What is Raman Effect: भारत के महान वैज्ञानिक सी. वी. रमन (C.V. Raman) को आज भी दुनियाभर में उनके उत्कृष्ट आविष्कारों के लिए जाना जाता है. सन 1928 में उन्होंने एक ऐसी खोज की जिसे आज भी उनके नाम से जाना जाता है. इसी खोज के लिए सी. वी. रमन को 1930 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से नवाजा गया था. वो ‘नोबेल पुरस्कार’ हासिल करने वाले एशिया के पहले शख़्स थे. आज हम आपको देश के महान वैज्ञानिक सी. वी. रमन की उसी खोज के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी वजह से वो ‘नोबेल पुरस्कार’ विजेता बने.

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असल ज़िंदगी में कौन थे रमन?

सी. वी. रमन (C.V. Raman) का जन्म 7 नवंबर, 1888 को मद्रास प्रेसिडेंसी के तिरुचिरापल्ली में हुआ था. उनका पूरा नाम चेंद्रशेखर वेंकट रमन था. उनके पिता का नाम चंद्रशेखर रामनाथन अय्यर और मां का नाम पार्वती अम्मल था. रमन को बचपन से ही साइंस में बड़ी दिलचस्पी थी. वो अक्सर खेल-खेल में विज्ञान के कई प्रयोग कर डालते थे. उन्होंने St Aloysius’ Anglo-Indian High School से अपनी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की थी.

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सी. वी. रमन (C.V. Raman) पढ़ाई में बेहद तेज़ थे. उन्होंने 11 साल की उम्र में 10वीं, जबकि 13 साल की उम्र में 12वीं पास कर ली थी. 12वीं कक्षा में टॉप करने के बाद सन 1903 में आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने ‘मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज’ में दाखिला लिया और स्नातक की डिग्री हासिल की. 16 साल की उम्र में उन्होंने ‘प्रेसीडेंसी कॉलेज’ से Honours in Physics के साथ ‘मद्रास विश्वविद्यालय’ की स्नातक डिग्री परीक्षा में टॉप किया था.

सी. वी. रमन (C.V. Raman) ने सन 1906 में स्नातक की पढ़ाई के दौरान प्रकाश के विवर्तन (Diffraction of Light) पर अपना एक रिसर्च पेपर ‘फ़ोसोफ़िकल मैगज़ीन’ को भेजा था. इस दौरान ‘फ़ोसोफ़िकल मैगज़ीन’ में छपे उनकी रिसर्च को ब्रिटेन के जाने-माने साइंटिस्ट जॉन विलियम स्ट्रूट (John William Strutt) ने भी पढ़ा. जॉन मैथ्स और फ़िजिक्स के महान साइंटिस्ट रहे हैं, जिन्होंने ‘आसमान का नीला क्यों होता है’ कि भी खोज की थी.

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सी. वी. रमन की इस रिसर्च से जॉन विलियम बेहद प्रभावित हुए. लेटर लिखकर उन्होंने रमन की प्रसंशा भी की. जॉन इस दौरान रमन को प्रोफ़ेसर समझ बैठे थे और लेटर में उन्हें प्रोफ़ेसर कहकर ही संबोधित किया. हालांकि, सी.वी. रमन ने इस घटना के 1 साल बाद फ़िजिक्स में अपनी मास्टर डिग्री हासिल की थी. इसके बाद मात्र 19 साल की उम्र में रमन को कलकत्ता के Indian Finance Service में Assistant Accountant General की नौकरी मिल गई. कलकत्ता में रहने के दौरान वो इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस (IACS) से जुड़े गए, जो भारत का पहला रिसर्च इंस्टीट्यूट था.इसी संस्थान ने उन्हें ‘स्वतंत्र शोध’ करने की अनुमति दी. यहीं पर उन्होंने ध्वनिकी (Acoustics) और प्रकाशिकी (Optics) में अपना अहम योगदान दिया था.

आइए जानते हैं सी.वी. रमन (C.V. Raman) की वो कौन सी खोज थी जिसने उन्हें ‘नोबेल पुरस्कार’ दिलाया था.

सी.वी. रमन (C.V. Raman) ने 28 फ़रवरी, 1930 को एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज की थी, जिसे आज पूरी दुनिया रमन प्रभाव (Raman Effect) के नाम से जानती है. भारत में खोज की इस तारीख को हर साल ‘नेशनल साइंस डे’ के रूप मनाया जाता है. इसी खोज के लिए रमन को 1930 में फ़िजिक्स में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से सम्मानित किया गया था.

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आख़िर क्या था Raman Effect?

रमन प्रभाव (Raman Effect) एक ऐसी खोज है जिसमें प्रकाश की किरणों को अणुओं द्वारा हटाए जाने पर वो प्रकाश अपने तरंगदैर्ध्य में बदल जाता है. प्रकाश की किरण जब एक धूल-मुक्त पारदर्शी रसायनिक मिश्रण से गुजरती हैं तो बीम की दूसरी दिशा में प्रकाश का छोटा सा अंश उभरता है. इस बिखरे हुए प्रकाश के ज़्यादातर हिस्सा की तरंगदैर्ध्य (Wavelength) अपरिवर्तित रहती है. हालांकि छोटा सा अंश मूल प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की तुलना में अलग तरंगदैर्ध्य वाला होता है और उसकी उपस्थिति ‘रमन प्रभाव’ का नतीजा है.

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आसान शब्दों में कहें तो ‘रमन प्रभाव’ वास्तव में प्रकाश के प्रकीर्णन या बिखराव की प्रक्रिया है जो माध्यम के कणों की वजह से होती है. ये बिखराव तब होता है जब प्रकाश किसी माध्यम में प्रवेश करता है और इस वजह से बदलाव होता है. जब प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम से निकलता है तो उसकी प्रकृति और स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है. यह माध्यम ठोस, द्रव और गैसीय, कुछ भी हो सकता है. ये घटना तब घटती है, जब माध्यम के अणु प्रकाश ऊर्जा के कणों को छितरा या फ़ैला देते हैं. ये उसी तरह होता है जैसे कैरम बोर्ड पर स्ट्राइकर गोटियों को छितरा देता है.

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इन प्रयोगों में काम आता है ‘रमन प्रभाव’

रमन प्रभाव (Raman Effect) का इस्तेमाल आज भी वैज्ञानिक क्षेत्रों में किया जा रहा है. ISRO की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के ‘मिशन चंद्रयान’ के दौरान चांद पर पानी का पता लगाने के पीछे भी सी.वी. रमन के ‘रमन स्पेकट्रोस्कोपी’ का ही योगदान था. इसके अलावा फ़ॉरेंसिक साइंस में भी ‘रमन प्रभाव’ को काफ़ी उपयोगी माना जाता है. कई वैज्ञानिक आज भी ‘रमन प्रभाव’ के आधार पर काम कर रहे हैं और उन्होंने भी इसके आधार पर कई चीज़ों की खोज की है.

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क्या है’रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी’

‘रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी’ की मदद से आज ‘चांद पर पानी’ से लेकर ‘कैंसर का पता’ लगाया जा रहा है. रमन की इस खोज का मतलब स्पेक्ट्रोस्कोपी पदार्थ द्वारा प्रकाश और अन्य विकिरण के अवशोषण और उत्सर्जन का अध्ययन करना है. आज दुनियाभर की केमिकल लैब में इसका इस्तेमाल हो रहा है. इसी खोज की मदद से पदार्थ की पहचान की जाती है. फ़ार्मास्यूटिकल्स सेक्टर में ‘सेल्स’ और ‘टीशूज’ पर शोध से लेकर ‘कैंसर का पता’ लगाने तक के लिए उनकी खोज काम आ रही है.

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