आज जब भी आज़ादी के क्रांतिवीरों का ज़िक्र होता है, चंद्रशेखर आज़ाद (Chandra Shekhar Azad) का नाम सबसे पहले आता है. उनकी मूंछों पर ताव देती हुई रौबदार तस्वीर आज भी लोगों के दिलों-दिमाग़ में बसी हुई है. जैसी उन्होंने अपनी छवि बना रखी थी, वो उसी अंदाज़ में अपना जीवन जीना पसंद करते थे. वो बेहद कम उम्र में ही देश के स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बन गए थे. 'आज़ाद' ये एक ऐसा शब्द है, जो चंद्रशेखर के जीवन से जुड़ा हुआ है और उन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते ही अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया था. 

अंग्रेज़ों के मन में चंद्रशेखर आज़ाद (Chandra Shekhar Azad) के प्रति इस कदर खौफ़ था कि जिस पेड़ के नीचे उनकी मृत्यु हुई थी, उस पेड़ को ब्रिटिश सरकार ने बाद में कटवा दिया था. आज हम आपको चंद्रशेखर आज़ाद के जीवन के बारे में संक्षिप्त जानकारी देने के साथ ही उस पेड़ के बारे में भी बताएंगे. 

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Chandra Shekhar Azad

चंद्रशेखर आज़ाद (Chandra Shekhar Azad) का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा मेंमें हुआ था. उन्होंने अपना पूरा जीवन देश के लिए लड़ते-लड़ते कुर्बान कर दिया. साल 1922 में जब 'चौरी चौरा' की घटना के बाद गांधीजी ने 'असहयोग आंदोलन' वापस ले लिया, तब आज़ाद का कांग्रेस से मोहभंग हो गया और वो क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए. वो वहां राम प्रसाद बिस्मिल और शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेश चन्द्र चटर्जी द्वारा गठित 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बने. इसके बाद उन्होंने 1925 में 'काकोरी कांड' में भाग लिया. इसके बाद 1927 में उन्होंने लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर एस.पी. सॉन्डर्स को गोली मारते हुए लाल लाजपत राय की मौत का बदला लिया. इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ों के खज़ाने को लूट कर संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना शुरू कर दिया. 

कभी ज़िन्दा नहीं पकड़ पाई पुलिस

चंद्रशेखर आज़ाद की आदत थी कि जब भी कोई उनका साथी पकड़ा जाता था, जो उनके रहने का स्थान जानता था, तो वो अपने रहने की जगह के साथ ही अपना शहर भी बदल लेते थे. शायद यही वजह थी कि अनेक लोगों द्वारा मुखबरी दिए जाने के बाद भी पुलिस कभी उन्हें ज़िन्दा नहीं पकड़ पाई. अंग्रेज़ों से लड़ाई करने के लिए इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव और अपने अन्य साथियों के साथ आज़ाद एक योजना बना रहे थे. इस बात की भनक अंग्रेज़ों को लग गई. इस लड़ाई में पुलिस की गोलियों से आज़ाद बुरी तरह घायल हो गए थे. उन्होंने ख़ुद से वादा किया था कि वो कभी नहीं पकड़े जाएंगे. इसलिए उनकी पिस्तौल में बची आख़िरी गोली से उन्होंने ख़ुद को गोली मार ली और वीरगति को प्राप्त हो गए. 

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ब्रिटिश सरकार ने कटवा दिया पेड़

चन्द्रशेखर आज़ाद की मौत के बाद पुलिस ने बिना किसी सूचना के ही उनकाअन्तिम संस्कार कर दिया था. अल्फ्रेड पार्क में जिस पेड़ के नीचे चंद्रशेखर शहीद हुए थे, घटना के दूसरे दिन बड़ी तादाद में लोग उस पेड़ की पूजा करने लगे. पेड़ के तने में काफ़ी गोलियां धंस गई थीं. लोगों ने पेड़ के तने पर सिंदूर पोत दिया और उसके नीचे धूप-दीप जलाकर फूल चढ़ाने लगे. आज़ाद की मौत के ख़बर से लोग इतने आक्रोशित थे कि शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले होने लगे. सड़कों पर जुलूस निकाले गए. लोग उस पेड़ की मिट्टी को कपड़ों की शीशियों में भरकर घर ले जाने लगे. अंग्रेज़ सरकार से ये सब सहन नहीं हुआ और उन्होंने रातों-रात उस पेड़ को कटवाकर उसका नामोनिशान मिटा दिया.  

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आज़ाद पार्क के नाम से हुआ प्रचलित

चन्द्रशेखर आज़ाद की मौत जिस पेड़ की नीचे हुई वो तो कट गया, लेकिन उसके बाद से जनता अल्फ्रेड पार्क को आज़ाद पार्क के नाम से बुलाने लगी. आज के समय में प्रयागराज में स्थित इस पार्क में आज़ाद की कई फ़ुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है. यहां हर रोज़ हज़ारों लोग आकर चंद्रशेखर को याद करते हैं. इसमें एक म्यूज़ियम भी है, जिसमें देश की आज़ादी में आज़ाद की भूमिका से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं.

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चंद्रशेखर लोगों की यादों में हमेशा आज़ाद रहेंगे.