इतिहास में समाज की बुराइयों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने से लेकर महत्वपूर्ण आंदोलनों का नेतृत्व करने तक, कई भारतीय महिलाओं ने आगे बढ़कर अपनी हिस्सेदारी दिखाई. रानी लक्ष्मीबाई, रानी अहिल्याबाई समेत ऐसी कई वीरांगनाएं थीं, जिन्होंने भारत को विकास का सूरज दिखाया. उनकी वीरता की कहानी हम आज भी इतिहास की क़िताबों में पढ़ते हैं. लेकिन ऐसी भी कई सामजिक परिवर्तन के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाली महिला योद्धा थीं, जिनके योगदान को भुला दिया गया.

इनमें से एक रानी रश्मोनी (Rani Rashmoni) भी हैं. वो वास्तव में रानी नहीं थीं, लेकिन अपनी बुद्धिमता और निडरता के चलते वो लोगों के दिलों में बस गई थीं. इसलिए सम्मान से उन्हें आज भी 'रानी' के रूप में याद किया जाता है. उन्होंने इतिहास को उनके बारे में याद करने के लिए काफ़ी कुछ दिया है. ईस्ट इंडिया कंपनी के इरादों को धूल चटाने से लेकर दक्षिणेश्वर काली मंदिर की स्थापना तक, रानी रश्मोनी के योगदानों को स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाना चाहिए. 

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Rani Rashmoni

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हमेशा से ही सामजिक कल्याण में थी दिलचस्पी

रानी रश्मोनी 28 सितंबर 1793 को बंगाल के हालिसहर के एक छोटे से गांव में मछुआरे समुदाय के परिवार में जन्मी थीं. उनके पिता हरेकृष्णा बिस्वास एक ग़रीब मजदूर थे. मां रामप्रिया देवी की तभी मृत्यु हो गई थी, जब वो 7 साल की थीं. उनकी शादी कोलकाता के एक अमीर ज़मींदार घराने में राज दास नाम के एक ज़मींदार से 11 साल की उम्र में करा दी गई थी. उन दोनों की 4 बेटियां हुईं. 

उस ज़माने में दास एक प्रगतिशील सोच वाले व्यक्ति थे. उन्होंने रानी रश्मोनी (Rani Rashmoni) की बुद्धिमता से प्रभावित होते हुए उन्हें अपने ट्रेड बिज़नेस के साथ जोड़ा. दोनों पति-पत्नी इस बिज़नेस से आने वाले धन को समाज कल्याण में लगाया करते थे. उन्होंने कई पुराने घाट का निर्माण कराने के साथ ही भूखे लोगों के लिए सूप रसोई भी बनवाई. 

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पति की मौत के बाद रानी पर आ गई पूरी ज़िम्मेदारी

रानी रश्मोनी (Rani Rashmoni) की ज़िंदगी ख़ुशहाल चल रही थी कि उनके पति राज दास का सन 1830 में निधन हो गया. पति की मौत के बाद रानी बेहद टूट गई थीं, लेकिन इस दौरान उन्होंने बड़ी मजबूती से ख़ुद को संभाला और विधवाओं के खिलाफ़ तत्कालीन प्रचलित मान्यताओं और पितृसत्ता से लड़ते हुए अपने पारिवारिक बिज़नेस की बाग़डोर संभाली. अपने पति से संपत्ति विरासत में लेने के बाद, वो संपत्ति के अपने प्रबंधन कौशल और शहर में अपने कई धर्मार्थ कार्यों के माध्यम से लोगों के बीच खुद को स्थापित करने में कामयाब रहीं.

पहले तो इस बात से उनके पति के विरोधी और जान-पहचान वाले काफ़ी ख़ुश हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि ज़्यादा दिनों तक एक विधवा महिला बिज़नेस की बागडोर को नहीं संभाल पाएगी. लेकिन रानी ने अपने बेहतरीन नेतृत्व कौशल से उनके विरोधियों की उम्मीद पर पानी फेर दिया. उनके इस काम में उनकी तीसरी बेटी के पति मथुरा नाथ बिस्वास बाद में विश्वासपात्र बने और सारा लेन-देन का काम संभालने लगे. 

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बाल विवाह और सती प्रथा के खिलाफ़ उठाई आवाज़

रानी रश्मोनी (Rani Rashmoni) ने इसके बाद बाल-विवाह, बहु-विवाह और सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ़ भी आवाज़ उठाई. इसके साथ ही उन्होंने कोलकाता के पास प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर मंदिर का भी निर्माण करवाया. इसके लिए उन्हें ब्राह्मणों के गुस्से का भी सामना करना पड़ा. ब्राह्मण निचली शूद्र जाति की महिला द्वारा बनाए गए मंदिर में पुजारी बनने के लिए राज़ी नहीं थे. इसके बाद धार्मिक नेता रामकृष्ण परमहंस ने इन विरोधों को शांत करने के लिए पुजारी बनने का फ़ैसला किया. 

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ग़रीबों के लिए 'ईस्ट इंडिया कंपनी' से मोल ले ली थी दुश्मनी 

रानी रश्मोनी गरीबों के कल्याण के बारे में बहुत सोचती थीं. 1840 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मछुआरों से मुनाफ़ा कमाने के लिए गंगा नदी में बहने वाली उनकी छोटी नावों पर कर लगा दिया था. उन्होंने ये फ़ैसला इस बात का हवाला देते हुए किया था कि मछुआरों की छोटी नावें घाट पर बड़ी नावों की आवाजाही में बाधा डाल रही हैं. इस फ़ैसले से मछुआरों की जीवन शैली पर बड़ा प्रभाव पड़ने लगा. इनमें से कुछ इस बात का मामला दर्ज कराने कलकत्ता गए, लेकिन वहां से उन्हें कोई समर्थन ना मिला. अंत में वो थक हार कर रानी रश्मोनी के पास पहुंचे. 

रानी रश्मोनी (Rani Rashmoni) ने इस समस्या का हल करने के लिए एक क़माल की तरकीब निकाली. उन्होंने 10 हज़ार रुपये देकर ईस्ट इंडिया कंपनी से हुगली नदी (कलकत्ता से होकर बहने वाली गंगा की डिस्ट्रीब्यूटरी) के 10 किलोमीटर के हिस्से के लिए एक पट्टा समझौता हासिल किया. इस क्षेत्र को घेरने के लिए उन्होंने लोहे की दो बड़ी जंजीरें लगा दीं और मछुआरों से इस क्षेत्र में मछली पकड़ने को कहा. जंजीरें लगाने के चलते हुगली पर जहाज़ों की भीड़ लग गई. जब रानी से इस बात का स्पष्टीकरण मांगा गया, तो उन्होंने कहा अपनी संपत्ति से होने वाले आमदनी की सुरक्षा के लिए वो ऐसा कर रही हैं. शिप उनके समझौते में मछली पकड़ने की गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने इसके लिए ब्रिटिश क़ानून का भी हवाला दिया. 

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रानी की तरकीब के आगे ईस्ट इंडिया कंपनी ने मानी हार

नावों के जमावड़े को ख़त्म करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को रानी रश्मोनी (Rani Rashmoni) के साथ एक नया समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद मछली पकड़ने पर लगाया गया टैक्स ख़त्म कर दिया गया और मछुआरों की गंगा नदी में आवाजाही पर लगी रोक हटा दी गई. इस तरह से बड़ी चालाकी से उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को मात दे दी. 

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रानी रश्मोनी के सामाजिक परिवर्तन के लिए किए गए योगदान लोगों के दिलों में हमेशा के लिए अमर रहेंगे.