर सकता है आगे बढ़ सकता है. योग्यता के आधार पर वह राजा भी बन सकता था. भारतीय समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए उनको गोरा होने या सुन्दर होने की कोई भी ज़रूरत नहीं थी.

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समय बीतता गया और भारत के अलग-अलग हिस्सों पर 'हब्शियों' ने राज किया. राजा मलिक अंबर, जो बहमनी सल्तनत के राज्य अहमदनगर और बीजापुर का राजा था, उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ. ये उसकी ही बहादुरी थी कि जिसने लंबे वक्त तक भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार होने से रोके रखा. गौरतलब है कि गुलाम से सुल्तान बने चार हब्शी राजाओं ने बंगाल में 1487 से 1494 तक राज किया, जिसे 'हब्शी साम्राज्य' के नाम से भी जाना जाता है.

हालांकि, उस दौर में भी 'हब्शी' सुल्तानों के प्रति उनके प्रतिद्वंदियों के मन में नस्लीय नफ़रत होती थी. उदाहरण के तौर पर जहांगीर ने अपने सपने को एक पेंटिंग में तब्दील कर दिया, इस पेंटिंग में वो मलिक अंबर के सिर पर तीर मारता नज़र आता है. पर आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हकीक़त में जहांगीर कभी भी मलिक अंबर को युद्ध में हरा नहीं पाया था.

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इतिहास कुछ भी रहा हो, पर शायद आज भी लोगों के मन में उनके लिए सिर्फ़ नस्लीय नफ़रत है. जो पिछले दिनों ग्रेटर नोएडा में हुई घटना की तरफ इशारा करती है.

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