The Great Sikh Warrior Banda Singh Bahadur: सिख धर्म में वैसे तो एक से बढ़कर एक योद्धा हुये हैं, लेकिन इन योद्धाओं के बीच एक योद्धा ऐसे भी थे जिनके आगे मुग़लों की एक भी न चली. इस वीर योद्धा का नाम बंदा सिंह बहादुर (Banda Singh Bahadur) है. वो भारत में मुग़ल शासकों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने वाले पहले सिक्ख सैन्य प्रमुख थे. वो बंदा सिंह ही थे जिन्होंने मुग़लों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा और छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला लिया. बंदा सिंह बहादुर ने हथियारों और सेना के बिना 2500 किलोमीटर का सफ़र तय कर 20 महीने के अंदर सरहिंद पर क़ब्ज़ा कर 'खालसा राज' की स्थापना की थी.

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गुरु गोबिंद सिंह से मुलाक़ात 

बंदा सिंह बहादुर (Banda Singh Bahadur) का जन्म 27 अक्टूबर 1670 को जम्मू कश्मीर के राजौरी के राजपूत परिवार में हुआ था. उसका बचपन का नाम लक्ष्मण देव था. 15 वर्ष की उम्र में वो घर छोड़ कर बैरागी हो गए और उन्हें माधोदास बैरागी के नाम से जाना जाने लगा. घर से निकलकर वो देश भ्रमण करते हुए महाराष्ट्र में नांदेड़ पहुंचे जहां 1708 में उनकी मुलाक़ात सिखों के 10वें गुरु 'गुरु गोबिंद सिंह' से हुई. इस दौरान गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें अपनी तपस्वी जीवन शैली त्यागने और पंजाब के लोगों को मुग़लों से छुटकारा दिलाने का काम सौंपा.

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इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को 1 तलवार, 5 तीर और 3 साथियों के साथ पंजाब कूच करने का निर्देश दिया. पंजाब जाकर सरहिंद नगर पर क़ब्ज़ा करो और अपने हाथों से वज़ीर ख़ां को मृत्यु दंड दो. गुरु गोबिंद सिंह के आदेश का पालन करते हुए बंदा सिंह पंजाब की तरफ़ निकल पड़े. लेकिन कुछ दिन बाद ही जमशीद ख़ां नाम के एक अफ़ग़ान ने गुरु गोबिंद सिंह पर खुखरी से वार कर दिया. इस हमले से गुरु गोबिंद सिंह कई दिनों तक ज़िदगी और मौत के बीच झूलते रहे. आख़िरकार 7 अक्टूबर 1708 को गुरु गोबिंद सिंह जी का निधन हो गया.

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सन 1709 की बात है. मुग़ल बादशाह बहादुर शाह दक्षिण में लड़ाई लड़ रहे थे. इस बीच बंदा सिंह बहादुर पंजाब में सतलज नदी के पूर्व में जा पहुंचे और सिख किसानों को अपनी तरफ़ करने के अभियान में जुट गए. इस दौरान सबसे पहले उन्होंने सोनीपत और कैथल में मुग़लों का ख़ज़ाना लूटा. 3 से 4 महीनों के भीतर बंदा सिंह की सेना में क़रीब 5000 घोड़े और 8000 सैनिक शामिल हो गए. कुछ दिनों में सैनिकों की संख्या बढ़ कर 19000 हो गई. इस बीच ज़मीदारों के अत्याचारों से त्रस्त सरहिंद के किसान बहुत कठिन जीवन बिता रहे थे. उनको एक निडर नेता की तलाश थी. इस दौरान जब बंदा सिंह ने इनसे मुलाक़ात की तो उस इलाके़ के सिखों ने बंदा सिंह को घोड़े और धन उपलब्ध कराया.  

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बंदा सिंह बहादुर ने किया 'समाना' पर हमला  

बंदा सिंह बहादुर का साथ पाने के बावजूद सरहिंद के किसानों के मन में बादशाह का डर सत्ता रहा था. इस बीच नवंबर, 1709 में बंदा बहादुर के सैनिकों ने अचानक सरहिंद के क़स्बे 'समाना' पर हमला बोल दिया. समाना पर हमले करने की मुख्य वजह थी गुरु तेगबहादुर का सिर कलम करवाने वाला और गुरु गोबिंद सिंह के लड़कों को मारने वाला व्यक्ति वज़ीर ख़ां का उसी शहर में रहना. इस दौरान 'समाना' को बचाने के लिए दिल्ली से सरहिंद को कोई मदद नहीं भेजी गई. सरहिंद दिल्ली और लाहौर के बीच बसा शहर था. यहां मुग़लों ने बड़े बड़े भवन बनवा रखे थे और ये उस समय पूरे भारत में लाल मलमल बनाने के लिए मशहूर था. 

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सरहिंद पर की फ़तह हासिल

मई 1710 में बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सरहिंद पर हमला किया गया. इस दौरान बंदा सिंह की फ़ौज में 35000 सैनिक थे. इनमें 11000 भाड़े के सैनिक थे. लेकिन वज़ीर ख़ां के पास अच्छी ट्रेनिंग लिए हुए 15000 सैनिक थे. इस दौरान उनके पास सिखों से बेहतर हथियार और कम से कम दो दर्जन तोपें थीं और उनके आधे सैनिक घुड़सवार भी थे. 22 मई 1710 को हुई इस लड़ाई में बंदा ने ये मानते हुए कि सबसे कमज़ोर तोपख़ाने को हमेशा बीच में रखा जाता है, बीच में रखी चार तोपों पर सबसे पहले हमला बोला. इस हमले की कमान उन्होंने भाई फ़तह सिंह को दी.

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आमने सामने की लड़ाई में फ़तह सिंह ने वज़ीर ख़ां के सिर पर वार कर दिया. सरहिंद के सैनिकों ने जैसे ही अपने सेनापति का कटा सिर ज़मीन पर गिरते देखा उनका मनोबल गिर गिया और वो मैदान छोड़ कर भाग गये. इस तरह से इस लड़ाई में बंदा सिंह बहादुर की जीत हुई और सरहिंद शहर को मिट्टी में मिला दिया. इसके बाद जब बंदा सिंह को ख़बर मिली कि यमुना नदी के पूर्व में हिंदुओं को तंग किया जा रहा है तो उन्होंने यमुना नदी पार की और सहारनपुर शहर को भी नष्ट कर दिया. इस दौरान बंदा सिंह के हमलों से उत्साहित होकर स्थानीय सिख लोगों ने जालंधर दोआब में राहोन, बटाला और पठानकोट पर क़ब्ज़ा कर लिया. 

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बंदा सिंह बहादुर ने रखी 'लौहगढ़' की नींव 

बंदा सिंह बहादुर ने अपने नए कमान के केंद्र को 'लौहगढ़' नाम दिया. इस दौरान सरहिंद की जीत को याद करते हुए उन्होंने नए सिक्के ढलवाए और अपनी नई मोहर भी जारी की. इन सिक्कों पर गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंह के चित्र थे. पंजाब में इतना सब कुछ होता देख 66 वर्षीय मुग़ल बादशाह बहादुर शाह का ख़ून ख़ौल उठा और वो स्वयं 1710 में बंदा सिंह बहादुर के ख़िलाफ़ जंग के मैदान में उतरने का फ़ैसला कर लिया. इसके बाद वो सीधे 'लौहगढ़' की तरफ़ नकल पड़े. इस दौरान मुग़ल सेना बंदा की सेना से कहीं बड़ी थी. ऐसे में बंदा सिंह को भेष बदल कर 'लौहगढ़' से निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा.

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'दिल्ली' के बजाय 'लाहौर' होगी राजधानी 

मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ने 'लौहगढ़' पहुंचते ही आदेश दिया कि अब 'दिल्ली' के बजाए उनकी राजधानी 'लाहौर' होगी. इस दौरान मुग़ल बादशाह ने बंदा को पकड़ने के लिए लाहौर से अपने सैन्य कमांडर भेजे. लेकिन तब तक बंदा अपनी पत्नी और कुछ अनुयायियों के साथ पहाड़ों में छिप गये. इस दौरान जब कमांडर खाली हाथ लौटा तो बहादुर शाह ने उसको क़िले में ही हिरासत में रखने का आदेश दिया. इस बीच लाहौर में सिखों के घुसने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन बंदा सिंह के साथी रात में रावी नदी में तैरते हुए लाहौर के बाहरी इलाक़ों में आते और मुग़ल प्रशासन को तंग करने के बाद सुबह होने से पहले तैरते हुए वापस चले जाते. 

बंदा सिंह को पकड़ने की ज़िम्मेदारी समद ख़ां को सौंपी

इस बीच सन 1712 में मुग़ल बादशाह बहादुर शाह का निधन हो गया. इसके बाद हुई लड़ाई में सत्ता पहले 'जहंदर' के हाथ में आई और फिर उनके भतीजे 'फ़र्रुख़सियर' को मुग़ल ताज मिला. इस बीच नये मुग़ल बादशाह फ़र्रुख़सियर ने कश्मीर के सूबेदार अब्दुल समद ख़ां को बंदा सिंह बहादुर के ख़िलाफ़ अभियान शुरू करने का आदेश दिया. समद ख़ां ने 1713 की शुरुआत में बंदा सिंह को 'सरहिंद' छोड़ने पर मजबूर किया. लेकिन बंदा और समद के सैनिकों के बीच लुकाछिपी का खेल चलता रहा. आख़िरकार समद ख़ां को नांगल गांव में बने एक क़िले में मौजूद बंदा सिंह को क़ैद रखने में सफलता मिल गई.

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मुगलों की क़ैद में बंदा सिंह बहादुर

इस दौरान मुग़ल सेना ने क़िले को चारों तरफ़ से घेर लिया और उसे अपने कब्ज़े में कर लिया. इस दौरान अब्दुल समद ख़ां ने क़िले के अंदर अनाज का एक दाना तक नहीं घुसने दिया. ऐसे में क़िले के अंदर भुखमरी फैल गई और बंदा के साथियों ने गधों और घोड़ों का मांस खाकर किसी तरह ख़ुद को जीवित रखा. इस दौरान घास, पत्तियों और मांस पर गुज़ारा करते हुए बंदा सिंह बहादुर ने ताक़तवर मुग़ल सेना का 8 महीनों तक बहादुरी से सामना किया. आख़िरकार दिसंबर, 1715 में अब्दुल समद ख़ां को बंदा सिंह बहादुर का क़िला भेदने में सफलता मिल गई.

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बंदा सिंह बहादुर को दिल्ली लाया गया

बंदा सिंह बहादुर के आत्मसमर्पण के बाद उनके साथियों को गुरदास नांगल में ही मार दिया गया. बाकी सैनिकों का लाहौर लौटते समय रावी के किनारे क़त्ल किया गया. इस दौरान बंदा सिंह बहादुर को क़ैद में लेकर समद ख़ां ने लाहौर में प्रवेश किया. बंदा सिंह समेत सभी बंदियों को ज़ंजीरों से बांध कर गधों या ऊंटों पर बैठने के लिए मजबूरकर दिया था. इस दौरान समद ख़ां ने बादशाह फ़र्रुख़सियर से बंदा सिंह बहादुर को ख़ुद दिल्ली ले जाने की अनुमति मांगी, लेकिन बादशाह ने ये अनुमति नहीं दी. अगले दिन समद ख़ां ने अपने बेटे ज़करिया ख़ां के नेतृत्व में इन कै़दियों को दिल्ली के लिए रवाना किया.

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बंदा सिंह को क़ैद करके लाया गया दिल्ली

27 फ़रवरी को इस जुलूस ने दिल्ली के अंदर प्रवेश किया. इस जुलूस में मुग़लों की क़ैद में 744 जीवित सिख क़ैदी चल रहे थे. जुलूस देखने के लिए लोग भारी संख्या में दिल्लीवासी सड़कों पर उतर आए. इस दौरान हर सिख सैनिकों दो दो करके बिना काठी वाले ऊंटों पर बांधा गया था. प्रत्येक क़ैदी का एक हाथ गर्दन के पीछे कर लोहे की ज़जीर से बंधा हुआ था. इसके अलावा बांस के लंबे डंडों पर मारे गए 2000 सिखों के सिर लटका रखे थे. सबसे पीछे बंदा सिंह बहादुर चल रहे थे. उन्हें एक लोहे के पिंजड़े में डाल कर हाथी पर सवार कराया गया था. उनके दोनों पैर लोहे की सांकलों से बंधे थे. उनकी बग़ल में नंगी तलवारें लिए दो मुग़ल सिपाही खड़े थे. 

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मुग़ल बादशाह ने दिए क़ैदियों को मारने के आदेश 

इन सभी क़ैदियों को एक हफ़्ते क़ैद में रखने के बाद 5 मार्च, 1716 को इनका क़त्लेआम शुरू हुआ. हर सुबह कोतवाल सरबराह ख़ां इन क़ैदियों की ज़िदगी बख़्शने के लिए इन्हें इस्लाम धर्म क़ुबूल करने को कहता, लेकिन हर सिख सैनिक मुस्कराते हुए ना कहकर अपना जवाब दे देता. सात दिनों तक लगातार हुए सिख क़ैदियों के नरसंहार के बाद इसे कुछ दिनों के लिए रोक दिया गया. इस बीच कोतवाल ने मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर को सलाह दी कि बंदा सिंह बहादुर को अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कुछ समय और दिया जाए.  

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बंदा सिंह के बेटे का कलेजा निकलकर उनके मुंह में ठूंसा

9 जून, 1716 को बंदा सिंह बहादुर और उनके कुछ साथियों को क़ुतब मीनार के पास महरौली में बहादुर शाह की क़ब्र पर ले जाया गया और उन्हें क़ब्र के सामने सिर झुकाने के लिए कहा गया. इस दौरान बंदा के 4 साल के बेटे अजय सिंह को उनके सामने लाकर बैठाया गया. थोड़ी देर बाद कोतवाल सरबराह ख़ां के इशारे पर तलवार से अजय सिंह के टुकड़े कर दिए गए. लेकिन बंदा बिना हिले-डुले बैठे रहे. इसके बाद अजय सिंह के दिल को उसके शरीर से निकाल कर बंदा सिंह बहादुर के मुंह में ठूंस दिया गया. इसके बाद जल्लाद ने बंदा सिंह बहादुर के शरीर के भी टुकड़े करने शुरू कर दिये. इस दौरान उन्हें तड़पा तड़पाकर मारने लगे. आख़िर में जल्लाद ने 9 जून 1716 को तलवार के एक वार से बंदा सिंह बहादुर के सिर को धड़ से अलग कर दिया.

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बंदा सिंह बहादुर की मौत के 2 साल बाद सईद भाइयों ने मराठों की मदद से मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर को न सिर्फ़ गद्दी से हटाया, बल्कि गिरफ़्तार कर उसकी आंखें भी फोड़ दीं. इसके साथ ही मुग़ल साम्राज्य का विघटन भी होता चला गया और आख़िर में नौबत यहां तक पहुंची कि दिल्ली का बादशाह अंग्रेज़ों के हाथों की कठपुतली बन कर दिल्ली के लाल क़िले से क़ुतब मीनार तक ही सिमटा रह गया. इस बीच काबुल, श्रीनगर और लाहौर पर रणजीत सिंह का क़ब्ज़ा हो गया और दक्षिण भारत से लेकर पानीपत तक का विशाल भूभाग मराठों के हाथ चला गया.