Title of Knight or Warrior: यूरोप में मध्यकालीन युग में ‘नाइट’ या ‘योद्धा’ की उपाधि मिलना बेहद सम्मान की बात होती थी. लेकिन उस दौर में इस टाइटल को प्राप्त करना इतना आसान नहीं होता था. इसके लिए योद्धाओं को एड़ी चोटी तक का जोर लगाना पड़ता था. एक समय में केवल राज परिवार तक सीमित ये उपाधि धीरे धीरे आम लोगों को भी दी जाने लगी, जो इसके लायक होते थे. नाइट की उपाधि हासिल करने के लिए छोटी-सी उम्र से ही पापड़ बेलने पड़ते थे. इसमें कई चरण होते थे, सभी चरणों को सफलतापूर्वक पार करना के बाद ही ‘नाइट’ या ‘योद्धा’ की उपाधि मिलती थी.

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Title of Knight or Warrior

13वीं सदी में यूरोप में आमतौर पर ‘नाइट्स’ यानी ‘योद्धाओं’ को वंश के तौर पर संरक्षित रखने के लिए युवा योद्धा तैयार किये जाते थे. फ्रांस और जर्मनी के अलावा पूरे यूरोप में एक ‘नाइट का बेटा ही नाइट’ बन सकता था. जैसे भारत में राजा का बेटा राजा. इस दौरान यूरोप में आमतौर पर योद्धा बनने की ट्रेनिंग या तो राजा के बेटे या फिर योद्धाओं के बच्चों को ही दी जाती थी. हालांकि, बाद में आम लोगों के बच्चों को भी युद्ध के लिए तैयार किया जाने लगा. आज यही ‘Knight’ की उपाधि ‘Sir’ की उपाधि के तौर पर भी जानी जाती है.

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चलिए जानते हैं मध्य युग में ‘नाइट’ या ‘योद्धा’ की उपाधि (Title of Knight or Warrior) कैसे मिलती थी-

7 साल की उम्र से शुरू हो जाती थी ट्रेनिंग 

नाइट (Knight) बनने की तैयारी 7 साल की उम्र से ही शुरू हो जाती थी. इस दौरान नाइट बनने के लिए को घुड़सवारी से लेकर तलवारबाजी में पारंगत होना बहुत ज़रूरी होता था. उसे युद्ध में चलाने वाले हथियार जैसे कटार, भाला, तीर आदि भी चलाने में महारत हासिल होनी चाहिए. योद्धा के तौर पर तैयार किये जाने वाले बच्चे 7 साल की उम्र होने तक महल की महिलाओं कि देख-रेख में ही रहते थे. इसके बाद उन्हें ‘हाउस ऑफ़ लार्ड या नाइट’ में भेज दिया जाता था. इन बच्चों को यहां पर ‘Pages’ की उपाधि दी जाती थी.

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इस दौरान उन्हें ‘हाउस ऑफ़ लार्ड या नाइट’ में अलग-अलग क्षेत्र में ज़रूरी शिक्षा प्रदान की जाती थी. उन्हें शिकार करने से लेकर बाज को पालने और उनसे निपटने के गुर भी सिखाये जाते थे. जबकि पादरी उन्हें धर्म की सीख देने के साथ-साथ पढ़ना और लिखना भी सिखाते थे. इसके अलावा योद्धाओं को देख-देखकर वो युद्ध अभ्यास किया करते थे. इसके लिए उसे पहले लकड़ी की तलवार चलाना सिखाते थे और उन्हें आपस में ही युद्ध का अभ्यास करके अपना कौशल को बढ़ाना होता था.  

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‘Squire’ के रूप में दूसरा पड़ाव करना होता था पार 

सम्राट बनने की इस प्रक्रिया में 7 साल की उम्र से लेकर 13 साल की उम्र तक के बच्चे ‘Pages’ कहलाते थे. 14 साल की उम्र होते ही ये Pages से बदलकर Squire बन जाते थे. स्क्वायर शब्द फ्रेंच शब्द Ecuyer से निकला है, जिसका मतलब है ‘कवच वाहक’. Squire बनने के बाद इन्हें हैंडलिंग और घुड़सवारी के अलावा रचनात्मक गुर भी सीखने होते थे. स्क्वायर (Squire) बन जाने की दूसरी अवस्था में इन्हें आगे की शिक्षा प्रदान की जाती थी.  

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इस दौरान एक धार्मिक रस्म का आयोजन करते हुए सभी ‘Squire’ को पादरी द्वारा एक पवित्र तलवार दी जाती थी. स्क्वायर इस पवित्र तलवार को लेते समय इस बात की कसम खाते कि वो इसे केवल धार्मिक और सम्मान के लिए ही इस्तेमाल करेंगे. इस रस्म को पूरा करने के बाद ये लार्ड्स के विभिन्न कामों को करने लगते हैं. हर दायित्व को पूरा करने के लिए एक वर्ग समर्पित होता था. इसमें रात को नाइट की देखभाल करने से लेकर नाइट्स के जूतों को पॉलिश करने तक शामिल है.  

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स्क्वायर (Squire) भी कई तरह के होते थे. इनमें Squire of Body, Squire of Chamber, The Carving Squire, Squire of Wine, Squire of the Pantry, Squire of Arms, Squire of Honor शामिल थे. इस दौरान ‘स्क्वायर ऑफ़ बॉडी’ के दायित्व की बात करें तो उसे किसी योद्धा या उसकी पत्नी का निजी नौकर बनकर अपनी सेवाएं देनी होती थी. उनसे मिले सारे कार्यों को पूरा किया करना पड़ता था. जबकि ‘स्कवायर ऑफ़ चैम्बर’ को महल में मौजूद सभी कमरों में अपनी सेवा देनी होती थी. इसी तरह हर वर्ग को अपने काम विभाजित होते थे.

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युद्ध कला के साथ सीखते थे रचनात्मक गुण  

इन Squire को यहां युद्ध की कुशलता सिखाने के अलावा भी कई अन्य कलाएं सीखनी होती थी. इनमें संगीत, डांस और फ्रेंच और लैटिन भाषा भी पढ़नी और लिखनी अनिवार्य थी. इसके अलावा उन्हें कविताएं बोलनी भी सिखाई जाती थी. इसके साथ ही अच्छी आदतों को अपनाने पर भी ज़ोर दिया जाता था. खासकर महिलाओं के साथ अदब से पेश आना. इस दौरान शतरंज का खेल खेलने और शिकार पर जाने का टास्क भी होता था. शिकार करने के बाद उसे योद्धा के टेबल पर खाने के परोसने से लेकर युवा ‘Pages’ का ख्याल रखने और उन्हें ट्रेनिंग देने तक की ज़िम्मेदारी भी इन Squire की ही होती थी. 

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ट्रेनिंग के दौरान Squire को असली बरछे और तलवार से अभ्यास करना होता था. इन तलवारों को असली युद्ध के मैदान में इस्तेमाल होने वाली तलवारों से भी ज़्यादा भारी और खतरनाक बनाया जाता था. ऐसा इसलिए ताकि योद्ध को असली युद्ध में लड़ते समय अपनी लड़ाई आसान लगे. जब असली युद्ध होता था तब वो ‘नाइट’ के सहायक के तौर पर युद्ध मैदान में उतरते थे. इस दौरान उसे ‘नाइट’ के आगे घोड़ों और सामान के साथ चलना पड़ता था. युद्ध क्षेत्र में ‘नाइट’ के जख्मी हो जाने पर उसे वहां से बाहर निकालने की ज़िम्मेदारी भी Squire की ही होती थी.

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इस उम्र में मिलती थी ‘नाइट’ या ‘योद्धा’ की उपाधि 

इन सभी कलाओं में पारंगत होने के बाद उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि मिल जाती थी. यूरोप में ये उपाधि 18 से 21 साल की उम्र के बीच मिल जाया करती थी. नाइट की उपाधि तीसरी और आख़िरी होती थी. इस दौरान ‘Squire’ को सफ़ेद लिबास और सफ़ेद बेल्ट दी जाती थी. ये सफ़ेद बेल्ट ‘पवित्रता’ का प्रतीक मानी जाती थी. इसके अलावा उसे काली या भूरी स्टॉकिंग दी जाती थी, जो धरती के प्रतीक के तौर पर मानी जाती थी. उन्हें लाल रंग का लबादा भी पहनाया जाता था. अंत में उन्हें एक रस्म का आयोजन करते हुए धूम-धाम से ‘नाइट’ या ‘योद्धा’ की उपाधि दे दी जाती थी.

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इस दौरान जो Squire योद्धा नहीं बन पाते थे उन्हें चर्च में काम मिल जाया करता था.