Kalikho Pul Death: जैसे केंद्र सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है,ठीक वैसे ही किसी राज्य के प्रमुख को मुख्यमंत्री कहा जाता है. मुख्यमंत्री का कार्यकाल वैसे तो 5 साल का होता है, लेकिन भारत के इतिहास में ऐसे कई मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जिनका कार्यकाल भले ही सालों पहले समाप्त हो गया हो, लेकिन वो हमारी याद्दाश्त में हमेशा अमर रहेंगे. ऐसे ही एक शख्स थे अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल. उन्होंने 9 अगस्त 2016 को 60 पन्नों का एक सुसाइड नोट लिखा था और कुछ घंटों बाद अपनी जान दे दी थी.

आइए आज आपको हम इसी नेता के बारे में बताते हैं, जो जुझारू होने के साथ ही काफ़ी तेज़ दिमाग़ भी थे.

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चौकीदार के रूप में शुरू किया अपना करियर

कलिखो पुल (Kalikho) Pul) एक छोटे से समुदाय ‘कमान मिश्मी’ से आते थे. इस समुदाय में मुश्किल से ढाई हज़ार लोग हैं. कलिखो मात्र 13 महीने के थे, जब उन्होंने अपनी मां को खो दिया था. इसके बाद जब वो 6 वर्ष के हुए, तो उनके पिता की भी मौत हो गई. इसके बाद वो अपनी बुआ के परिवार के साथ रहने लगे और लकड़ी इक्कट्ठा करके उनकी फ़ैमिली की मदद करने लगे. जब वो 10 साल के थे, तो उन्होंने अपना स्कूल छोड़ दिया और हवाई क्राफ्ट सेंटर में बढ़ईगिरी का कोर्स ज्वाइन कर लिया, जहां उन्हें हर दिन 1.50 रुपये मिलते थे.

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किशोरावस्था में किया था ख़ुदकुशी का प्रयास

हवाई मिडिल स्कूल के हेडमास्टर मिस्टर राम नरेश प्रसाद सिन्हा के सुझाव पर एक नाइट स्कूल ज्वाइन कर लिया था. कलिखो की प्रोग्रेस से इम्प्रेस होकर मिस्टर सिन्हा ने उनका डायरेक्ट एडमिशन छठी कक्षा में करा दिया था. एक बार उन्हें स्कूल में आयोजित एक समारोह में वेलकम स्पीच के लिए तैयार किया, जहां तत्कालीन शिक्षा मंत्री खप्रिसो क्रोंग और उपायुक्त डी. एस. नेगी उपस्थित थे. चूंकि कलिखो अपने भाषण और देशभक्ति गीत से लोगों को प्रभावित करने में सक्षम थे, इसलिए सिन्हा ने उन्हें स्कूल के हॉस्टल में जगह देने का फ़ैसला कर लिया था. जब कलिखो 8वीं में थे, तब वो एक बार बीमार पड़ गए थे. उस दौरान उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे. पैसे कमाने के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ा था. उस वक़्त उन्हें ख़ुदकुशी का ख्याल आया था. हालांकि, उस दौरान उन्होंने जान देने की बजाय मुश्किल हालातों से लड़ने का फ़ैसला किया था.

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हेडमास्टर ने दिलाई थी कलिखो को ‘वाचमैन’ की नौकरी

चूंकि उस स्कूल में ग़रीब बच्चों के लिए कोई स्कॉलरशिप नहीं थी, इसलिए स्कूल के हेडमास्टर ने उनको वाचमैन की नौकरी दिलाई थी. जिसके उन्हें हर महीने 212 रुपये वेतन के तौर पर मिलते थे. स्कूल के अपने फ़ाइनल ईयर में, उन्हें जनरल सेक्रेटरी के पद के साथ छात्र प्रतिनिधि के रूप में नामित किया गया था. कलिखो ने बाद में पान की दुकान खोलकर, बांस की बाड़ और फूस के घर बनाकर और कंक्रीट के ढांचे बनाकर जीविका चलाई. इसके बाद उन्होंने तेजु के इंदिरा गांधी कॉलेज से इकोनोमिक्स में ग्रेजुएशन की और वकालत की पढ़ाई भी की.

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मुख्यमंत्री के पद पर 6 महीने भी नहीं टिक पाए

समाज सेवा, सामुदायिक सेवा और ग़रीब और बेसहारा व्यक्तियों की सेवा करने में उनकी विशेष रुचि थी. अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से पहले वो काफ़ी लंबे समय तक वित्त मंत्री भी रहे हैं. वो 1995 से लगातार 5 बार विधानसभा में चुनाव जीतते आ रहे थे. वो कांग्रेस पार्टी में कई सारे विभागों के मंत्री भी रहे थे. हालांकि, बाद में उन्होंने कांग्रेस से बगावत करके BJP ज्वाइन कर ली थी. इसके बाद उन्हें अरुणाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन वो 6 महीने भी नहीं टिक पाए. 

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60 पन्ने का लिखा था सुसाइड नोट

कलिखो ने तुकी सरकार के खिलाफ़ बगावत करके मुख्यमंत्री पद हासिल किया था. लेकिन 13 जुलाई 2016 को सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया और कोर्ट ने तुकी की सरकार की बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार दिया और फिर से उसे बहाल कर दिया. इसके बाद कलिखो को इस्तीफ़ा देना पड़ा. इस्तीफ़ा देने के 1 महीने के भीतर उन्होंने फंदे पर लटककर अपनी जान दे दी. ख़ुदकुशी से पहले उन्होंने 60 पन्नों का नोट भी लिखा था. उन्होंने इस नोट में काफ़ी कुछ लिखा था और कई नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए थे. उन्होंने अपने नोट के अंत में लिखा था, ‘लोगों की याददाश्त बहुत कमज़ोर है, वो कोई भी बात को जल्द ही भूल जाते हैं. इसलिए इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने जनता को याद दिलाने, जगाने, विश्वास दिखाने, समझाने और विचार करने के लिए ये कदम उठाया है’.

कलिखो पुल की आत्महत्या आज तक मिस्ट्री बनी हुई है.